DUSU Election 2026: आज डूसू चुनाव के लिए वोटिंग, चार पदों पर 20 उम्मीदवार मैदान में; हाई कोर्ट में भी होगी सुनवाई
चार केंद्रीय पदों के लिए मतदान, 19 सितंबर को होगी मतगणना; हाई कोर्ट की सुनवाई पर नजर
DUSU Election 2026: देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में शुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति का महाकुंभ यानी ‘डूसू चुनाव 2026’ (DUSU Election 2026) का निर्णायक दिन आ गया है। शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 को दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चार केंद्रीय पदों—अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव—के लिए मतदान की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। विश्वविद्यालय के नॉर्थ और साउथ कैंपस सहित सभी संबद्ध कॉलेजों में सुबह से ही छात्र मतदाताओं की चहल-पहल देखी जा रही है। इस वर्ष छात्र संघ के इन चार शीर्ष पदों पर अपना परचम लहराने के लिए कुल 20 प्रत्याशी चुनावी रण में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
एक तरफ जहां छात्र अपने मताधिकार का प्रयोग कर नई छात्र सरकार चुनने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनाव प्रचार के दौरान नियमों की कथित धज्जियां उड़ाने, हिंसा और लिंगदोह समिति की सिफारिशों के उल्लंघन के मामलों को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय की नजरें भी इस पूरी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ आज दोपहर 12 बजे इस गंभीर मामले पर फिर से सुनवाई करेगी, जिससे चुनावी नतीजों और मतगणना पर कानूनी निर्णयों का साया मंडरा रहा है।
DUSU Election 2026: चार पदों पर 20 प्रत्याशियों का मुकाबला
इस वर्ष के डूसू चुनाव में विभिन्न सामाजिक और भौगोलिक पृष्ठभूमियों से आने वाले छात्र उम्मीदवारों ने मुकाबले को अत्यधिक रोचक और समावेशी बना दिया है। केंद्रीय पैनल के चार पदों में से सर्वाधिक प्रतिष्ठा वाले अध्यक्ष पद पर सात उम्मीदवार आमने-सामने हैं। उपाध्यक्ष पद के लिए पांच प्रत्याशियों के बीच सीधा संघर्ष है, जबकि सचिव और संयुक्त सचिव के पदों पर चार-चार उम्मीदवार चुनाव मैदान में डटे हुए हैं।
इस चुनावी समर में राष्ट्रीय स्तर के खेल आयोजनों में भाग ले चुके खिलाड़ियों से लेकर शोधार्थियों तक ने अपनी दावेदारी प्रस्तुत की है। छात्र राजनीति के इतिहास में यह पहला अवसर है जब केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख से संबंध रखने वाले एक छात्र ने डूसू के केंद्रीय पैनल में प्रत्याशी के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। इसके अतिरिक्त, समावेशी प्रतिनिधित्व को मजबूती देते हुए एक दृष्टिबाधित छात्र ने भी उम्मीदवारी पेश की है, जिसने विश्वविद्यालय परिसर में दिव्यांग विद्यार्थियों के अधिकारों, सुगम आवागमन और विशेष शिक्षण सुविधाओं के मुद्दों को चुनावी बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।
मतदान केंद्र, पहचान पत्र के नियम और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
विश्वविद्यालय प्रशासन ने मतदान को सुचारू, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने के लिए कॉलेजों में त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा तैयार किया है। नियमों के अनुसार केवल वही छात्र मतदान करने के पात्र हैं जिनका औपचारिक दाखिला 9 सितंबर 2026 तक संपन्न हो चुका था। मतदान केंद्रों के प्रवेश द्वारों पर पहचान पत्रों की सघन जांच की जा रही है। जिन प्रथम वर्ष के नवप्रवेशित छात्रों को अभी तक स्थायी डिजिटल पहचान पत्र जारी नहीं हो सके हैं, उन्हें कॉलेज द्वारा सत्यापित फीस रसीद और फोटोयुक्त बोनाफाइड प्रमाणपत्र के आधार पर मतदान की अनुमति दी जा रही है।
चुनाव प्रचार के दौरान उभरे तनाव को देखते हुए दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों की व्यापक तैनाती की गई है। विशेष रूप से मिरांडा हाउस, लेडी श्रीराम, दौलत राम और गार्गी जैसे महिला महाविद्यालयों के बाहर और अंदर महिला पुलिसकर्मियों व महिला सुरक्षा गार्डों की विशेष टुकड़ियां तैनात हैं। मतदाताओं की सुविधा के लिए मतदान स्थलों पर धूप से बचाव हेतु शेड, पेयजल व्यवस्था और आकस्मिक चिकित्सा के लिए प्राथमिक उपचार कियोस्क स्थापित किए गए हैं।
प्रचार में हिंसा और शिक्षक से बदसलूकी: कैंपस में सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
इस बार के चुनावी समर में लिंगदोह समिति के दिशानिर्देशों के कथित खुले उल्लंघन ने विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल को काफी अशांत किया। प्रचार अभियान के दौरान भारी-भरकम लग्जरी गाड़ियों के काफिले निकालने, पोस्टर चिपकाकर सार्वजनिक संपत्ति को विरूपित करने और बाहरी असामाजिक तत्वों के कैंपस में प्रवेश करने की व्यापक शिकायतें सामने आईं। माहौल तब और अधिक तनावपूर्ण हो गया जब मोतीलाल नेहरू कॉलेज के ईवनिंग सेक्शन में चुनाव प्रचार से जुड़े कुछ उपद्रवी तत्वों द्वारा एक सम्मानित शिक्षक के साथ कथित रूप से मारपीट और अभद्रता की गई।
इस घटना के विरोध में दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) और विभिन्न संकाय सदस्यों ने तीव्र रोष व्यक्त किया और कुछ शिक्षकों ने तो चुनाव ड्यूटी के बहिष्कार तक की चेतावनी दे डाली। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस के कड़े हस्तक्षेप के बाद शिक्षकों को सुरक्षा का पूर्ण आश्वासन देकर मतदान प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया, किंतु इस घटना ने छात्र संघ चुनाव में बाहुबल और धनबल के बढ़ते प्रभाव पर गंभीर विमर्श छेड़ दिया है।
दिल्ली हाई कोर्ट का कड़ा रुख: आज दोपहर 12 बजे अहम सुनवाई
कैंपस में हुई हिंसक झड़पों और संपत्तियों के नुकसान को लेकर दायर जनहित याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने बेहद सख्त तेवर अपनाए हैं। विगत 17 सितंबर की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय की अगुवाई वाली पीठ ने विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस की ढिलाई पर तीखी नाराजगी जताई थी। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने भी 16 सितंबर की घटनाओं को अक्षम्य बताते हुए उपद्रवियों पर कानूनी कार्रवाई का भरोसा दिलाया था।
अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन और कानून प्रवर्तन एजेंसियां चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन और हिंसा पर संतोषजनक व ठोस कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करती हैं, तो अदालत 19 सितंबर को होने वाली मतगणना को रोकने अथवा परिणाम घोषित करने पर रोक लगाने जैसे कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी। चूंकि अदालत ने मतदान की प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई थी, इसलिए आज वोटिंग जारी है, किंतु दोपहर 12 बजे होने वाली सुनवाई के निष्कर्ष ही यह तय करेंगे कि चुनावी नतीजे अपने निर्धारित समय पर घोषित होंगे या न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेंगे।
हॉस्टल की कमी, सुरक्षा और छात्र कल्याण: चुनाव के प्रमुख जमीनी मुद्दे
दलों और संगठनों की वैचारिक प्रतिस्पर्धा से इतर सामान्य छात्र-छात्राओं के लिए यह चुनाव उनकी दैनिक अकादमिक समस्याओं के समाधान का मंच बना हुआ है। देश के दूर-दराज के राज्यों और ग्रामीण इलाकों से आने वाले हजारों छात्रों के लिए दिल्ली में किफायती और सुरक्षित आवास सबसे बड़ा संकट है। इस बार के चुनाव में नए हॉस्टलों के निर्माण, निजी पीजी के मनमाने किरायों पर नियंत्रण, कॉलेज बसों के फेरे बढ़ाने और मेट्रो रियायती पास की पुरानी मांग को सभी प्रत्याशियों ने अपने घोषणापत्रों में प्रमुखता से उठाया है।
छात्राओं के लिए सुरक्षित कैंपस, पुस्तकालयों को 24 घंटे खुला रखने, प्लेसमेंट सेल को सक्रिय करने और वार्षिक फीस वृद्धि पर रोक लगाने जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर छात्र मतदाताओं का रुझान अधिक देखने को मिल रहा है। छात्र समुदाय इस बात पर गहराई से विचार कर रहा है कि बाहुबल दिखाने वाले संगठनों के बजाय कौन सा प्रत्याशी वास्तव में उनकी बुनियादी समस्याओं को विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद और कार्यकारी परिषद के समक्ष मजबूती से उठा सकता है।
DUSU Election 2026: निष्कर्ष
डूसू चुनाव 2026 लोकतंत्र की उस प्रारंभिक पाठशाला का प्रतीक है जहां देश का युवा नेतृत्व अपने अधिकारों और कर्तव्यों का पहला पाठ सीखता है। चार शीर्ष पदों के लिए 20 उम्मीदवारों के बीच हो रहा यह मुकाबला जितना छात्र आकांक्षाओं से जुड़ा है, उतना ही उच्च न्यायालय के न्यायिक अनुशासन की कसौटी पर भी कसा हुआ है। आज संपन्न होने वाले मतदान के बाद यदि कानूनी अड़चनें आड़े नहीं आईं तो कल यानी 19 सितंबर को मतों की गणना कर विजेताओं के नाम का ऐलान कर दिया जाएगा। अब सबकी निगाहें दोपहर में दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं कि अदालत चुनाव सुधारों और अनुशासन को लेकर क्या अंतिम दिशा-निर्देश जारी करती है।
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