दिल्ली प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल

CJP प्रदर्शन के बाद गिरफ्तारियों, इंटरनेट प्रतिबंध और मेट्रो स्टेशनों की बंदी पर सवाल उठे

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Delhi Protest 2026: राजधानी दिल्ली में 10 अक्टूबर को आयोजित CJP प्रदर्शन के उपरांत कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर की गई व्यापक पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की धरपकड़, प्रमुख मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने और चुनिंदा क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाओं पर लगाई गई रोक का मामला अब देश की शीर्ष अदालत की चौखट पर पहुंच चुका है। रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की असाधारण संवेदनशीलता और संवैधानिक प्रश्नों को ध्यान में रखते हुए विशेष सुनवाई आरंभ की। याचिकाकर्ताओं ने प्रशासनिक मशीनरी द्वारा उठाए गए कदमों की वैधता, नागरिकों की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध के मौलिक अधिकारों के हनन का आरोप लगाते हुए कड़ी न्यायिक समीक्षा की मांग की है।

Delhi Protest 2026: संवैधानिक पीठ के समक्ष उठे प्रमुख कानूनी और प्रक्रियात्मक मुद्दे

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ के समक्ष इस मामले से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हुई। अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए सभी पक्षों के वकीलों को अपनी विस्तृत दलीलें प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त अवसर देने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य रूप से यह दलील दी गई कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के नाम पर की गई प्रशासनिक कार्रवाई ने संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों को गंभीर रूप से बाधित किया है। मामले की केंद्रीय धुरी इस बात पर टिकी है कि शांतिपूर्ण सभा और विरोध-प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार तथा सार्वजनिक व्यवस्था कायम रखने के प्रशासनिक विशेषाधिकार के मध्य संतुलन का पैमाना क्या होना चाहिए।

कपिल सिब्बल की तीखी दलीलें: हिरासत की वैधता और इंटरनेट निलंबन पर प्रहार

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने पीठ को अवगत कराया कि शांतिपूर्ण तरीके से राजधानी पहुंच रहे नागरिकों और छात्रों को रेलवे स्टेशनों पर ही ट्रेनों से जबरन उतारकर हिरासत में ले लिया गया, जो कि कानून के शासन का खुला उल्लंघन है।
इसके अलावा सिब्बल ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट सेवाओं को एकतरफा निलंबित किए जाने के प्रशासनिक आदेश को चुनौती देते हुए ऐतिहासिक अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि इंटरनेट पर मनमाना प्रतिबंध आनुपातिकता (Proportionality) के सिद्धांत के विपरीत है और किसी भी स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ऐसा पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं ठहराया जा सकता।

छात्रों के साथ कथित बर्बरता और दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप

अदालत की कार्यवाही के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शदान फरासत ने पुलिसिया कार्रवाई के तौर-तरीकों को बेहद अमानवीय बताते हुए जमीनी हालात का ब्यौरा रखा। उन्होंने पीठ के समक्ष दावा किया कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठा रहे निहत्थे छात्रों, महिलाओं और युवाओं को घसीटकर पुलिस वाहनों में ठूंसा गया तथा कई स्थानों पर बल प्रयोग की सीमाएं लांघी गईं।
वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिशरण ने दिल्ली की सीमाओं पर लगाए गए अवरोधों और शहर के भीतर आवाजाही पर थोपे गए कड़े प्रतिबंधों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अत्यधिक सुरक्षा व्यवस्था के चलते सामान्य दैनिक यात्रियों और शहरवासियों के दैनिक जीवन को पंगु बना दिया गया, जो प्रशासनिक ज्यादती का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

सार्वजनिक परिवहन की बंदी और अदालत की अवमानना का प्रश्न

इस विवाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू दिल्ली मेट्रो के प्रमुख स्टेशनों को सील करना और रेल आवागमन को आंशिक रूप से बाधित करना रहा। याचिकाओं में यह गंभीर आरोप लगाया गया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, जिसमें नागरिकों के आवागमन के सार्वजनिक साधनों को अनावश्यक रूप से ठप न करने की बात कही गई थी, प्रशासन ने मनमाने तरीके से मेट्रो गेट बंद कर दिए।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से इस मामले में संबंधित प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के खिलाफ न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया है। उनका कहना है कि सुरक्षा के नाम पर समूचे शहर की परिवहन व्यवस्था को बंधक नहीं बनाया जा सकता।

Delhi Protest 2026: संवैधानिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच न्यायिक संतुलन की दिशा

सुप्रीम कोर्ट में जारी यह विशेष सुनवाई केवल 10 अक्टूबर की घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए भी लोकतांत्रिक प्रदर्शनों और राज्य की शक्ति के बीच संवैधानिक सीमाओं को पुनर्परिभाषित करने का माध्यम बन सकती है। अदालत के अंतिम निष्कर्ष से यह तय होगा कि क्या प्रशासन द्वारा लगाई गई निषेधाज्ञाएं और हिरासत की प्रक्रियाएं विधिक प्रक्रियाओं के अनुरूप थीं या फिर उन्होंने नागरिक अधिकारों का अतिक्रमण किया। पूरे देश के विधिक और राजनीतिक हलकों की नजरें अब शीर्ष अदालत द्वारा जारी किए जाने वाले अंतरिम आदेशों और दिशा-निर्देशों पर टिकी हुई हैं।

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