IMD monsoon update: गर्मी की आग में घी बना अल नीनो, नवंबर तक धधकेगी धरती; मॉनसून में देरी के बीच मौसम विभाग के नए अपडेट से बढ़ी चिंता
नवंबर तक तेज गर्मी, मॉनसून सुस्त। IMD का नया अपडेट, हीटवेव अलर्ट और कृषि पर खतरा।
IMD monsoon update: भारतीय उपमहाद्वीप में इस साल प्रकृति का मिजाज पूरी तरह से बदला हुआ और बेहद आक्रामक नजर आ रहा है। देश के अधिकांश हिस्सों में पहले से ही जारी भीषण और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के बीच प्रशांत महासागर से उठे वैश्विक मौसमी फेनोमेनन ‘अल नीनो’ (El Nino) ने जलती आग में घी डालने का काम किया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी किए गए नवीनतम और बेहद चौंकाने वाले वेदर अपडेट के अनुसार, अल नीनो का यह मारक प्रभाव केवल जून या जुलाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले नवंबर 2026 तक पूरी धरती को इसी प्रकार कड़ाके की तपिश से धधकाए रखेगा। दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून की रफ्तार में आई अचानक सुस्ती और देश के मैदानी इलाकों में इसके पहुंचने में हो रही अप्रत्याशित देरी के कारण जहाँ एक ओर देश के करोड़ों अन्नदाताओं (किसानों) के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खिंच गई हैं, वहीं दूसरी ओर आम जनमानस भी इस जानलेवा उमस और लू (हीटवेव) के थपेड़ों से पूरी तरह त्रस्त हो चुका है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो के इस अत्यधिक आक्रामक और लंबे दौर के कारण भारत के पारंपरिक मानसून पैटर्न में एक बहुत बड़ा और खतरनाक बदलाव देखा जा रहा है। आईएमडी ने देश के आधा दर्जन से अधिक राज्यों के लिए अत्यधिक संवेदनशील हीटवेव का रेड और ऑरेंज अलर्ट जारी करते हुए नागरिकों से दोपहर के समय बेहद कड़े एहतियात बरतने की अपील की है। आइए आज के इस विस्तृत और विशेष पर्यावरण बुलेटिन के माध्यम से गहराई से समझने का प्रयास करते हैं कि आखिर अल नीनो का यह पूरा विज्ञान क्या है, मॉनसून की इस सुस्ती का देश की कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर क्या व्यापक असर पड़ने जा रहा है और मौसम विभाग ने आने वाले महीनों को लेकर क्या मुख्य भविष्यवाणियां की हैं।
अल नीनो का असली विज्ञान और नवंबर तक गर्मी खिंचने का मुख्य कारण
भौगोलिक और महासागरीय विज्ञान के अनुसार, ‘अल नीनो’ प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की एक बहुत बड़ी वैश्विक घटना है। जब यह महासागरीय पानी गर्म होता है, तो इसके चलते वैश्विक वायुमंडल की हवाओं का रुख पूरी तरह बदल जाता है, जिसका सबसे सीधा और घातक नकारात्मक असर भारतीय मॉनसून को लाने वाली मानसूनी हवाओं पर पड़ता है। ये गर्म हवाएं भारत की तरफ बढ़ने वाले बादलों की नमी को पूरी तरह सोख लेती हैं या उनकी गति को बहुत ज्यादा धीमा कर देती हैं, जिसके चलते देश के भीतर मानसूनी बारिश का ग्राफ रिकॉर्ड स्तर तक नीचे गिर जाता है और मैदानी इलाकों में सूखे जैसी कड़क परिस्थितियां पैदा होने लगती हैं।
आईएमडी के वरिष्ठ मौसम वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण करते हुए बताया कि इस बार अल नीनो इंडेक्स अपने पिछले कई सालों के उच्चतम स्तर पर चल रहा है, जिसके चलते वायुमंडल की ऊपरी परतों में शुष्क और गर्म हवाओं का एक ऐसा अभेद्य चक्रवात (एंटी-साइक्लोन) बन गया है जो मानसून को उत्तर भारत की ओर आगे बढ़ने ही नहीं दे रहा है। मौसम विभाग का यह आकलन है कि इस मौसमी विकृति के कारण देश के मध्य और उत्तर-पश्चिमी राज्यों में मानसून के पूरी तरह सक्रिय होने के बाद भी बारिश के कोटे में भारी कमी दर्ज की जा सकती है, और मॉनसून सीजन बीत जाने के बाद भी यानी सितंबर से नवंबर के महीनों के दौरान भी शरद ऋतु की सामान्य ठंड के बजाय तापमान अपने सामान्य औसत से दो से तीन डिग्री सेल्सियस तक काफी ज्यादा ऊंचा बना रहेगा।
IMD monsoon update: मॉनसून की कछुआ चाल और देश के किसानों पर मंडराता बड़ा संकट
इस साल दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून ने यद्यपि केरल के तट पर अपने निर्धारित समय के आस-पास दस्तक दे दी थी, लेकिन उसके बाद देश के आंतरिक हिस्सों की ओर बढ़ते समय इसकी रफ्तार पूरी तरह से कछुआ चाल में तब्दील हो गई है। देश के सबसे बड़े कृषि बेल्ट यानी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के मैदानी इलाकों में जून का महीना बीतने को है, लेकिन अभी तक केवल छिटपुट बूंदाबांदी और स्थानीय बादलों की गरज-चमक के अलावा कोई भी स्थाई और संतोषजनक मानसूनी बारिश दर्ज नहीं की गई है। इस भारी मानसूनी कमी के कारण देश के कई प्रमुख कृषि प्रधान जिलों में भूमिगत जल स्तर (वॉटर टेबल) बहुत तेजी से नीचे गिर रहा है, जिससे खरीफ की फसलों की बुवाई पूरी तरह से संकट में पड़ गई है।
भारतीय कृषि मुख्य रूप से मानसूनी बारिश के जुए पर ही निर्भर करती है; जून और जुलाई के ये महीने धान (चावल), मक्का, बाजरा, दलहन और कपास जैसी मुख्य फसलों की नर्सरी तैयार करने और उनकी रोपाई के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाते हैं। बारिश न होने और नहरों व नलकूपों में पानी की भारी किल्लत के कारण किसानों की इनपुट लागत (डीजल और सिंचाई का खर्च) कई गुना अधिक बढ़ गई है, जिससे फसलों के उत्पादन में भारी गिरावट आने की आशंका है। कृषि अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि जुलाई के पहले पखवाड़े के भीतर पूरे देश में अच्छी और व्यापक वर्षा नहीं होती है, तो इसका सीधा और गहरा नकारात्मक असर देश की खाद्य सुरक्षा और आगामी त्योहारों के सीजन में खाद्य वस्तुओं की खुदरा महंगाई दर पर साफ तौर पर देखने को मिलेगा।
हीटवेव का जानलेवा अलर्ट और स्वास्थ्य मंत्रालय की कड़ी चेतावनी
मौसम विभाग द्वारा जारी ताजा बुलेटिन के अनुसार, देश के पश्चिमी और उत्तरी राज्यों जैसे राजस्थान, दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तरी मध्य प्रदेश में अगले एक हफ्ते तक सूरज की तपिश अपने पूरे शबाब पर रहने वाली है। इन राज्यों के कई प्रमुख शहरों जैसे चुरू, बाड़मेर, झांसी, कानपुर और दिल्ली के बाहरी इलाकों में दिन का अधिकतम तापमान 44 डिग्री सेल्सियस से लेकर 45 डिग्री सेल्सियस के बेहद खतरनाक स्तर को छू सकता है। इस भीषण गर्मी के साथ चलने वाली शुष्क पछुआ हवाएं (लू) वातावरण की नमी को पूरी तरह खत्म कर रही हैं, जिससे दोपहर के समय सड़कों और बाजारों में पूरी तरह से सन्नाटा पसरा नजर आ रहा है।
इस जानलेवा हीटवेव को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और डॉक्टरों के राष्ट्रीय संघ ने आम जनता के लिए एक बहुत ही कड़क हेल्थ एडवाइजरी जारी की है। डॉक्टरों के अनुसार, इस अत्यधिक गर्म और उमस भरे मौसम में इंसानी शरीर से पसीने के रूप में बहुत ज्यादा पानी और जरूरी लवण बाहर निकल जाते हैं, जिससे लोग बहुत तेजी से गंभीर डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक (लू लगना), तेज बुखार और अचानक बेहोशी का शिकार हो रहे हैं। अस्पतालों में इस समय मौसमी बीमारियों और पेट के संक्रमण के मरीजों की संख्या में एक बहुत बड़ा उछाल देखा जा रहा है; इसलिए विशेषज्ञों ने आम जनता, विशेषकर बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को दोपहर 11:00 बजे से लेकर शाम 4:00 बजे के बीच सीधे धूप के संपर्क में आने से पूरी तरह बचने, सूती व ढीले कपड़े पहनने और दिनभर में कम से कम 4 से 5 लीटर पानी, ओआरएस (ORS) घोल, नींबू पानी या छाछ का निरंतर सेवन करने की कड़ी सलाह दी है।
निष्कर्ष: सरकारी राहत कार्य और प्रकृति के संरक्षण का अंतिम संदेश
प्रकृति के इस बदले हुए और डरावने रूप (IMD monsoon update) का असर केवल इंसानों और फसलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभ्यारण्यों के भीतर रह रहे मूक वन्यजीवों और पक्षियों पर भी इसका बहुत ही दर्दनाक और गहरा पर्यावरणीय प्रभाव पड़ रहा है; पानी के प्राकृतिक स्रोत सूख जाने के कारण जंगली जानवर पानी की तलाश में ग्रामीण बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस विकट स्थिति से निपटने के लिए केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों के आपदा प्रबंधन विभागों ने युद्धस्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं, जिसके तहत शहरों और ग्रामीण अंचलों में टैंकरों के माध्यम से पीने के पानी की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है और बिजली कटौती को कम करने के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो अल नीनो और ग्लोबल वार्मिंग के ये कड़क थपेड़े पूरी मानव जाति के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी हैं कि यदि हमने अब भी अंधाधुंध शहरीकरण, जंगलों की कटाई और कार्बन उत्सर्जन पर कड़ाई से रोक नहीं लगाई, तो आने वाले सालों में मौसम का यह जानलेवा पैटर्न और ज्यादा भयावह रूप अख्तियार कर लेगा। प्रकृति के इन कड़े नियमों का सम्मान करना, जल संरक्षण (रेन वॉटर हार्वेस्टिंग) को अपनी जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा बनाना और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना ही हमारी इस खूबसूरत धरती को बचाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, हरा-भरा, शीतल और खुशहाल भविष्य हमेशा के लिए सुनिश्चित करने का एकमात्र व सबसे अचूक रास्ता साबित होगा।
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