Delhi Health Scam: 650 करोड़ का स्वास्थ्य खरीद घोटाला ईडी ने स्वास्थ्य विभाग को चिट्ठी लिख मांगे टेंडर और भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेज

दिल्ली में 650 करोड़ का स्वास्थ्य खरीद घोटाला: ईडी ने स्वास्थ्य विभाग को चिट्ठी लिख मांगे टेंडर और भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेज

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Delhi Health Scam: दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में दवाओं, सर्जिकल सामग्री और जीवन रक्षक चिकित्सा उपकरणों की खरीद में हुए कथित 650 करोड़ रुपये से अधिक के महाघोटाले का मामला अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) के रडार पर आ गया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए ईडी के दिल्ली जोन-द्वितीय कार्यालय ने 23 जून को महानिदेशालय स्वास्थ्य सेवाएं (DGHS) और केंद्रीय प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) को एक आधिकारिक पत्र भेजकर विभिन्न खरीद प्रक्रियाओं से जुड़े सभी प्राथमिक और गोपनीय दस्तावेज तलब किए हैं। जांच एजेंसी यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से कर रही है, जिससे इस मामले में शामिल वरिष्ठ अधिकारियों और सप्लायर्स की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं।

ईडी ने इस पत्र के जरिए टेंडर जारी होने की तारीख से लेकर सप्लायर्स को किए गए अंतिम भुगतान तक की पूरी कड़ियों की गहराई से पड़ताल शुरू कर दी है। केंद्रीय जांच एजेंसी मुख्य रूप से यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या जनता के स्वास्थ्य के लिए आवंटित सरकारी फंड को फर्जी कंपनियों के जरिए डायवर्ट किया गया या उसका अवैध शोधन (वाइटवॉश) कर बेनामी संपत्तियां अर्जित की गईं। दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था में पिछले कुछ समय में सामने आया यह अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय और प्रशासनिक घोटाला माना जा रहा है।

ईडी ने स्वास्थ्य विभाग से कौन-कौन से दस्तावेज मांगे: टेंडर से लेकर ऑडिट तक की फाइलों पर नजर

प्रवर्तन निदेशालय ने अपने पत्र में डीजीएचएस और सीपीए के प्रशासनिक प्रमुखों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे बिना किसी देरी के सभी विवादित खरीद से संबंधित टेंडर फाइलें, तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन रिपोर्ट, अनुबंध आवंटन के दस्तावेज (कॉन्ट्रैक्ट अवार्ड लेटर्स) और सप्लाई ऑर्डर की कॉपियां उपलब्ध कराएं। इसके अलावा, सामानों की डिलीवरी के समय बनाई गई तकनीकी निरीक्षण रिपोर्ट (इन्स्पेक्शन रिपोर्ट) और कोषागार से जारी हुए भुगतान रिकॉर्ड व बैंक स्टेटमेंट्स का पूरा ब्योरा भी मांगा गया है।

जांच एजेंसी की विशेष टीम इन खरीद प्रक्रियाओं में शामिल सभी कंपनियों, निर्माताओं, अधिकृत वितरकों (डिस्ट्रीब्यूटर्स) और सप्लायर्स के मालिकाना हक व उनके वित्तीय लेन-देन के इतिहास को भी खंगाल रही है। ईडी यह देखना चाहती है कि जिन कंपनियों को करोड़ों रुपये के टेंडर दिए गए, उनके बैंक खातों से पैसे का प्रवाह किस दिशा में हुआ और क्या उन कंपनियों का कोई सीधा संबंध स्वास्थ्य विभाग के तत्कालीन नीति-निर्माताओं या उनके परिजनों से तो नहीं है।

घोटाले की पृष्ठभूमि और मुख्य आरोप: खास सप्लायर्स को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों में हेरफेर

दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के अधीन काम करने वाली केंद्रीय प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) पर दिल्ली के तमाम सरकारी अस्पतालों के लिए दवाओं, बिस्तरों और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की थोक खरीद की मुख्य जिम्मेदारी होती है। सतर्कता विभाग की शुरुआती जांच में यह सामने आया है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस पूरी खरीद प्रक्रिया में स्थापित सरकारी नियमों और सीवीसी (CVC) गाइडलाइंस की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं।

मुख्य आरोपों के अनुसार, कुछ चुनिंदा सप्लायर्स और कंपनियों को अवैध रूप से आर्थिक फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर की शर्तों और तकनीकी स्पेसिफिकेशन्स को जान-बूझकर इस तरह से तोड़-मरोड़ कर तैयार किया गया कि बाजार के वास्तविक और ईमानदार प्रतिस्पर्धी टेंडर प्रक्रिया से अपने आप बाहर हो जाएं। इसके अलावा, जिन चिकित्सा उपकरणों और दवाओं की खरीद की गई, उनकी दरें खुले बाजार के वास्तविक मूल्यों से कई गुना अधिक (इन्फ्लेटेड रेट्स) रखी गईं, जिससे सरकारी खजाने को सीधे तौर पर सैकड़ों करोड़ रुपये का चूना लगा।

इन जरूरी चिकित्सा उपकरणों की खरीद पर उठे सवाल: मरीजों की सेहत से खिलवाड़ का मामला

इस कथित घोटाले की गंभीरता इसलिए भी अधिक बढ़ जाती है क्योंकि जिन सामग्रियों की खरीद में हेराफेरी के आरोप लगे हैं, उनका सीधा संबंध सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर और आईसीयू (ICU) में भर्ती गंभीर मरीजों के इलाज से है। जांच के दायरे में आने वाले मुख्य उपकरणों में पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें, सी-आर्म रेडियोलॉजिकल इक्विपमेंट, एनेस्थीसिया वर्कस्टेशन और विभिन्न जीवन रक्षक दवाइयां शामिल हैं।

इसके साथ ही, अस्पतालों में रोजाना इस्तेमाल होने वाले ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS), सर्जिकल कंज्यूमेबल्स (सिरिंज, ग्लव्स, पट्टियां), लिनेन सामग्री, बेडशीट और पिलो कवर्स की खरीद में भी भारी वित्तीय गड़बड़ी और घटिया गुणवत्ता की आपूर्ति के पुख्ता सबूत मिले हैं। डॉक्टरों के एक वर्ग का कहना है कि फुलाए गए दामों पर खरीदे गए कई उपकरण तकनीकी रूप से मानकों पर खरे नहीं उतरे, जिसके कारण अस्पतालों के रेडियोलॉजी और ऑपरेशन थिएटर विभागों को परिचालन में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

एसीबी ने की पहली बड़ी गिरफ्तारी: सीपीए के पूर्व हेड डॉ. विनोद कुमार रंगा सलाखों के पीछे

इस महाघोटाले की आपराधिक जांच में सबसे पहली और बड़ी सफलता भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) को मिली है। एसीबी ने केंद्रीय प्रोक्योरमेंट एजेंसी के पूर्व हेड ऑफ ऑफिस डॉ. विनोद कुमार रंगा को पुख्ता सबूतों के आधार पर गिरफ्तार कर लिया है। एसीबी के संयुक्त आयुक्त विक्रमजीत सिंह के मुताबिक, डॉ. रंगा के कार्यकाल के दौरान ही टेंडर्स में सबसे ज्यादा अनियमितताएं बरती गईं और बाजार से ऊंचे दामों पर सामग्री की खरीद को हरी झंडी दी गई।

डॉ. रंगा पर यह भी गंभीर आरोप है कि जब सतर्कता विभाग ने इस मामले की आंतरिक जांच शुरू की, तो उन्होंने विभाग की कई महत्वपूर्ण मूल फाइलें और टेंडर दस्तावेज अपने व्यक्तिगत कब्जे में रख लिए और जांच टीम को सौंपने से इनकार कर दिया। एसीबी की छापेमारी के दौरान उनके परिसर से कई ऐसी फाइलें बरामद हुई हैं जिन्हें आधिकारिक तौर पर ‘गायब’ या ‘नष्ट’ घोषित कर दिया गया था। अदालत ने डॉ. रंगा को पुलिस कस्टडी में भेजकर पूछताछ की अनुमति दे दी है।

वरिष्ठ अधिकारियों और डॉक्टरों पर गिरी गाज: महानिदेशक सहित कई नामजद

जांच की आंच अब दिल्ली स्वास्थ्य विभाग के सर्वोच्च प्रशासनिक पदों तक पहुंच चुकी है। एसीबी ने इस मामले में पूर्व महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं (DGHS) डॉ. वत्सला अग्रवाल और तत्कालीन उप नियंत्रक (लेखा) नीरज चोपड़ा के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत एफआईआर दर्ज की है। डॉ. वत्सला अग्रवाल को उनके पद से तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।

प्रशासनिक सुधारों के तहत विभाग के कई अन्य वरिष्ठ डॉक्टरों, स्टोर प्रभारियों और लेखा अधिकारियों का भी तबादला गैर-संवेदनशील पदों पर कर दिया गया है ताकि वे अस्पताल के रिकॉर्ड्स और गवाहों को प्रभावित न कर सकें। ईडी अब इन सभी नामजद अधिकारियों की व्यक्तिगत चल-अचल संपत्तियों, बैंक लॉकरों और पिछले तीन वर्षों के आयकर रिटर्न (ITR) के विवरण की जांच करने की तैयारी कर रही है ताकि आय से अधिक संपत्ति के कोण को भी साफ किया जा सके।

निष्कर्ष: स्वास्थ्य व्यवस्था की शुचिता बहाल करने के लिए पारदर्शी और कड़ी कार्रवाई जरूरी

दिल्ली का यह स्वास्थ्य खरीद घोटाला केवल सरकारी धन के गबन का मामला नहीं है, बल्कि यह दिल्ली के उन लाखों गरीब मरीजों के अधिकारों पर डाका डालने जैसा है जो इलाज के लिए पूरी तरह से सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं। जब जीवन रक्षक दवाओं और मशीनों की खरीद में भ्रष्टाचार होता है, तो उसका सीधा खामियाजा किसी मासूम मरीज को अपनी जान गंवाकर भुगतना पड़ता है। इसलिए, प्रवर्तन निदेशालय (ED) और एसीबी की यह समानांतर जांच दिल्ली की चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक अत्यंत अनिवार्य कदम है।

आने वाले दिनों में जैसे ही ईडी को स्वास्थ्य विभाग (Delhi Health Scam) से टेंडर और बैंकिंग लेन-देन के मूल दस्तावेज प्राप्त होंगे, इस मामले में कुछ और बड़े रसूखदार चेहरों की गिरफ्तारियां और कंपनियों की संपत्ति जब्ती (अटैचमेंट) की कार्रवाई देखने को मिल सकती है। दिल्ली सरकार को भी इस घटना से सबक लेते हुए अपनी केंद्रीय खरीद प्रणाली में पूर्ण डिजिटल पारदर्शिता (E-Tendering) और स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था को कड़ाई से लागू करना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी जनता की सेहत के बजट में इस तरह की सेंध लगाने का दुस्साहस न कर सके।

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