35 की उम्र के बाद महिलाओं का वजन क्यों बढ़ने लगता है? जानें हार्मोनल बदलाव, तनाव और नींद की कमी के कारण
हार्मोनल बदलाव, धीमा मेटाबॉलिज्म, तनाव और खराब नींद बढ़ते वजन के प्रमुख कारण हो सकते हैं।
Weight Gain After 35 in Women: मानव शरीर में तीस और पैंतीस वर्ष की आयु के बाद जैविक और शारीरिक स्तर पर कई क्रमिक बदलाव आने शुरू हो जाते हैं। भारतीय महिलाओं में विशेष रूप से 35 की उम्र पार करते ही यह शिकायत आम तौर पर देखी जाती है कि उनका वजन अप्रत्याशित रूप से बढ़ने लगा है। कई बार खानपान की आदतों या दैनिक दिनचर्या में कोई बड़ा फेरबदल न होने के बावजूद कपड़े तंग होने लगते हैं और विशेषकर कमर तथा पेट के आसपास चर्बी जमा होने लगती है। चिकित्सा विशेषज्ञों और पोषण वैज्ञानिकों के अनुसार, इस आयु वर्ग में वजन का बढ़ना केवल अधिक कैलोरी लेने का परिणाम नहीं होता, बल्कि इसके पीछे शरीर की चयापचय दर में गिरावट, मांसपेशियों के घनत्व में कमी, हार्मोनल असंतुलन, मानसिक तनाव, अधूरी नींद और छिपी हुई अंतःस्रावी समस्याएं जैसे कई बहुआयामी कारक एक साथ कार्य कर रहे होते हैं।
Weight Gain After 35 in Women: मेटाबॉलिज्म की सुस्ती और मांसपेशियों का क्षरण
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, तीस वर्ष की आयु के पश्चात प्राकृतिक रूप से प्रति दशक मांसपेशियों के द्रव्यमान में तीन से आठ प्रतिशत तक की कमी आने लगती है, जिसे चिकित्सीय भाषा में ‘सारकोपेनिया’ कहा जाता है। चूंकि मांसपेशियां शरीर के सबसे सक्रिय मेटाबॉलिक ऊतक होती हैं और वे विश्राम की अवस्था में भी वसा की तुलना में कहीं अधिक कैलोरी की खपत करती हैं, इसलिए मांसपेशियों के घटने से शरीर की बेसल मेटाबॉलिक रेट (BMR) धीमी पड़ जाती है।
धीमे मेटाबॉलिज्म का सीधा अर्थ यह है कि शरीर को दैनिक कार्यों के संचालन के लिए पहले की तुलना में कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यदि कोई महिला पैंतीस वर्ष की आयु के बाद भी ठीक उतना ही भोजन ग्रहण कर रही है जितना वह पच्चीस वर्ष की उम्र में करती थी, और उसकी शारीरिक सक्रियता में कोई वृद्धि नहीं हुई है, तो वह अतिरिक्त ऊर्जा वसा के रूप में संचित होने लगती है। इस जैविक सुस्ती को तोड़ने के लिए नियमित शक्ति प्रशिक्षण यानी स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और पर्याप्त प्रोटीन का सेवन अनिवार्य हो जाता है।
हार्मोनल बदलाव और पेरिमेनोपॉज की प्रारंभिक दस्तक
पैंतीस की उम्र के बाद कई महिलाओं का शरीर रजोनिवृत्ति से पूर्व के संक्रमण काल यानी पेरिमेनोपॉज के शुरुआती चरण में प्रवेश करने लगता है। हालांकि पूर्ण मेनोपॉज आमतौर पर 45 से 52 वर्ष के बीच होता है, लेकिन उसके जैविक संकेत कई वर्ष पूर्व ही दिखाई देने लगते हैं। इस दौरान अंडाशय द्वारा स्रावित होने वाले मुख्य महिला हार्मोन एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के स्तर में अनियमित उतार-चढ़ाव प्रारंभ हो जाता है।
जब शरीर में एस्ट्रोजन के स्तर में असंतुलन उत्पन्न होता है, तो वसा वितरण की प्रणाली भी बदल जाती है। युवावस्था में जहां वसा मुख्य रूप से कूल्हों और जांघों पर जमा होती है, वहीं एस्ट्रोजन के घटने पर शरीर वसा को विसरल फैट के रूप में पेट और आंतरिक अंगों के चारों ओर जमा करने लगता है। इसके साथ ही प्रोजेस्टेरोन का स्तर गिरने से शरीर में वाटर रिटेंशन यानी जल भराव और पेट फूलने की समस्या भी बढ़ जाती है, जिससे वजन के कांटे पर अचानक उछाल दिखाई देने लगता है।
क्रोनिक तनाव और कोर्टिसोल का दुष्चक्र
पैंतीस से चालीस वर्ष की आयु महिलाओं के जीवन का वह पड़ाव होता है जब उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियों, बच्चों की शिक्षा, बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल और पेशेवर करियर का दोहरा दबाव चरम पर होता है। लंबे समय तक लगातार बने रहने वाले इस मानसिक तनाव के कारण अधिवृक्क ग्रंथियों से ‘कोर्टिसोल’ नामक तनाव हार्मोन का निरंतर स्राव होता रहता है।
रक्त में कोर्टिसोल का लगातार उच्च स्तर रक्त शर्करा को असंतुलित करता है और मस्तिष्क को मीठे, वसायुक्त और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की तीव्र लालसा के संकेत भेजता है। इसके अतिरिक्त, कोर्टिसोल शरीर को यह जैविक संदेश देता है कि वह आपातकालीन स्थिति के लिए पेट के आसपास चर्बी जमा करके रखे। नतीजतन, अत्यधिक तनाव में रहने वाली महिलाएं चाहकर भी अपना वजन घटाने में सफल नहीं हो पाती हैं।
नींद की गुणवत्ता में गिरावट और इंसुलिन प्रतिरोध
घर और दफ्तर के व्यस्त कार्यक्रम के चलते अक्सर महिलाएं अपनी नींद के साथ समझौता करती हैं। प्रतिदिन छह घंटे से कम नींद लेने पर शरीर की भूख नियंत्रित करने वाली अंतःस्रावी प्रणाली पूरी तरह गड़बड़ा जाती है। नींद पूरी न होने से भूख बढ़ाने वाले हार्मोन ‘घ्रेलिन’ का स्तर बढ़ जाता है, जबकि तृप्ति का अहसास कराने वाले हार्मोन ‘लेप्टिन’ के स्राव में कमी आ जाती है।
नींद की कमी का दूसरा सबसे बड़ा दुष्प्रभाव कोशिकाओं की इंसुलिन संवेदनशीलता पर पड़ता है। जब कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति प्रतिरोधी होने लगती हैं, तो रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ता है और अग्न्याशय को अधिक इंसुलिन बनाना पड़ता है। अतिरिक्त इंसुलिन शरीर में वसा संचयन को तेज कर देता है और जमा चर्बी को पिघलने से रोकता है। यही कारण है कि अधूरी नींद और देर रात तक जागने की आदत वजन घटाने के सभी प्रयासों पर पानी फेर देती है।
हाइपोथायरायडिज्म और पीसीओएस जैसी अंतर्निहित चिकित्सीय स्थितियां
पैंतीस वर्ष की आयु के बाद वजन बढ़ने के पीछे केवल जीवनशैली ही नहीं, बल्कि कुछ नैदानिक विकार भी जिम्मेदार हो सकते हैं। भारत में महिलाओं में थायराइड ग्रंथि की निष्क्रियता यानी हाइपोथायरायडिज्म अत्यंत व्यापक समस्या है। जब थायराइड ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में थायरोक्सिन हार्मोन का उत्पादन नहीं कर पाती, तो शरीर की संपूर्ण चयापचय प्रक्रिया सुस्त हो जाती है, जिससे अनपेक्षित रूप से वजन बढ़ना, अत्यधिक थकान, शुष्क त्वचा और बालों का झड़ना शुरू हो जाता है।
इसी प्रकार, यदि किसी महिला को लंबे समय से पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) की समस्या रही है, तो उम्र बढ़ने के साथ उसका इंसुलिन प्रतिरोध और अधिक जटिल रूप ले सकता है, जिससे पेट की चर्बी तेजी से बढ़ती है। इसके अलावा, कुछ नियमित रूप से ली जाने वाली दवाएं जैसे एंटी-डिप्रेसेंट्स, ब्लड प्रेशर की गोलियां या हार्मोनल गर्भनिरोधक भी वजन में वृद्धि का कारक बन सकते हैं। इसलिए अचानक वजन बढ़ने पर सबसे पहले चिकित्सक से मिलकर बुनियादी रक्त जांच कराना बुद्धिमानी है।
Weight Gain After 35 in Women: सदाबहार स्वास्थ्य और वजन प्रबंधन के व्यावहारिक सूत्र
पैंतीस की उम्र के बाद वजन को नियंत्रित रखने और ऊर्जावान बने रहने के लिए अत्यधिक कम कैलोरी वाली ‘क्रैश डाइट’ अपनाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे मांसपेशियां और तेजी से घटती हैं तथा मेटाबॉलिज्म स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता है। इसके स्थान पर संतुलित और संपूर्ण खाद्य पदार्थों पर आधारित पोषण योजना बनानी चाहिए, जिसमें अंकुरित अनाज, दालें, हरी सब्जियां, मौसमी फल, मेवे और गुणवत्तापूर्ण प्रोटीन शामिल हों।
दैनिक दिनचर्या में सप्ताह में कम से कम तीन से चार दिन वजन उठाने वाले हल्के व्यायाम या योग का अभ्यास करें ताकि मांसपेशियों का द्रव्यमान सुरक्षित रहे। प्रतिदिन सात से आठ घंटे की शांत और निर्बाध नींद सुनिश्चित करें और मानसिक तनाव को कम करने के लिए प्राणायाम, ध्यान और प्रकृति के बीच टहलने की आदत डालें। यह समझना आवश्यक है कि 35 के बाद शरीर को सजा देने के बजाय उसकी बदलती जैविक जरूरतों का सम्मान करते हुए एक अनुशासित जीवनशैली अपनाना ही दीर्घकालिक आरोग्य की सच्ची कुंजी है।
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