Russia Oil Trade: रूस का आश्वासन, लेकिन तेल व्यापार पर सख्त अमेरिकी प्रतिबंध: भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराता खतरा

लावरोव का बयान और PM मोदी की ईंधन बचत अपील के बीच भारत की ऊर्जा रणनीति की चुनौती

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Russia Oil Trade: यूक्रेन युद्ध के बाद से वैश्विक ऊर्जा बाजार में मची उथल-पुथल के बीच भारत और रूस के संबंध एक नई कसौटी पर हैं। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में भारत को आश्वस्त किया है कि उसे तेल आपूर्ति की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, यह आश्वासन जितना कूटनीतिक रूप से सुखद लगता है, उसकी व्यावहारिक राह उतनी ही पथरीली है। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है, और ऐसे में रूस से मिलने वाला रियायती कच्चा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच रहा है। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की सख्ती और वैश्विक भू-राजनीति के बदलते समीकरणों ने इस ‘सस्ते तेल’ के विकल्प पर कई सवालिया निशान लगा दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईंधन बचत की अपील और लावरोव के ताज़ा बयानों के पीछे छिपी सच्चाई को समझना भारत की भविष्य की ऊर्जा नीति के लिए अनिवार्य है।

Russia Oil Trade: लावरोव का आश्वासन और कूटनीतिक संदेश

दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) बैठक की पूर्व संध्या पर सर्गेई लावरोव का बयान रूस की उस छटपटाहट और प्रतिबद्धता दोनों को दर्शाता है, जिसमें वह भारत जैसे अपने सबसे भरोसेमंद साथी को खोना नहीं चाहता। लावरोव ने स्पष्ट किया कि लुकोइल और रोसनेफ्ट जैसी रूसी कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंध गैरकानूनी हैं और भारत को इनसे प्रभावित नहीं होना चाहिए। उनका यह तर्क कूटनीतिक रूप से मजबूत है कि भारत-रूस संबंध किसी तीसरे देश के दबाव में नहीं आने चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब मध्य पूर्व (खाड़ी क्षेत्र) में तनाव के कारण सप्लाई चेन पर खतरा मंडरा रहा है। रूस यहाँ खुद को एक स्थिर और सस्ते विकल्प के रूप में पेश कर रहा है, जो न केवल तेल बेचना चाहता है बल्कि पश्चिम के प्रभुत्व को भी चुनौती देना चाहता है।

रूस-भारत तेल व्यापार: आंकड़ों में आती गिरावट

आंकड़ों पर गौर करें तो रूस और भारत के बीच तेल व्यापार का ग्राफ एक रोलर-कोस्टर की तरह रहा है। 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद रूस भारत का शीर्ष तेल आपूर्तिकर्ता बन गया था और जुलाई 2024 तक भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 44.6 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई थी। इसका सीधा लाभ भारतीय रिफाइनरियों और आम जनता को मिला, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय ब्रेंट क्रूड की तुलना में रूसी तेल 20 से 30 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा था। हालांकि, जनवरी 2026 तक यह हिस्सेदारी घटकर लगभग 20.6 प्रतिशत रह गई है। यह गिरावट स्पष्ट करती है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का डर और भुगतान (Payment) से जुड़ी समस्याएं धरातल पर अपना असर दिखा रही हैं।

Russia Oil Trade: अमेरिकी प्रतिबंध और ‘टैरिफ वॉर’ का दोतरफा दबाव

भारत इस समय अमेरिका और रूस के बीच एक बारीक कूटनीतिक तार पर चल रहा है। अमेरिका ने न केवल रूसी तेल पर प्रतिबंध कड़े किए हैं, बल्कि ट्रंप प्रशासन की ‘टैरिफ’ धमकियों ने भारतीय कंपनियों को फूंक-फूंक कर कदम रखने पर मजबूर कर दिया है। अमेरिका की मंशा केवल रूस के राजस्व को रोकना नहीं है, बल्कि वह भारत को अपने महंगे एलएनजी (LNG) और कच्चे तेल के बाजार के रूप में भी देखता है। भारतीय रिफाइनरी कंपनियां अब रूस से तेल तो खरीद रही हैं, लेकिन इसकी मात्रा काफी कम कर दी गई है और अधिकांश सौदे पर्दे के पीछे या वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों के माध्यम से किए जा रहे हैं। यह ‘धुंधली नीति’ भारत को सुरक्षित तो रखती है, लेकिन रूसी तेल के उस बड़े लाभ को सीमित कर देती है जो पहले मिल रहा था।

Russia Oil Trade: ऊर्जा सुरक्षा और भारत की भविष्य की रणनीति

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, और उसकी बढ़ती ऊर्जा मांग को किसी एक देश के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी की ईंधन बचत की अपील यह संकेत देती है कि सरकार आने वाले समय में ऊर्जा संकट या ऊंची कीमतों के लिए तैयार रह रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिकी दबाव को पूरी तरह नकारने के बजाय अपनी ऊर्जा टोकरी (Energy Basket) को विविध (Diversify) बनाने की जरूरत है। इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे पारंपरिक साझेदारों के साथ-साथ अमेरिका और रूस के बीच संतुलन बनाना ही एकमात्र रास्ता है। साथ ही, घरेलू स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) को मजबूत करना भारत की दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा होना चाहिए।

निष्कर्ष: संतुलन और संप्रभुता की चुनौती

निष्कर्षतः, रूसी तेल अब भी भारत के लिए एक विकल्प है, लेकिन यह अब उतना सहज और सस्ता नहीं रहा जितना दो साल पहले था। लावरोव का आश्वासन दोस्ती की याद दिलाता है, लेकिन बाजार की शक्तियाँ और प्रतिबंधों का जाल इसे जटिल बना रहा है। आगामी ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की भूमिका अहम होगी, जहाँ उसे अपनी ऊर्जा संप्रभुता की रक्षा करते हुए वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन साधना होगा। भारत को न केवल सस्ता तेल चाहिए, बल्कि उसे अपनी वैश्विक साख और आर्थिक स्थिरता को भी बचाना है। भविष्य में भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह रूस की दोस्ती और अमेरिका के बाजार के बीच अपनी ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति को कितनी चतुराई से लागू करता है।

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