India Russia Oil Trade: रूस से तेल खरीद पर भारत पर 100% टैरिफ का प्रस्ताव

अमेरिकी संसद में भारत-चीन समेत 10 देशों को प्रस्तावित टैरिफ सूची में शामिल करने की मांग

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India Russia Oil Trade: रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच जारी कूटनीतिक विमर्श के बीच अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील विधायी घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी कांग्रेस में रूस पर आर्थिक शिकंजा कसने के लिए पेश किए गए एक नए प्रतिबंध विधेयक पर प्रक्रिया तेज हो गई है। इस विधेयक के मूल प्रारूप में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह विवेकाधीन अधिकार देने का प्रावधान है कि वे रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों से अमेरिका आने वाले आयातों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम दंडात्मक टैरिफ लगा सकें। इस बीच, प्रतिनिधि सभा में पेश किए गए एक नए संशोधन के जरिए भारत और चीन सहित दस देशों को इस संभावित टैरिफ व्यवस्था में सीधे नामजद करने का प्रस्ताव रखा गया है।

हालांकि, कूटनीतिक और व्यापारिक दृष्टि से यह स्पष्ट समझना आवश्यक है कि भारत पर ऐसा कोई टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। यह प्रस्ताव केवल अमेरिकी संसद की जटिल विधायी प्रक्रिया के अंतर्गत पेश किए गए संशोधनों का हिस्सा है। अमेरिकी सांसदों के बीच राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने और भारत जैसे रणनीतिक साझेदार को इस दायरे में खींचने को लेकर गंभीर मतभेद भी उभरकर सामने आए हैं। अंतिम कानून का स्वरूप क्या होगा, यह प्रतिनिधि सभा में होने वाली आगामी चर्चा, मतदान और द्विदलीय वार्ताओं के बाद ही तय हो सकेगा।

India Russia Oil Trade: सीनेट से भारी बहुमत के बाद अब हाउस में बहस

अमेरिकी संसद में जिस कानून पर विचार किया जा रहा है, उसे ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ (Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act) के नाम से आगे बढ़ाया गया है। इस विधेयक का प्राथमिक उद्देश्य रूस के ऊर्जा राजस्व को पूरी तरह बाधित करना और उसकी अर्थव्यवस्था पर अभूतपूर्व दबाव बनाना है, ताकि यूक्रेन युद्ध के लिए मिलने वाले वित्तीय संसाधनों पर अंकुश लगाया जा सके। अमेरिकी सीनेट (Senate) पहले ही इस कड़े कानून को 86 के मुकाबले 11 मतों के भारी बहुमत से पारित कर अपनी सहमति दे चुकी है।

सीनेट से पारित होने के बाद अब यह विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के पटल पर पहुंचा है। इस प्रस्तावित कानून का सबसे विवादास्पद और प्रभावशाली हिस्सा वह द्वितीयक प्रतिबंध (Secondary Sanctions) ढांचा है, जिसके तहत रूसी ऊर्जा क्षेत्र से लेन-देन करने वाले तीसरे देशों पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाने का प्रावधान किया गया है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करता रहा है, इसलिए इस विधेयक के तकनीकी शब्दों और कानूनी शक्तियों पर भारतीय रणनीतिकारों की पैनी नजर बनी हुई है।

प्रतिनिधि सभा में संशोधन: भारत, चीन सहित दस देशों को सूची में जोड़ने का प्रस्ताव

सीनेट द्वारा पारित मूल संस्करण में रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदने वाले देशों के खिलाफ सामान्य प्रावधान रखे गए थे, किंतु किसी देश का नाम सीधे तौर पर अधिनियम की धारा में अंकित नहीं था। अब प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ सांसद स्टेनी होयर की ओर से एक विशेष संशोधन पेश किया गया है। इस संशोधन में भारत और चीन को सीधे लक्षित करते हुए कुल 10 देशों को इस संभावित 100 प्रतिशत टैरिफ व्यवस्था में स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करने की मांग की गई है।

प्रस्तावित संशोधन के तहत भारत और चीन के अतिरिक्त तुर्किये, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाकिया, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर, कजाखस्तान और किर्गिज गणराज्य जैसे ऊर्जा खरीदार और पारगमन देशों के नाम शामिल किए गए हैं। इस प्रस्ताव का उद्देश्य इन देशों को स्पष्ट संदेश देना है कि यदि उन्होंने रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद में कमी नहीं की, तो उन्हें अमेरिकी बाजार में प्रवेश के लिए भारी व्यापारिक लागत चुकानी पड़ सकती है। फिर भी, यह प्रस्ताव अभी केवल एक सांसद की ओर से पेश संशोधन है और इसे अंतिम कानून की मान्यता प्राप्त नहीं हुई है।

भारत पर अभी लागू नहीं हुआ कोई टैरिफ, अमेरिकी सांसदों में भी गहरे मतभेद

इस खबर के सार्वजनिक होने के बाद पैदा हुई आशंकाओं के बीच यह तथ्य समझना जरूरी है कि भारत के किसी भी निर्यात पर फिलहाल 100 प्रतिशत आयात शुल्क लागू नहीं हुआ है। अमेरिकी संसदीय प्रणाली के तहत किसी भी संशोधन को कानून बनने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त सहमति और राष्ट्रपति के आधिकारिक हस्ताक्षर की अनिवार्यता होती है। प्रतिनिधि सभा में प्रस्तुत यह संशोधन अभी केवल प्रारंभिक समीक्षा और बहस के स्तर पर है।

इतना ही नहीं, प्रतिनिधि सभा के भीतर ही एक दूसरा समानांतर संशोधन भी पेश किया गया है, जिसमें राष्ट्रपति को बिना किसी सीमा के 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का एकतरफा अधिकार देने वाले प्रावधान को पूरी तरह निरस्त करने की मांग की गई है। कई अमेरिकी नीति-निर्माताओं का मानना है कि इस तरह के अत्यधिक कठोर द्वितीयक प्रतिबंधों से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है, अमेरिकी बाजार में खुदरा महंगाई बढ़ सकती है और भारत जैसे महत्वपूर्ण क्वाड (QUAD) साझेदार के साथ रणनीतिक संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा हो सकता है। यह आंतरिक मतभेद दर्शाता है कि बिल के अंतिम स्वरूप को लेकर अभी लंबा विधायी संघर्ष शेष है।

रूस से भारत का तेल आयात और ऊर्जा सुरक्षा की संप्रभु नीति

वर्ष 2022 में यूक्रेन संकट के शुरू होने के बाद जब यूरोपीय देशों और अमेरिका ने रूस पर व्यापक वित्तीय प्रतिबंध लगाए, तब रूस ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी छूट पर कच्चे तेल की पेशकश शुरू की थी। भारत ने अपनी विशाल 1.4 अरब की आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने, घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखने और विदेशी मुद्रा के अत्यधिक बहिर्वाह को रोकने के लिए रूस से तेल की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि की। आज रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन चुका है।

भारत सरकार और विदेश मंत्रालय ने वैश्विक मंचों पर हमेशा यह स्पष्ट और दृढ़ रुख बनाए रखा है कि उसकी ऊर्जा खरीद पूरी तरह से राष्ट्रीय हित और बाजार की व्यावहारिक परिस्थितियों पर आधारित है। भारत का यह भी तर्क रहा है कि यदि भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल को वैश्विक बाजार से बाहर होने दिया होता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के दाम 150 डॉलर प्रति बैरल के पार चले जाते, जिससे समूचे विश्व में भयानक मुद्रास्फीति का संकट खड़ा हो जाता। भारत की इस व्यावहारिक नीति ने वैश्विक तेल बाजार में मूल्य स्थिरता बनाए रखने में एक बफर का कार्य किया है।

100% टैरिफ का संभावित अर्थ और भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार पर प्रभाव

यदि भविष्य में इस प्रकार का कठोर टैरिफ प्रावधान कानून का रूप लेता है और अमेरिकी प्रशासन उसका वास्तविक उपयोग करता है, तो इसका तात्पर्य यह होगा कि अमेरिका में आयात होने वाले भारतीय सामानों पर शत-प्रतिशत सीमा शुल्क लगाया जा सकेगा। इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की लागत दोगुनी हो जाएगी और वे स्थानीय या अन्य देशों के उत्पादों के सामने अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता खो देंगे।

भारत और अमेरिका के बीच आज द्विपक्षीय व्यापार 190 अरब डॉलर से अधिक के ऐतिहासिक स्तर पर है, जिसमें सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा, ऑटो-कंपोनेंट्स और समुद्री उत्पाद प्रमुख निर्यात मदें हैं। ऐसे में यदि किसी द्वितीयक प्रतिबंध के जरिए भारतीय व्यापार को निशाना बनाया जाता है, तो इसका नकारात्मक असर न केवल भारतीय निर्यातकों पर पड़ेगा बल्कि अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं को भी दवाओं और तकनीकी सेवाओं के लिए अधिक कीमत चुकानी होगी। यही कारण है कि अमेरिकी कॉरपोरेट और राजनयिक हलकों में भी इस तरह के कठोर कदमों का आंतरिक विरोध देखा जा रहा है।

India Russia Oil Trade: भारत के लिए रणनीतिक विकल्प

इस कानून को लागू होने से पहले अभी कई अनिवार्य विधायी चरणों से गुजरना होगा। यदि प्रतिनिधि सभा स्टेनी होयर के संशोधन के साथ या किसी नए प्रारूप में इस विधेयक को पारित करती है, तो सीनेट और प्रतिनिधि सभा के बीच मतभेदों को सुलझाने के लिए एक संयुक्त सम्मेलन समिति (Conference Committee) का गठन करना पड़ेगा। दोनों सदनों में एक समान भाषा पर सहमति बनने के उपरांत ही अंतिम मसौदा अमेरिकी राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जा सकेगा, जहां राष्ट्रपति के पास वीटो (Veto) का अधिकार भी सुरक्षित रहता है।

यदि यह प्रावधान कानून का हिस्सा बन भी जाता है, तब भी आमतौर पर ऐसे कानूनों में राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा हितों (National Security Waiver) के आधार पर किसी मित्र देश को प्रतिबंधों से छूट देने का अधिकार प्राप्त होता है। भारत के पास वाशिंगटन में मजबूत राजनयिक पैरवी, रणनीतिक सहयोग और ऊर्जा कूटनीति के जरिए अपने हितों की रक्षा करने के पर्याप्त विकल्प मौजूद हैं। आने वाले दिनों में अमेरिकी कांग्रेस में होने वाले मतदान और भारत सरकार की आधिकारिक कूटनीतिक प्रतिक्रिया ही इस पूरे विवाद की वास्तविक दिशा तय करेगी।

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