रुपया 91 के पार, एशिया की सबसे कमजोर करेंसी बना भारतीय मुद्रा, क्या सच में कमजोर रुपये से बढ़ता है निर्यात? जानें पूरी सच्चाई
2026 में 6% गिरावट, FPI ने ₹1.66 लाख करोड़ निकाले, ट्रंप के 50% टैरिफ से निर्यात प्रभावित, आयात महंगा
Indian Rupee News: भारतीय रुपये की गिरावट ने अब चिंताजनक स्तर छू लिया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 90 की मनोवैज्ञानिक सीमा तोड़ते हुए 91 के पार पहुंच गया है। दिसंबर 2025 में रुपया इंट्राडे में 91.14 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिरा और 90.93 पर बंद हुआ। फरवरी 2026 में भी रुपया 90.60-90.70 के दायरे में कमजोर बना हुआ है। साल 2025 में भारतीय मुद्रा में 6 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज हुई, जिसने इसे एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बना दिया। यह 2022 के बाद रुपये की सबसे बड़ी सालाना गिरावट है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं। इस गिरावट ने एक पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है कि क्या कमजोर रुपया सच में भारत के निर्यात को फायदा पहुंचाता है या यह सिर्फ एक भ्रम है।
Indian Rupee News: रुपये की गिरावट के पीछे के प्रमुख कारण
भारतीय रुपये की इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे बड़ा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की रिकॉर्ड निकासी है। साल 2025 में एफपीआई ने भारतीय इक्विटी से ₹1.66 लाख करोड़ निकाले जो अब तक की सबसे बड़ी निकासी है। जनवरी 2026 में ही ₹29,315 करोड़ की अतिरिक्त बिकवाली हुई। दूसरा बड़ा कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत तक लगाए गए भारी टैरिफ हैं, जो चीन पर लगे टैरिफ से भी अधिक हैं।
तीसरा कारण अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में लगातार देरी है जिसने निवेशकों की भावनाओं को कमजोर किया है। इसके अलावा आरबीआई की रेपो दर में 25 बेसिस पॉइंट की कटौटी और 1.4 लाख करोड़ रुपये की लिक्विडिटी इंजेक्शन ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया।
कमजोर रुपये से निर्यात बढ़ता है, यह धारणा कितनी सही
आम तौर पर माना जाता है कि जब किसी देश की करेंसी कमजोर होती है तो उसका निर्यात सस्ता हो जाता है और विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। लेकिन भारत के मामले में यह सिद्धांत पूरी तरह लागू नहीं होता। अमेरिकी टैरिफ लागू होने के बाद भारत का अमेरिका को निर्यात सितंबर 2025 में 12 प्रतिशत और अक्टूबर में 8.5 प्रतिशत गिरा। हालांकि नवंबर में 22.6 प्रतिशत की तेज बढ़त दर्ज हुई, लेकिन यह उछाल अस्थायी कारणों से था।
असल बात यह है कि जब किसी देश पर 50 प्रतिशत जैसे भारी टैरिफ लगे हों तो करेंसी की 5-6 प्रतिशत गिरावट से निर्यात प्रतिस्पर्धा में कोई खास फर्क नहीं पड़ता। अक्टूबर 2025 में भारत का व्यापार घाटा 41.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो साबित करता है कि कमजोर रुपये ने निर्यात से ज्यादा आयात बिल को बढ़ाया।
Indian Rupee News: कमजोर रुपये का आम आदमी पर क्या पड़ता है असर
कमजोर रुपये का सबसे सीधा असर आयातित वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 90 प्रतिशत आयात करता है और रुपये की गिरावट से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस महंगी हो सकती है। इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन, खाद्य तेल और सोना जैसी आयातित चीजें भी महंगी होती हैं। विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों की जेब पर भी सीधा बोझ पड़ता है।
हालांकि भारत की मुद्रास्फीति अभी नियंत्रण में है और जीडीपी विकास दर 8 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है, इसलिए अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रुपये की गिरावट से आयातित महंगाई का प्रभाव कुछ हद तक अवशोषित हो सकता है। लेकिन अगर गिरावट लंबे समय तक जारी रही तो इसका असर खुदरा कीमतों पर दिखना तय है।
आरबीआई क्या कर रहा है और आगे क्या होगा
भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है लेकिन उसका रवैया सतर्क है। सरकारी बैंकों के माध्यम से आरबीआई डॉलर बेचकर रुपये को सहारा दे रहा है, लेकिन किसी निश्चित स्तर पर बचाव करने की बजाय बाजार को धीरे-धीरे अपना स्तर खोजने दे रहा है। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में स्पष्ट किया कि रुपये का मूल्य बाजार द्वारा निर्धारित होता है और सरकार का कोई लक्ष्य या बैंड निर्धारित नहीं है।
विश्लेषकों के अनुसार अगर अमेरिका-भारत व्यापार समझौता मार्च 2026 से पहले नहीं होता तो रुपया 92 तक फिसल सकता है। नोमुरा और एसएंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस दोनों ने मार्च 2026 तक रुपये के 92 के स्तर तक पहुंचने का अनुमान लगाया है। हालांकि कुछ विश्लेषक मानते हैं कि व्यापार समझौता होने पर रुपया 88 के स्तर तक मजबूत हो सकता है।
Indian Rupee News: निवेशकों और कारोबारियों के लिए क्या है सलाह
मौजूदा हालात में निवेशकों और कारोबारियों को कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। आयातकों को अपने डॉलर भुगतानों की हेजिंग करनी चाहिए ताकि भविष्य में और गिरावट से बचाव हो सके। कई आयातक पहले से ही सक्रिय रूप से डॉलर खरीद रहे हैं जबकि निर्यातक अपनी डॉलर कमाई को रोके बैठे हैं क्योंकि उन्हें रुपये में और गिरावट की उम्मीद है। यह व्यवहार अपने आप में रुपये पर दबाव बढ़ा रहा है। निर्यातकों को अपनी डॉलर कमाई का समय पर रूपांतरण करना चाहिए ताकि अचानक रुपये में मजबूती आने पर नुकसान न हो।
इक्विटी निवेशकों के लिए विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा स्तर पर भारतीय बाजार में निवेश का अच्छा अवसर हो सकता है, लेकिन रुपये की कमजोरी और व्यापार नीति की अनिश्चितता को ध्यान में रखना जरूरी है। एसएंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस की एशिया-प्रशांत अर्थशास्त्र प्रमुख के अनुसार फिलहाल रुपया अपने वास्तविक मूल्य से कम पर कारोबार कर रहा है और अमेरिका-भारत व्यापार समझौते पर स्पष्टता आने के बाद इसमें सुधार की उम्मीद है। भारत ने हाल ही में यूरोपीय संघ के साथ एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता भी किया है जिसे अमेरिकी व्यापार नीतियों के खिलाफ रणनीतिक बचाव माना जा रहा है और यह समझौता आने वाले समय में रुपये को कुछ सहारा दे सकता है। कुल मिलाकर रुपये की दिशा अब काफी हद तक अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता की सफलता, एफपीआई प्रवाह की दिशा और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्य के लिए है। मुद्रा बाजार में जोखिम शामिल है। कोई भी निवेश या व्यापारिक निर्णय लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श करें।
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