Equity Mutual Fund Categories: इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश से पहले जान लें ये 11 जरूरी कैटेगरी, वरना हो सकता है नुकसान
Equity Mutual Fund Categories: इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश से पहले जान लें ये 11 जरूरी कैटेगरी, वरना हो सकता है नुकसान
Equity Mutual Fund Categories: देश में निवेश के अनेक विकल्प मौजूद हैं और इनमें से म्यूचुअल फंड एक ऐसा जरिया है जिसकी तरफ आम निवेशकों का रुझान लगातार बढ़ रहा है। शेयर बाजार, बैंक एफडी, सोना, बॉन्ड और सरकारी योजनाओं के साथ-साथ करोड़ों लोग अब एसआईपी और लंपसम के जरिए म्यूचुअल फंड में भी पैसा लगा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सीधे शेयर बाजार में निवेश करने की तुलना में म्यूचुअल फंड को अपेक्षाकृत कम जोखिम भरा माना जाता है। हालांकि अगर आप इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश करने की योजना बना रहे हैं, तो पैसा लगाने से पहले इसकी बारीकियां समझना बेहद जरूरी है। सेबी के नियमों के अनुसार इक्विटी म्यूचुअल फंड की कुल 11 कैटेगरी तय की गई हैं, जिनमें से हर एक की निवेश रणनीति और जोखिम का स्तर अलग होता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इक्विटी म्यूचुअल फंड आखिर होता क्या है और निवेश से पहले किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
इक्विटी म्यूचुअल फंड आखिर होता क्या है
बहुत से लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने का मतलब सीधे शेयर बाजार में निवेश करना है, जबकि हकीकत इससे थोड़ी अलग है। म्यूचुअल फंड मूल रूप से एक इक्विटी स्कीम भी हो सकती है और डेट स्कीम भी। इक्विटी म्यूचुअल फंड वह योजना होती है जो अपने फंड का बड़ा हिस्सा शेयरों में निवेश करती है। सेबी के नियमों के मुताबिक टैक्स के मकसद से किसी भी स्कीम को इक्विटी म्यूचुअल फंड माने जाने के लिए अपनी कुल संपत्ति का कम से कम 65 प्रतिशत हिस्सा भारतीय स्टॉक और इक्विटी से जुड़े साधनों में निवेश करना जरूरी होता है। यही वह मानक है जो इक्विटी फंड को अन्य फंड कैटेगरी से अलग बनाता है।
सेबी के नियमों में तय हैं 11 कैटेगरी
मार्केट रेगुलेटर सेबी ने इक्विटी म्यूचुअल फंड को कुल 11 अलग-अलग कैटेगरी में बांटा है, ताकि निवेशकों को अपनी जरूरत और जोखिम क्षमता के अनुसार सही विकल्प चुनने में आसानी हो। इनमें लार्ज कैप फंड, मिडकैप फंड, स्मॉल कैप फंड, फ्लेक्सी कैप फंड, लार्ज और मिड कैप फंड, डिविडेंड यील्ड फंड, वैल्यू फंड, कॉन्ट्रा फंड, फोकस्ड फंड, ईएलएसएस फंड और सेक्टोरल या थीमेटिक फंड शामिल हैं। हर कैटेगरी के लिए निवेश का एक तय प्रतिशत निर्धारित किया गया है, जिसका पालन फंड हाउस को करना अनिवार्य होता है। निवेश से पहले इन सभी कैटेगरी को समझना निवेशकों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।
लार्ज कैप, मिडकैप और स्मॉल कैप फंड में अंतर
इक्विटी लार्ज कैप फंड उन स्कीमों को कहा जाता है जिनके लिए अपनी संपत्ति का कम से कम 80 प्रतिशत हिस्सा बाजार पूंजीकरण के आधार पर शीर्ष 100 कंपनियों में निवेश करना अनिवार्य होता है। दूसरी तरफ मिडकैप फंड को अपनी संपत्ति का कम से कम 65 प्रतिशत हिस्सा उन कंपनियों में लगाना होता है जिनकी रैंकिंग 101 से 250 के बीच आती है। वहीं स्मॉल कैप फंड का दायरा और आगे बढ़ता है, जहां 251वीं रैंकिंग से नीचे की कंपनियों में कम से कम 65 प्रतिशत निवेश करना जरूरी है। सामान्य तौर पर लार्ज कैप को अपेक्षाकृत स्थिर माना जाता है, जबकि स्मॉल कैप में जोखिम और संभावित रिटर्न दोनों ज्यादा होते हैं।
फ्लेक्सी कैप और अन्य रणनीतिक फंड कैटेगरी
फ्लेक्सी कैप फंड की खासियत यह है कि यह लार्ज कैप, मिड कैप और स्मॉल कैप समेत विभिन्न क्षेत्रों में निवेश करने की आजादी रखता है, जिससे फंड मैनेजर बाजार की स्थिति के अनुसार पोर्टफोलियो बदल सकता है। लार्ज और मिड कैप फंड को अपनी संपत्ति का कम से कम 35 प्रतिशत हिस्सा लार्ज कैप और 35 प्रतिशत हिस्सा मिड कैप शेयरों में निवेश करना होता है। डिविडेंड यील्ड फंड उन कंपनियों पर फोकस करता है जो नियमित रूप से डिविडेंड देती हैं, जबकि वैल्यू फंड और कॉन्ट्रा फंड अलग-अलग निवेश सिद्धांतों पर आधारित होते हैं। फोकस्ड फंड की सीमा अधिकतम 30 शेयरों तक सीमित रहती है और यह ज्यादातर मल्टी कैप रणनीति अपनाता है।
ईएलएसएस फंड और टैक्स छूट का फायदा
निवेशकों के बीच ईएलएसएस यानी इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम फंड की मांग खासतौर पर टैक्स बचत के लिए देखी जाती है। इस स्कीम में तीन साल की अनिवार्य लॉक-इन अवधि होती है, यानी निवेशक इस दौरान अपना पैसा नहीं निकाल सकते। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें निवेश करने पर धारा 80सी के तहत 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स कटौती का लाभ मिलता है। यही वजह है कि टैक्स सेविंग की तलाश में रहने वाले निवेशक अक्सर ईएलएसएस फंड को प्राथमिकता देते हैं। इसके अलावा सेक्टोरल या थीमेटिक फंड किसी खास क्षेत्र या थीम पर केंद्रित होते हैं, जिनमें कम से कम 80 प्रतिशत निवेश उसी सेक्टर में करना अनिवार्य होता है।
एसआईपी और लंपसम में क्या है बुनियादी फर्क
म्यूचुअल फंड में निवेश करने के मुख्य रूप से दो तरीके होते हैं, एसआईपी और लंपसम। एसआईपी यानी सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान के जरिए निवेशक तय समय पर एक निश्चित राशि जमा करते हैं, जो मासिक, त्रैमासिक या सालाना आधार पर हो सकती है। यह तरीका वेतनभोगी और नियमित बचत करने वालों के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इसमें बाजार के उतार-चढ़ाव का असर औसतन कम पड़ता है। वहीं लंपसम में निवेशक एक ही बार में पूरी बड़ी राशि निवेश करते हैं, जो उन लोगों के लिए बेहतर विकल्प है जिनके पास बोनस या संपत्ति बिक्री जैसे स्रोतों से एकमुश्त रकम आती है। हालांकि लंपसम में बाजार का सही समय देखना जरूरी होता है, क्योंकि निवेश के तुरंत बाद बाजार गिरने पर नुकसान की आशंका बढ़ जाती है।
म्यूचुअल फंड आज के दौर में निवेश का एक भरोसेमंद और लोकप्रिय जरिया बन चुका है, लेकिन इक्विटी म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने से पहले इसकी अलग-अलग कैटेगरी और उनकी शर्तों को समझना जरूरी है। लार्ज कैप से लेकर सेक्टोरल फंड तक, हर कैटेगरी का जोखिम और रिटर्न प्रोफाइल अलग होता है, इसलिए अपनी जरूरत और जोखिम क्षमता के अनुसार ही सही विकल्प चुनना चाहिए। एसआईपी और लंपसम के बीच का अंतर समझना भी उतना ही जरूरी है, ताकि निवेश की रणनीति सही तरीके से तय की जा सके। ईएलएसएस जैसी स्कीमें टैक्स बचत का अतिरिक्त फायदा भी देती हैं, जिससे यह निवेशकों के बीच खासी लोकप्रिय है।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और यह निवेश की सलाह नहीं है। किसी भी निवेश का फैसला लेने से पहले प्रमाणित वित्तीय सलाहकार से परामर्श जरूर करें, क्योंकि बाजार की परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं।
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