दिवाली पर क्यों होती है राजा बलि की पूजा? जानें भगवान विष्णु के वामन अवतार और पाताल लोक की कथा
दिवाली के पांच दिवसीय पर्व में बलि प्रतिपदा का विशेष धार्मिक महत्व है।
Raja Bali Puja: दीपावली का महापर्व आते ही चहुंओर प्रकाश, उल्लास और मां लक्ष्मी व भगवान श्री गणेश की आराधना की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कार्तिक मास की अमावस्या को धन, सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना के साथ दीपों की पंक्तियां सजाई जाती हैं। लेकिन सनातन संस्कृति की विविधता और पौराणिक मान्यताओं में दिवाली का यह पांच दिवसीय उत्सव केवल देवी लक्ष्मी के पूजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इस दौरान असुरों के परम प्रतापी और दानवीर राजा महाबली यानी राजा बलि की पूजा का भी विशेष विधान है।
श्रीमद्भागवत महापुराण और विभिन्न धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, दिवाली से जुड़े बलि प्रतिपदा (गोवर्धन पूजा के दिन) पर राजा बलि के आदर्श शासन और उनकी अद्वितीय दानशीलता को नमन किया जाता है। भगवान श्रीहरि विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि के बीच हुआ संवाद आज भी भक्ति, त्याग और शरणागति की अद्भुत मिसाल माना जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि दिवाली के पावन अवसर पर एक असुर राजा की पूजा क्यों की जाती है और इसके पीछे कौन सी प्रेरक कथा निहित है।
Raja Bali Puja: कौन थे दानवीर राजा महाबली, जिनका दिवाली पर होता है पूजन?
पौराणिक इतिहास के अनुसार, राजा बलि दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पुत्र और परम भगवद्भक्त प्रह्लाद के पौत्र तथा विरोचन के पुत्र थे। यद्यपि वे असुर कुल में जन्मे थे, किंतु अपने पितामह प्रह्लाद के संस्कारों के कारण वे अत्यंत धार्मिक, न्यायप्रिय, प्रजापालक और दानवीर सम्राट बने। उनके राज्यकाल में प्रजा में किसी प्रकार का अभाव, दुख या दरिद्रता नहीं थी।
अपनी असीम तपस्या, भुजबल और नीतिपरायणता के बल पर राजा बलि ने संपूर्ण पृथ्वी सहित तीनों लोकों पर अपना एकछत्र आधिपत्य स्थापित कर लिया था। बलि के बढ़ते पराक्रम और अजेय शक्ति से देवराज इंद्र सहित समस्त देवता भयभीत हो गए, क्योंकि उनका स्वर्गलोक का सिंहासन छिन चुका था। स्वर्ग के उद्धार और ब्रह्मांडीय संतुलन की पुनर्स्थापना के लिए देवमाता अदिति और महर्षि कश्यप ने कठोर तप कर भगवान विष्णु को पुत्र रूप में प्राप्त करने की प्रार्थना की, जिसके फलस्वरूप श्रीहरि ने वामन अवतार धारण किया।
भगवान विष्णु का वामन अवतार और तीन पग भूमि की याचना
भगवान विष्णु ने भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को महर्षि कश्यप और माता अदिति के घर एक बालक ब्राह्मण यानी वामन (बौने) रूप में जन्म लिया। उस समय राजा बलि नर्मदा नदी के तट पर भृगुकच्छ में अपना सौवां अश्वमेध यज्ञ संपन्न कर रहे थे। मान्यता थी कि सौ यज्ञ पूर्ण होते ही बलि को इंद्र पद का स्थायी अधिकार मिल जाता।
यज्ञ के अंत में राजा बलि याचकों को उनकी इच्छानुसार दान दे रहे थे। उसी समय दिव्य तेज से आलोकित वामन देव यज्ञशाला में पधारे। राजा बलि ने इस छोटे ब्राह्मण बालक के अलौकिक तेज को देखकर आदरपूर्वक उनका चरण वंदन किया और उनसे स्वर्ण, भूमि, गाय या मनचाहा धन मांगने का आग्रह किया। किंतु भगवान वामन ने मुस्कुराते हुए राजा बलि से केवल अपने पैरों से नापकर तीन पग (कदम) भूमि दान में मांगी। राजा बलि को यह याचना अत्यंत तुच्छ लगी और उन्होंने तुरंत संकल्प लेने के लिए कमंडल से जल उठाने की चेष्टा की।
गुरु शुक्राचार्य की चेतावनी और वामन देव का त्रिविक्रम रूप
दैत्यों के कुलगुरु महर्षि शुक्राचार्य दिव्य दृष्टि से जान गए कि यह साधारण बटुक ब्राह्मण कोई और नहीं, बल्कि देवताओं की सहायता के लिए स्वयं भगवान विष्णु छल करने आए हैं। शुक्राचार्य ने तुरंत राजा बलि को आगाह किया और दान का संकल्प लेने से मना किया। किंतु धर्मपरायण राजा बलि ने विनम्रतापूर्वक कहा कि उनके द्वार से आज तक कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटा है, और यदि स्वयं भगवान नारायण उनके द्वार पर भिक्षुक बनकर आए हैं, तो अपना सर्वस्व न्योछावर करके भी वे अपने वचन से पीछे नहीं हटेंगे।
जैसे ही राजा बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प पूर्ण किया, भगवान वामन ने अपना स्वरूप विराट कर लिया और वे ‘त्रिविक्रम’ रूप में प्रकट हो गए। भगवान ने अपने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी और पाताल को नाप लिया। दूसरे पग में उन्होंने अंतरिक्ष, समस्त ग्रह-नक्षत्र और स्वर्गलोक को समेट लिया। जब ब्रह्मांड का सारा विस्तार समाप्त हो गया, तब वामन देव ने बलि से पूछा कि वे अपना तीसरा पग कहां रखें। इस पर राजा बलि ने बिना किसी संकोच के हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया और कहा कि प्रभु, संपत्ति से बड़ा संपत्ति का स्वामी होता है, अतः आप अपना तीसरा पग मेरे सिर पर रखें।
पाताल लोक का आधिपत्य और बैकुंठपति का द्वारपाल बनना
राजा बलि की अप्रतिम दानशीलता, शरणागति और वचनबद्धता से भगवान विष्णु अत्यंत द्रवित और प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना तीसरा चरण राजा बलि के मस्तक पर रखकर उन्हें पाताल लोक (सुतल लोक) का अधिपति बना दिया। भगवान ने बलि को आशीर्वाद दिया कि जब तक यह सृष्टि रहेगी, तब तक सुतल लोक में उनकी कीर्ति अक्षुण्ण रहेगी और अगले मन्वंतर (सावर्णि मन्वंतर) में वे स्वर्ग के इंद्र बनेंगे।
भगवान ने बलि से वरदान मांगने को कहा, तो बलि ने केवल यह मांगा कि प्रभु, मैं जब भी अपने महल से बाहर निकलूं या भीतर आऊं, मुझे आपके दर्शन हों। बलि की अनन्य भक्ति के वशीभूत होकर भगवान विष्णु ने स्वयं पाताल लोक में बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार किया। बाद में माता लक्ष्मी ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर भगवान विष्णु को बैकुंठ लौटने का अनुरोध किया, जिसके बदले बलि ने सहर्ष अपने प्रभु को विदा किया।
दिवाली और बलि प्रतिपदा पर राजा बलि की पूजा का रहस्य
राजा बलि को विदा करते समय भगवान विष्णु ने उन्हें यह विशेष वरदान दिया था कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से लेकर शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक का समय पृथ्वी पर उनके नाम से जाना जाएगा। मान्यता है कि इस अवधि में राजा बलि पाताल लोक से अपनी प्रिय प्रजा का हाल-चाल जानने पृथ्वी पर आते हैं।
यही कारण है कि दीपावली के ठीक अगले दिन यानी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को ‘बलि प्रतिपदा’ अथवा ‘बलि पूजा’ के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में इस दिन घरों के आंगन में चावल के आटे या रंगों से राजा बलि और उनकी पत्नी विंध्यावली की सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं और दीप प्रज्वलित कर उनका स्वागत किया जाता है। लोग ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि जिस प्रकार राजा बलि के राज्य में सुख, शांति, समृद्धि और सत्य का वास था, वही खुशहाली उनके घरों में भी सदैव बनी रहे।
Raja Bali Puja: दक्षिण भारत की परंपराएं और त्याग की अमर गाथा
राजा बलि की यह पावन कथा केवल उत्तर और पश्चिम भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत में इसका गहरा सांस्कृतिक प्रभाव है। केरल का सर्वाधिक प्रसिद्ध लोकपर्व ‘ओणम’ भी राजा महाबली के अपनी प्रजा से मिलने आने की पौराणिक स्मृति में ही मनाया जाता है।
दीपावली के उत्सव चक्र में राजा बलि की पूजा यह गहरा आध्यात्मिक संदेश देती है कि ईश्वर की दृष्टि में कुल या जाति का कोई महत्व नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के कर्म, उसकी निष्कपट दानशीलता और ईश्वर के प्रति उसका पूर्ण समर्पण ही उसे अमर बनाता है। शक्ति और वैभव के शिखर पर पहुंचकर भी अहंकार को त्याग देना और सत्य के मार्ग पर अडिग रहना ही राजा बलि के चरित्र की वह महानता है, जिसके कारण दिवाली के पावन दिनों में आज भी उनका स्मरण अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ किया जाता है।
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