Protein Powder Buying Tips: जिम के बाद जो प्रोटीन पाउडर पी रहे हैं, कहीं नकली तो नहीं? खरीदने से पहले ये बातें जरूर जान लें
Protein Powder Buying Tips: जिम के बाद जो प्रोटीन पाउडर पी रहे हैं, कहीं नकली तो नहीं? खरीदने से पहले ये बातें जरूर जान लें
Protein Powder Buying Tips: जिम के बाद प्रोटीन शेक पीना आजकल कई लोगों की आदत बन चुकी है। लेकिन क्या डिब्बे पर लिखी मात्रा वाकई सही होती है? रांची के अंकित जैसे कई युवा हर रोज व्हे प्रोटीन लेते हैं, लेकिन सस्ते प्रोडक्ट देखकर शक होने लगता है। भारत में हुई लैब स्टडीज बताती हैं कि कुछ प्रोटीन सप्लीमेंट्स में लेबल पर लिखी प्रोटीन और असल में मिली प्रोटीन में फर्क पाया गया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि बाजार का हर पाउडर नकली है। फिर भी अगली बार डिब्बा खरीदने से पहले कुछ जरूरी बातें चेक कर लेना बेहतर है।
भारत में हुई स्टडी में प्रोटीन पाउडर को लेकर क्या सामने आया?
साल 2024 में मेडिसिन जर्नल में छपी एक भारतीय स्टडी में बाजार के 36 प्रोटीन सप्लीमेंट्स की लैब जांच की गई। इनमें व्हे, प्लांट और अन्य तरह के प्रोडक्ट शामिल थे। जांच में 36 में से 25 प्रोडक्ट्स यानी करीब 69.4 प्रतिशत में डिब्बे पर लिखी प्रोटीन की मात्रा और लैब में मिली मात्रा अलग निकली। असल प्रोटीन कम मिली। कुछ मामलों में यह कमी 10 प्रतिशत से ज्यादा थी, जबकि कुछ सैंपल्स में 50 प्रतिशत से भी अधिक का अंतर देखा गया। कुछ प्रोडक्ट्स में सीसा और कैडमियम जैसी हैवी मेटल्स के साथ अफ्लाटॉक्सिन और पेस्टीसाइड के अंश भी मिले। स्टडी में सिर्फ 36 सैंपल्स लिए गए थे, इसलिए पूरे बाजार को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
2025 की स्टडी में क्या अंतर दिखा?
साल 2025 में आई एक और भारतीय लैब स्टडी में 34 व्हे प्रोटीन पाउडर की जांच हुई। इनमें 18 को मेडिकल-फार्मास्युटिकल और 16 को न्यूट्रास्यूटिकल कैटेगरी में रखा गया। मेडिकल-फार्मास्युटिकल कैटेगरी के 18 प्रोडक्ट्स में से 83 प्रतिशत में पैकेट पर लिखी और जांच में मिली प्रोटीन की मात्रा के बीच 5 प्रतिशत से ज्यादा का अंतर पाया गया। न्यूट्रास्यूटिकल प्रोडक्ट्स में यह अंतर अपेक्षाकृत कम रहा। कुछ सैंपल्स में हैवी मेटल्स और अफ्लाटॉक्सिन भी मिले। रिसर्चर्स ने बताया कि टॉरिन जैसी चीजों के कारण नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ सकती है, जिससे सिर्फ नाइट्रोजन देखकर असली प्रोटीन का सही अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है।
प्रोटीन पाउडर खरीदते समय क्या-क्या चेक करें?
किसी प्रोडक्ट को सिर्फ डिब्बा देखकर नकली साबित करना संभव नहीं है, लेकिन कुछ संकेत मदद कर सकते हैं। सबसे पहले सील और पैकिंग देखें। अगर सील टूटी हो, ढक्कन ढीला हो या छेड़छाड़ के निशान हों तो न खरीदें। एफएसएसएआई की स्पोर्ट्स सप्लीमेंट गाइडेंस में भी पैकेज सही बंद होने की जांच की सलाह दी गई है। लेबल पर प्रोटीन की मात्रा, इंग्रीडिएंट्स, सर्विंग साइज, कंपनी का नाम, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट साफ होनी चाहिए। बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट जरूर चेक करें। अगर तारीख मिटाई हुई या दोबारा चिपकी हुई लगे तो बचें।
क्यूआर कोड, कीमत और बिल का क्या महत्व है?
कई कंपनियां क्यूआर कोड, बारकोड या स्क्रैच कोड देती हैं। एफएसएसएआई भी मैन्युफैक्चरर के जरिए इनसे प्रोडक्ट की पहचान जांचने की सलाह देता है। लेकिन क्यूआर कोड खुल जाने से सिर्फ यह पता चलता है कि प्रोडक्ट असली है या नहीं। असल प्रोटीन कितनी है या कोई अनचाही चीज है या नहीं, यह सिर्फ लैब जांच से पता चल सकता है। अगर कोई फेमस ब्रांड आम कीमत से बहुत सस्ता मिल रहा है तो सावधानी बरतें। सिर्फ सस्ता होने से नकली साबित नहीं होता, लेकिन भरोसेमंद विक्रेता से खरीदना और बिल लेना जरूरी है। बिल रखने से बाद में शिकायत करने में मदद मिलती है।
क्या हर प्रोटीन पाउडर नकली होता है और घर पर कैसे पहचानें?
नहीं। ऊपर बताई दोनों स्टडीज सीमित सैंपल्स पर हुई थीं। इसलिए पूरे बाजार के हर पाउडर को नकली कहना सही नहीं है। सोशल मीडिया पर पानी में घोलकर, स्वाद या झाग देखकर पहचानने के तरीके बताए जाते हैं, लेकिन इनसे क्वालिटी की पक्की पुष्टि नहीं होती। ज्यादा या कम घुलना अपने आप प्रोटीन कम या नकली होने का सबूत नहीं है। अगर गंभीर शक है तो लैब जांच ही भरोसेमंद तरीका है। एफएसएसएआई के नियमों के तहत हेल्थ सप्लीमेंट और न्यूट्रास्यूटिकल प्रोडक्ट्स के लिए अलग स्टैंडर्ड मौजूद हैं। प्रोटीन पाउडर को पूरी डाइट का विकल्प न मानें। दाल, दूध, दही, अंडा, पनीर, सोया और अन्य प्राकृतिक प्रोटीन स्रोतों को भी शामिल करें। जरूरत पड़ने पर डाइट एक्सपर्ट या डॉक्टर से सलाह लें।
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