2 चुनाव आयुक्तों ने EC में गड़बड़ी पर कैबिनेट सचिव को लिखी चिट्ठी, RTI से खुलासा, खत का क्या हुआ?
Election Commission RTI Letter: 2 चुनाव आयुक्तों ने EC में गड़बड़ी पर कैबिनेट सचिव को लिखी चिट्ठी, RTI से खुलासा, खत का क्या हुआ?
Election Commission RTI Letter: देश में एसआईआर को लेकर विवाद जारी रहने के बीच एक और बड़ा खुलासा सामने आया है। भारत के तीन चुनाव आयुक्तों में से दो सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को छोड़कर सीधे कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था। यह पत्र 29 जुलाई को एक विवादित वर्क-एलोकेशन ऑर्डर को लेकर लिखा गया था। इंडिया टुडे की रिपोर्ट और आरटीआई के जवाब से पता चला है कि ये पत्र वास्तव में कैबिनेट सचिवालय तक पहुंचे थे। दोनों आयुक्तों का मुख्य आयुक्त को बाईपास करना असामान्य कदम माना जा रहा है। इस मामले ने चुनाव आयोग के अंदरूनी कामकाज को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी पार्टियां पहले से एसआईआर पर हमलावर हैं और इस खुलासे ने विवाद को और बढ़ा दिया है।
Election Commission RTI Letter: दो चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र क्यों लिखा?
मामला 28 जुलाई के वर्क-एलोकेशन ऑर्डर से शुरू हुआ था। रिपोर्टों के मुताबिक दोनों आयुक्तों ने इस ऑर्डर पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ऑर्डर नियमों का उल्लंघन है और उनकी जानकारी तथा सहमति के बिना किए गए बदलाव थे। ये बदलाव वोटर लिस्ट के लिए इस्तेमाल होने वाले आईटी सिस्टम पर निगरानी की एक परत हटाने से जुड़े बताए गए। आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र न लिखकर सीधे कैबिनेट सचिव को लिखना चुना। यह कदम चुनाव आयोग के अंदर मतभेद को दर्शाता है। तीन सदस्यीय आयोग में दो आयुक्तों का मुख्य आयुक्त को छोड़ना गंभीर माना जा रहा है। बाद में इस नए एलोकेशन ऑर्डर को रद्द कर दिया गया। लेकिन पत्र लिखने की घटना ने आयोग के कामकाज पर सवाल खड़े कर दिए।
RTI से क्या खुलासा हुआ और पत्र कब पहुंचे?
आरटीआई आवेदन 24 सितंबर को दाखिल किया गया था। 19 अक्टूबर को कैबिनेट सचिवालय ने जवाब दिया। आरटीआई से मिले जवाब के अनुसार दोनों आयुक्तों के पत्र 29 जुलाई को कैबिनेट सचिवालय पहुंचे थे। इन्हें 30 जुलाई को लॉग किया गया। इसके बाद 5 अगस्त तक कैबिनेट सचिव ने पत्रों को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के अधिकारियों और मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय को भेज दिया। यह पहली बार आधिकारिक दस्तावेज के रूप में पुष्टि करता है कि पत्र मौजूद हैं और वे कब पहुंचे। आरटीआई से पेपर ट्रेल साफ हो गया है। हालांकि पत्रों की सामग्री अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।
पत्र में क्या था और आगे क्या हुआ?
सचिवालय ने अभी तक पत्रों का कंटेंट सार्वजनिक नहीं किया है। कुल 14 पन्ने के दस्तावेज हैं। इनमें आयुक्तों के 10 पन्ने के पत्र, दो पन्ने के जवाब और दो पन्ने की फाइल नोटिंग शामिल है। अगर ये दस्तावेज सामने आते हैं तो साफ हो सकेगा कि आयुक्तों ने असल में क्या लिखा था और कैबिनेट सचिव ने क्या जवाब दिया। रिपोर्टों के मुताबिक आयुक्तों ने वर्क-एलोकेशन ऑर्डर को नियमों के खिलाफ बताया था। ऑर्डर बाद में रद्द कर दिया गया। पत्रों को DoPT और सीईसी ऑफिस भेजने के बाद आगे की कार्रवाई के बारे में ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है। कई लोग दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं।
चुनाव आयोग का पक्ष क्या है?
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को प्रेस रिलीज जारी करके अपना पक्ष रखा। आयोग ने कहा कि कैबिनेट सचिव को लिखा गया पत्र किसी नीतिगत मामले या आईटी डिवीजन से जुड़ा नहीं था। यह चुनाव आयोग में डेप्युटेशन पर आए एक अधिकारी के काम से जुड़ा था। आयोग के मुताबिक उस अधिकारी द्वारा जारी किए गए काम के पुनर्वितरण के ऑर्डर को दोनों आयुक्तों के आदेश के बाद लागू नहीं किया गया। साथ ही डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर द्वारा आईटी डिवीजन पर निगरानी को वास्तव में कभी वापस नहीं लिया गया था। आयोग का कहना है कि मामला व्यक्तिगत अधिकारी से जुड़ा था न कि बड़े नीतिगत फैसले से।
यह मामला कितना गंभीर है और आगे क्या हो सकता है?
दो आयुक्तों द्वारा मुख्य आयुक्त को छोड़कर सीधे कैबिनेट सचिव को पत्र लिखना असामान्य कदम है। इससे आयोग के अंदर समन्वय की कमी के संकेत मिलते हैं। एसआईआर को लेकर पहले से चल रहे विवाद के बीच यह खुलासा और गंभीर हो गया है। आरटीआई से पुष्टि हो चुकी है कि पत्र पहुंचे थे और आगे भेजे गए। लेकिन सामग्री सार्वजनिक न होने से कई सवाल बाकी हैं। विपक्षी दल इस मुद्दे को उठा रहे हैं। आगे अगर दस्तावेज सार्वजनिक होते हैं तो पूरा मामला और साफ हो सकता है। फिलहाल चुनाव आयोग और सरकार दोनों के रुख पर नजरें टिकी हैं।
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