Dronagiri Village: उत्तराखंड के इस गांव में क्यों नहीं होती हनुमान जी की पूजा?

चमोली की नीति घाटी में स्थित द्रोणागिरी गांव की अनोखी लोकमान्यता संजीवनी बूटी और हनुमान जी से जुड़ी रामायण की कथा से संबंधित है। जानें इस परंपरा के पीछे की कहानी।

0

Dronagiri Village: भारत भर में जहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के अनन्य भक्त पवनपुत्र हनुमान की पूजा-अर्चना अत्यंत श्रद्धा और धूमधाम के साथ की जाती है और लगभग हर नगर-ग्राम में उनके विग्रह स्थापित हैं, वहीं देवभूमि उत्तराखंड में एक ऐसा अनूठा गांव भी मौजूद है जहां सदियों से हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती। उत्तराखंड के सीमांत चमोली जिले की नीति घाटी में स्थित ‘द्रोणागिरी’ गांव अपनी इस विशिष्ट और दुर्लभ धार्मिक परंपरा के लिए पूरे देश में कौतूहल और शोध का विषय बना रहता है। इस गांव में न तो हनुमान जी का कोई मंदिर है और न ही लाल ध्वज फहराने की अनुमति है। इसके पीछे रामायण कालीन प्रसंग, संजीवनी बूटी की खोज और स्थानीय लोकमानस की अपने आराध्य पर्वत के प्रति अगाध निष्ठा से जुड़ी एक प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा विद्यमान है।

Dronagiri Village: कहां स्थित है द्रोणागिरी गांव? हिमालय की गोद में बसी रहस्यमयी बस्ती

द्रोणागिरी गांव उत्तराखंड के चमोली जनपद के अंतर्गत भारत-तिब्बत सीमा के समीप नीति घाटी में स्थित एक अति दुर्गम पर्वतीय बस्ती है। समुद्र तल से लगभग 3,658 मीटर (लगभग 12,000 फीट) की अत्यधिक ऊंचाई पर बसा यह गांव नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के संवेदनशील और सुरम्य भू-भाग का हिस्सा है। इस गांव तक पहुंचने के लिए जोशीमठ से नीति सीमा मार्ग पर जुम्मा तक वाहन से यात्रा करने के उपरांत लगभग 8 से 10 किलोमीटर की सीधी और खड़ी पहाड़ी चढ़ाई पैदल पार करनी पड़ती है।

कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां की आबादी केवल ग्रीष्मकाल और शरद ऋतु में ही निवास करती है। सर्दियों में भारी बर्फबारी और अत्यधिक ठंड के चलते ग्रामीण अपने पशुओं और परिवार सहित निचले इलाकों में प्रवास कर जाते हैं। पारंपरिक लकड़ी और पत्थरों से बने घरों, सीढ़ीदार खेतों और विशाल हिमाच्छादित चोटियों से घिरी यह बस्ती प्रकृति प्रेमियों, पर्यावरणविदों और ट्रैकर्स के लिए एक अत्यंत सम्मोहक गंतव्य है।

हनुमान जी की पूजा न करने की लोकमान्यता: संजीवनी बूटी से जुड़ा प्रसंग

द्रोणागिरी गांव में हनुमान जी की पूजा न किए जाने के पीछे की लोकगाथा सीधे तौर पर त्रेतायुग के लंका युद्ध से जुड़ी हुई है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब मेघनाद के शक्ति बाण से लक्ष्मण अचेत और मूर्छित हो गए थे, तब लंका के वैद्य सुषेण ने उनके प्राणों की रक्षा के लिए हिमालय से चार दुर्लभ औषधियां—विशेष रूप से संजीवनी बूटी—लाने का परामर्श दिया था। इस असंभव कार्य को पूरा करने का दायित्व पवनपुत्र हनुमान को सौंपा गया।

स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, जब हनुमान जी उड़ते हुए द्रोणागिरी पर्वत के ऊपर पहुंचे, तो वे चमकती हुई जड़ी-बूटियों के बीच संजीवनी की पहचान नहीं कर सके। समय बीतने के डर से उन्होंने पूरे पर्वत के एक विशाल हिस्से को ही अपनी गदा और भुजाओं के बल से उखाड़ लिया और लंका ले गए। द्रोणागिरी के भोटिया जनजाति और स्थानीय निवासियों का मानना है कि हनुमान जी जिस पर्वत का शिखर खंडित करके ले गए थे, वह उनका पूजनीय पर्वत देव ‘द्रोणागिरी’ ही था।

गांव के लोग द्रोणागिरी पर्वत को एक जीवित देवता और अपनी जीवनधारा के संरक्षक के रूप में पूजते आए थे। स्थानीय विश्वास के अनुसार, पर्वत का अंग-भंग किए जाने से ग्रामीण अत्यंत आहत हुए। लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि गांव की जिस वृद्ध महिला ने हनुमान जी को पर्वत का रास्ता और बूटी वाला हिस्सा दिखाया था, उसे भी समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था। यही कारण है कि स्थानीय निवासी इस घटना को अपने आराध्य देव के अंग-भंग के रूप में देखते हैं और इसी परंपरा के तहत पीढ़ियों से गांव में हनुमान जी की वंदना या आराधना नहीं की जाती।

द्रोणागिरी पर्वत को क्यों मानते हैं जीवित देव? प्रकृति पूजा का अनुपम उदाहरण

भारतीय दर्शन और हिमालयी संस्कृति में प्रकृति के प्रत्येक तत्व को ईश्वरीय सत्ता का रूप माना गया है। द्रोणागिरी के निवासियों के लिए द्रोणागिरी पर्वत केवल चट्टानों और बर्फ का ढेर नहीं, बल्कि संपूर्ण घाटी का अधिष्ठाता देवता है। यहां के लोग मानते हैं कि यह पर्वत ही उन्हें जल, दुर्लभ औषधियां, अनुकूल मौसम और सुरक्षा प्रदान करता है।

गांव में प्रतिवर्ष द्रोणागिरी पर्वत देव की विशेष पूजा और अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इस दौरान ग्रामीण पारंपरिक परिधान पहनकर पर्वत की परिक्रमा करते हैं और अपने कुलदेवता से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। यह परंपरा भारत की उस सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है जहां एक ही महाकाव्य के विभिन्न प्रसंगों को क्षेत्रीय मान्यताओं, पर्यावरण और लोकचेतना के आधार पर अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा और आत्मसात किया जाता है।

संजीवनी बूटी का रहस्य: विज्ञान बनाम पौराणिक विश्वास

द्रोणागिरी और उसके आसपास का उच्च हिमालयी अल्पाइन क्षेत्र दुर्लभ वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों का समृद्ध भंडार माना जाता है। यहां अतीस, कुटकी, सालम पंजा, जटामांसी और कीड़ा जड़ी (यार्सागुम्बा) जैसी बहुमूल्य वनस्पतियां प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं। रामायण काल से चली आ रही संजीवनी बूटी की कथा ने इस संपूर्ण परिक्षेत्र को एक रहस्यमयी पहचान दी है।

वानस्पतिक विज्ञान के दृष्टिकोण से, कई वैज्ञानिक शोधकर्ताओं ने ‘सिलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस’ (Selaginella bryopteris) नामक पौधे को संजीवनी के समतुल्य माना है, जो गंभीर सूखे के समय सूखकर मृतप्राय हो जाता है और जल की कुछ बूंदें मिलते ही पुनः हरा-भरा और जीवित हो उठता है। हालांकि, वैज्ञानिक स्तर पर अब तक ऐसा कोई अकाट्य प्रमाण नहीं है जो किसी एक पौधे को पौराणिक संजीवनी के रूप में पूरी तरह सिद्ध कर सके। इसके बावजूद, स्थानीय वैद्यों और चरवाहों के पास हिमालयी जड़ी-बूटियों का जो पारंपरिक ज्ञान है, वह सदियों से चिकित्सा में अत्यंत प्रभावी सिद्ध होता रहा है।

Dronagiri Village: सांस्कृतिक धरोहर और लोकविश्वास का सम्मान

द्रोणागिरी गांव की यह अनोखी प्रथा किसी द्वेष या विरोध का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हिमालयी समाज के अपनी मिट्टी, पर्यावरण और स्थानीय देव परंपराओं के प्रति अनन्य समर्पण का जीवंत प्रमाण है। देश के अन्य भागों में जहां हनुमान जी द्वारा पर्वत उठाना उनकी अपार शक्ति, निष्ठा और भगवान राम के प्रति सेवा भाव का सर्वोच्च शिखर माना जाता है, वहीं द्रोणागिरी की लोकगाथा में यह अपने कुलदेवता के संरक्षण की संवेदनशील भावना को प्रकट करता है।

यह परंपरा इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि भारत की सांस्कृतिक संरचना कितनी बहुरंगी और सहिष्णु है, जहां मुख्यधारा के धार्मिक विश्वासों के साथ-साथ सुदूर सीमांत क्षेत्रों की लोकमान्यताओं और प्रकृति-पूजा को भी समान आदर प्राप्त है। आज भी द्रोणागिरी गांव का शांत, निर्मल और आध्यात्मिक वातावरण इस पौराणिक गाथा और प्रकृति प्रेम की सुगंध से सराबोर रहता है।

Read more here

Natural Skin Care Tips: Underarms और Inner Thighs के कालेपन से हैं परेशान? जानें जौ के आटे से बने स्क्रब की सच्चाई और इस्तेमाल का सही तरीका

Workout Accessories for Women: जिम या पार्क में करती हैं एक्सरसाइज? आउटफिट से लेकर जूतों तक, ऐसे करें सही चुनाव

Train Emergency Rules: ट्रेन में इमरजेंसी होने पर चेन खींचने की जरूरत नहीं! जानें रेलवे से तत्काल मदद मांगने के 5 आसान तरीके

पोस्ट ऑफिस की KVP या NSC, कौन-सी स्कीम है बेहतर? ₹50,000 के निवेश पर जानें 5 साल में कितना मिलेगा रिटर्न

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.