Delhi High Court News: सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर सुनवाई नहीं, 21 अक्टूबर पर नजरें
सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर रात में सुनवाई नहीं हुई, अब अगली कोशिश 21 अक्टूबर को।
Delhi High Court News: राष्ट्रीय राजधानी में नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रमुख नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली हाईकोर्ट से मंगलवार रात तत्काल राहत नहीं मिल सकी। मंदिर मार्ग थाने में तैनात विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा दोनों नेताओं की न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ाए जाने के आदेश के खिलाफ दायर आपात याचिका मंगलवार रात सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो पाई। अदालती अवकाश के दौरान तत्काल सुनवाई की मांग खारिज होने के बाद अब याचिकाकर्ताओं की कानूनी टीम बुधवार, 21 अक्टूबर को मामले को तत्काल प्रभाव से खंडपीठ अथवा अवकाशकालीन पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कराने का नया प्रयास करेगी। दोनों नेताओं ने अपनी याचिका में दंडात्मक आदेश की वैधता, प्रक्रियागत खामियों और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन को मुख्य आधार बनाया है।
Delhi High Court News: दिल्ली हाईकोर्ट में रात को क्यों नहीं हो सकी आपात सुनवाई?
सौरव दास और आशुतोष रांका के अधिवक्ताओं ने मंगलवार शाम दिल्ली हाईकोर्ट की रजिस्ट्री से संपर्क साधते हुए मामले की तात्कालिकता का हवाला दिया था। कानूनी टीम का तर्क था कि चूंकि दशहरा अवकाश चल रहा है और न्यायिक हिरासत की अवधि लगातार बढ़ाई जा रही है, इसलिए नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा हेतु देर रात ही आपातकालीन सुनवाई की जानी चाहिए। हालांकि, तकनीकी औपचारिकताएं पूरी न होने और रोस्टर व्यवस्था के चलते यह याचिका मंगलवार रात सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं की जा सकी।
पार्टी की लीगल अफेयर्स हेड रत्ना सिंह ने इस कानूनी गतिरोध पर सार्वजनिक बयान जारी करते हुए कहा कि दोनों युवा नेताओं की निरंतर हिरासत सीधे तौर पर लोकतांत्रिक विरोध की आवाज को दबाने का प्रयास है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति को अपराध की श्रेणी में रखकर किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत आजादी को अनिश्चितकाल के लिए बंधक नहीं बनाया जा सकता। अब सभी की निगाहें बुधवार सुबह हाईकोर्ट की नियमित कार्यप्रणाली पर टिकी हैं, जहां वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा मामले को मेंशन कर तुरंत सुनवाई का अनुरोध किया जाएगा।
दो दिन और बढ़ाई गई थी न्यायिक हिरासत: दंडात्मक आदेश पर विवाद
इस कानूनी विवाद की शुरुआत सोमवार, 19 अक्टूबर को हुई जब मंदिर मार्ग पुलिस थाने में तैनात विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष सौरव दास और आशुतोष रांका को पेश किया गया था। पुलिस ने कानून-व्यवस्था और शांति भंग होने की आशंका जताते हुए हिरासत अवधि बढ़ाने की मांग की, जिसके आधार पर मजिस्ट्रेट ने दोनों को दो दिन की अतिरिक्त न्यायिक हिरासत में भेजने का औपचारिक आदेश पारित कर दिया।
नेताओं की कानूनी टीम ने मजिस्ट्रेट के इस आदेश की वैधानिकता पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। हाईकोर्ट में दायर याचिका में यह दलील दी गई है कि सीआरपीसी और संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा जमानतदारों की पुष्टि के नाम पर न्यायिक हिरासत को बार-बार बढ़ाया जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब आरोपी पहले ही सक्षम जमानतदार प्रस्तुत करने को तैयार थे, तब उन्हें जेल में बनाए रखने का कोई वैध और ठोस आधार मौजूद नहीं था।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और हिरासत का पूरा घटनाक्रम
इस पूरे मामले की जड़ें 13 अक्टूबर को दिल्ली के ऐतिहासिक विरोध स्थल जंतर-मंतर पर हुए घटनाक्रम से जुड़ी हैं। प्राप्त विवरणों के अनुसार, सीजेपी के कुछ कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर पर लगे सुरक्षा बैरिकेड्स को पार करने का प्रयास किया था और वहां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ नारेबाजी की थी। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने हाथ में राष्ट्रीय ध्वज भी ले रखा था।
घटना से ठीक पहले दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए जंतर-मंतर को पूर्व-निर्धारित विरोध प्रदर्शन स्थलों की सूची से अस्थायी रूप से बाहर कर दिया था। पुलिस का आरोप था कि प्रदर्शनकारियों ने निषेधाज्ञा (धारा 144) का उल्लंघन किया और संवेदनशील प्रशासनिक क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था में व्यवधान डाला। इसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों नेताओं को हिरासत में ले लिया था और प्रारंभिक तौर पर उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था, जिसे बाद में दो दिन और बढ़ा दिया गया।
संविधान के अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दुहाई
दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल मुख्य याचिका में भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है, जो प्रत्येक नागरिक को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किए जाने से सुरक्षा प्रदान करता है। याचिका में शीर्ष अदालत के पूर्ववर्ती निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया है कि निवारक निरोध अथवा शांति भंग की आशंका से जुड़े मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को दंडात्मक शक्तियां अनियंत्रित रूप से इस्तेमाल करने की छूट नहीं दी जा सकती।
वहीं दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस और अभियोजन पक्ष का अपना कानूनी तर्क है। पुलिस का कहना है कि राजधानी के अति-संवेदनशील क्षेत्रों में अनधिकृत जमावड़े और वीआईपी सुरक्षा में संभावित सेंध को रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर पर निवारक कदम उठाना वैधानिक रूप से अनिवार्य था। अदालत को अब यह तय करना है कि क्या कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने अपने अधिकारों की सीमा के भीतर कार्य किया या फिर यह नागरिक अधिकारों के अतिक्रमण का मामला है।
Delhi High Court News: अब 21 अक्टूबर को अदालती कार्यवाही पर टिकी नजरें
बुधवार, 21 अक्टूबर का दिन इस पूरे विवाद में निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। यदि दिल्ली हाईकोर्ट याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए स्वीकार कर लेता है, तो दोनों पक्षों के वकीलों के बीच हिरासत की वैधता और जमानत की शर्तों को लेकर तीखी बहस देखने को मिलेगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत कार्यपालक मजिस्ट्रेट की प्रक्रियागत त्रुटियों से संतुष्ट होती है, तो नेताओं को अंतरिम जमानत अथवा निजी मुचलके पर रिहाई की राहत मिल सकती है। इसके विपरीत, यदि अदालत ने हस्तक्षेप करने से इनकार किया, तो नेताओं को निर्धारित प्रक्रिया के तहत नियमित अदालत का रुख करना पड़ेगा।
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