इंदौर में ‘दंगल’ कोच कृपा शंकर बिश्नोई का अखाड़ा बदहाल, छत टपकने से पहलवान परेशान
मल्हार आश्रम के SAI सेंटर में 80 से ज्यादा पहलवान कर रहे ट्रेनिंग, बारिश में मैट और उपकरण हो रहे खराब
Dangal Coach Kripa Shankar: मध्य प्रदेश की खेल राजधानी इंदौर में कुश्ती की ऐतिहासिक और गौरवमयी परंपरा प्रशासनिक उपेक्षा और बुनियादी ढांचे के अभाव के चलते गहरे संकट में फंस गई है। खेल प्राधिकरण (SAI) के मल्हार आश्रम स्थित कुश्ती प्रशिक्षण केंद्र की हालत वर्तमान में खंडहर जैसी हो चुकी है। वर्ष 2016 की ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘दंगल’ में बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान को महावीर सिंह फोगाट के किरदार के लिए कुश्ती के दांव-पेंच सिखाने वाले अर्जुन पुरस्कार विजेता कोच कृपा शंकर बिश्नोई आज इसी जर्जर अखाड़े को बचाने के लिए अकेले संघर्ष कर रहे हैं। जिस परिसर से अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान तैयार होने की उम्मीद थी, वहां आज बारिश में छत से पानी टपक रहा है, दीवारों का प्लास्टर उखड़कर गिर रहा है और युवा खिलाड़ी मैट बचाने के लिए बाल्टियों से पानी उलीचने पर विवश हैं।
मल्हार आश्रम का यह कुश्ती केंद्र लगभग 80 से अधिक नवोदित पहलवानों के लिए एक मात्र उम्मीद है, जहां कोच बिश्नोई बिना किसी आधिकारिक पद या वित्तीय लाभ के निस्वार्थ भाव से निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। विडंबना यह है कि खेल और खिलाड़ियों के प्रोत्साहन के बड़े-बड़े प्रशासनिक दावों के बीच इस प्रतिष्ठित अखाड़े में महिला पहलवानों के लिए बुनियादी चेंजिंग रूम और साफ शौचालय तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिसके चलते कई प्रतिभावान खिलाड़ी खेल छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं।
Dangal Coach Kripa Shankar: छत से गिरता पानी और मैट सुखाने का संघर्ष
इंदौर के ऐतिहासिक मल्हार आश्रम परिसर में वर्ष 2008 से भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) का प्रशिक्षण केंद्र संचालित हो रहा है। शुरुआत में इसे बोर्डिंग सह ट्रेनिंग सेंटर के रूप में स्थापित करने की रूपरेखा बनाई गई थी, किंतु प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह केवल डे-बोर्डिंग केंद्र बनकर रह गया। बीते अठारह वर्षों के दौरान यहां खेल प्राधिकरण की ओर से किसी नियमित आधिकारिक कोच की स्थायी नियुक्ति तक नहीं की गई। ऐसी विषम परिस्थितियों में अर्जुन अवार्डी कृपा शंकर बिश्नोई ने स्वेच्छा से आगे आकर गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को तराशने का बीड़ा उठाया।
किंतु वर्तमान मानसून के दौरान इस केंद्र की इमारत की स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि नियमित अभ्यास चलाना जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है। बारिश होते ही छत के दर्जनों हिस्सों से धार बहने लगती है, जिससे लाखों रुपये मूल्य के अंतरराष्ट्रीय कुश्ती मैट भीगकर खराब हो रहे हैं। अभ्यास शुरू करने से पूर्व पहलवानों को घंटों तक झाड़ू और बाल्टी लेकर अखाड़े के फर्श से पानी निकालना पड़ता है। क्षतिग्रस्त जल निकासी और टूटी हुई पाइपलाइनों के कारण परिसर में सीवर का गंदा पानी जमा होने लगा है, जिससे संक्रमण और गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
महिला पहलवानों की गरिमा पर संकट: चेंजिंग रूम और टॉयलेट का अभाव
इस प्रशिक्षण केंद्र की सबसे पीड़ादायक और शर्मनाक सच्चाई महिला पहलवानों की दुर्दशा है। केंद्र में महिला खिलाड़ियों के लिए कोई पृथक चेंजिंग रूम मौजूद नहीं है और न ही उपयोग योग्य शौचालय की व्यवस्था है। परिसर में बना पुराना शौचालय इतनी गंदगी और बदहाली का शिकार है कि वहां जाना संभव नहीं है।
अभ्यास के लिए आने वाली महिला पहलवानों को पसीने से भीगे परिधान बदलने अथवा प्राकृतिक क्रियाओं के लिए अखाड़े से बाहर निकलकर पास के सार्वजनिक सुलभ शौचालय का रुख करना पड़ता है या आसपास के रिहायशी मकानों के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं। एक ओर देश में महिला पहलवानों के ओलंपिक और राष्ट्रमंडल पदकों पर गर्व किया जाता है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर राष्ट्रीय स्तर की महिला पहलवानों को गरिमापूर्ण और सुरक्षित वातावरण तक मयस्सर नहीं हो पा रहा है।
स्कूल के पुराने हॉल में शरण: अस्थायी समाधान से नहीं बदलेगी तस्वीर
इस वर्ष मूसलाधार बारिश के चलते जब अखाड़े का मुख्य भवन पूरी तरह जलमग्न हो गया और छत का प्लास्टर गिरने से अभ्यास असंभव हो गया, तब कोच बिश्नोई ने समीप स्थित सांदीपनि शासकीय मल्हार आश्रम स्कूल प्रबंधन से मानवीय आधार पर सहायता मांगी। स्कूल के प्राचार्य ने संवेदनशीलता दिखाते हुए पुराने ‘बॉयज एसोसिएशन हॉल’ को लगभग एक महीने के लिए पहलवानों को अस्थायी अभ्यास हेतु उपलब्ध कराया।
यद्यपि इस हॉल में पहलवानों को तात्कालिक रूप से सिर छिपाने की जगह मिल गई, किंतु यह कोई स्थायी विकल्प नहीं है। स्कूल का हॉल कुश्ती के वैज्ञानिक प्रशिक्षण के अनुकूल नहीं है और वहां भी लंबे समय तक मैट बिछाकर अभ्यास नहीं कराया जा सकता। मुख्य अखाड़ा भवन के व्यापक पुनर्निर्माण और आधुनिक सुविधाओं के बिना यहां खेल का निरंतर संचालन असंभव प्रतीत हो रहा है।
दंगल के शिल्पकार की दास्तान: हरसूद से निकलकर आमिर खान को बनाया ‘महावीर’
कोच कृपा शंकर बिश्नोई मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के अंतर्गत आने वाले विस्थापित कस्बे हरसूद के रहने वाले हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कुश्ती मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई पदक जीते, जिसके सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से नवाजा। वे अंतरराष्ट्रीय कुश्ती महासंघ के प्रथम श्रेणी के अधिकृत रेफरी भी रहे हैं।
वर्ष 2016 में जब नितेश तिवारी के निर्देशन में फिल्म ‘दंगल’ का निर्माण हो रहा था, तब आमिर खान, फातिमा सना शेख और सान्या मल्होत्रा को वास्तविक अखाड़े की कुश्ती, हरियाणवी दांव-पेंच और पहलवानों की शारीरिक भाषा सिखाने के लिए कृपा शंकर बिश्नोई को ही मुख्य कुश्ती कोच नियुक्त किया गया था। आमिर खान ने महीनों तक बिश्नोई के मार्गदर्शन में पसीना बहाया था और सार्वजनिक मंचों पर उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया था। अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि जिस कोच ने भारतीय कुश्ती की गाथा को वैश्विक सिनेमाई पटल पर अमर करने में केंद्रीय भूमिका निभाई, आज उसे अपने ही गृह राज्य में एक छत की मरम्मत के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।
हताश होती युवा प्रतिभाएं: टूटने लगा अखाड़े की परंपरा का दम
इंदौर शहर का इतिहास पारंपरिक अखाड़ा संस्कृति का केंद्र रहा है, जहां चंदू पहलवान, मास्टर चंदगीराम और खलीफाओं की छत्रछाया में पीढ़ियों ने पहलवानी सीखी है। मल्हार आश्रम केंद्र का मुख्य उद्देश्य इसी परंपरा को आधुनिक मैट कुश्ती से जोड़कर आर्थिक रूप से निर्बल परिवारों के बच्चों को निशुल्क विश्वस्तरीय प्रशिक्षण देना था।
किंतु वर्तमान बदहाली ने युवा खिलाड़ियों के मनोबल को बुरी तरह तोड़ दिया है। आधुनिक सुविधाओं से लैस निजी अकादमियों में भारी फीस चुकाने में असमर्थ कई प्रतिभाशाली पहलवान सुविधाओं के अभाव और लगातार गीले रहने वाले मैट के कारण चोटिल होकर खेल छोड़ने का मन बना रहे हैं। कोच बिश्नोई का कहना है कि वे किसी भी युवा को भारत का चैंपियन बनाने के लिए अपना खून-पसीना बहाने को तैयार हैं, किंतु जब छत ही सिर पर गिरने लगे और बुनियादी मानवीय गरिमा भी दांव पर लग जाए, तो अकेले एक कोच का हौसला भी जवाब देने लगता है।
Dangal Coach Kripa Shankar: निष्कर्ष
इंदौर के मल्हार आश्रम अखाड़े की बदहाली केवल एक जर्जर इमारत का मामला नहीं है, बल्कि यह खेल व्यवस्था की उस संवेदनहीनता का आईना है जो पदकों की चमक पर तालियां तो बजाती है, किंतु पदकों की नींव तैयार करने वाले अखाड़ों और गुरुओं को बिसार देती है। यदि समय रहते भारतीय खेल प्राधिकरण और मध्य प्रदेश खेल विभाग ने इस केंद्र की सुध नहीं ली, तो न केवल एक ऐतिहासिक अखाड़ा हमेशा के लिए बंद हो जाएगा, बल्कि देश कई भावी अंतरराष्ट्रीय पदकों से भी वंचित रह जाएगा। कृपा शंकर बिश्नोई का यह मौन सत्याग्रह खेल प्रशासकों के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि वे कागजी योजनाओं से बाहर निकलकर जमीन पर पसीना बहाने वाले पहलवानों को सम्मानजनक और सुरक्षित बुनियादी ढांचा प्रदान करें।
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