DAC Defence Procurement 2026: ₹1.10 लाख करोड़ के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी, 98% खरीद भारतीय उद्योग से
DAC ने तीनों सेनाओं के लिए ₹1.10 लाख करोड़ के प्रस्ताव मंजूर किए, 98% खरीद घरेलू होगी
DAC Defence Procurement 2026: भारत की सामरिक संप्रभुता, त्रि-सेवा सैन्य तैयारियों और स्वदेशी रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आयोजित रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) की उच्चस्तरीय बैठक में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के आधुनिकीकरण से जुड़े लगभग ₹1.10 लाख करोड़ के पूंजीगत खरीद प्रस्तावों को आवश्यकता की स्वीकृति (Acceptance of Necessity – AoN) प्रदान कर दी गई है।
इस विशाल रक्षा आवंटन की सबसे क्रांतिकारी विशेषता यह है कि स्वीकृत कुल बजट का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा घरेलू भारतीय रक्षा उद्योगों (सार्वजनिक व निजी उपक्रमों) से खरीद के लिए आरक्षित किया गया है। यह निर्णय सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा नीति के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिससे देश विदेशी हथियारों और संवेदनशील रक्षा उपकरणों के आयात की निर्भरता से तेजी से मुक्त हो सकेगा।
DAC Defence Procurement 2026: डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) का ऐतिहासिक फैसला
रक्षा अधिग्रहण परिषद रक्षा मंत्रालय की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई है, जो थलसेना, नौसेना, वायुसेना और भारतीय तटरक्षक बल के लिए आवश्यक सैन्य हार्डवेयर, गोला-बारूद, रडार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के पूंजीगत अधिग्रहण की रूपरेखा तैयार करती है। सोमवार को हुई इस महत्वपूर्ण बैठक में तीनों सेनाओं के प्रमुखों और रक्षा मंत्रालय के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों ने गहन विचार-विमर्श के बाद ₹1.10 लाख करोड़ की परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई।
सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, आधुनिक युद्धकला अब केवल पारंपरिक तोपखानों और टैंकों के बल पर नहीं लड़ी जाती, बल्कि इसका केंद्रबिंदु इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सुरक्षित एन्क्रिप्टेड संचार और दूरगामी समुद्री निगरानी बन चुका है। परिषद द्वारा स्वीकृत किए गए नवीनतम प्रस्तावों में समकालीन सुरक्षा चुनौतियों और भविष्य के बहु-आयामी युद्धक्षेत्र (Multi-Domain Battlefield) की आवश्यकताओं का विशेष ध्यान रखा गया है।
98 प्रतिशत घरेलू खरीद: भारतीय रक्षा उद्योग और MSMEs के लिए स्वर्णिम अवसर
रक्षा प्रस्तावों में 98 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय उद्यमों के लिए निर्धारित किए जाने से देश के औद्योगिक परिदृश्य में व्यापक बदलाव आने की उम्मीद है। अब तक भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में गिना जाता रहा था, किंतु रक्षा खरीद प्रक्रिया (DAP) में किए गए साहसिक नीतिगत सुधारों ने घरेलू उद्योगपतियों, अनुसंधानकर्ताओं और स्टार्टअप्स के लिए दरवाजे खोल दिए हैं।
इस भारी-भरकम पूंजीगत प्रवाह से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), मझगांव डॉक और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड जैसी प्रमुख सार्वजनिक कंपनियों के साथ-साथ टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, एलएंडटी डिफेंस, कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स जैसी निजी रक्षा विनिर्माण कंपनियों को भारी कार्यादेश (Work Orders) मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके अतिरिक्त, टियर-2 और टियर-3 स्तर के हजारों सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को आपूर्ति श्रृंखला में नई हिस्सेदारी मिलेगी, जिससे देश में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में लाखों उच्च-कौशल वाले तकनीकी रोजगार सृजित होंगे।
भारतीय नौसेना की समुद्री मारक क्षमता में इजाफा: रडार और मरीन गैस टर्बाइन
हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन की बढ़ती आक्रामक नौसैनिक गतिविधियों और समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के रणनीतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए भारतीय नौसेना के प्रस्तावों को विशेष प्राथमिकता दी गई है। परिषद ने युद्धपोतों के लिए अत्याधुनिक एयर-सर्विलांस व टारगेट-एक्विजिशन रडार प्रणालियों और मरीन गैस टर्बाइन इंजनों के स्वदेशी उत्पादन व खरीद को औपचारिक स्वीकृति दी है।
ये आधुनिक नौसैनिक रडार गहरे समुद्र में सैकड़ों किलोमीटर दूर से आने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों, समुद्र की सतह से सटकर उड़ने वाली एंटी-शिप मिसाइलों और छोटे मानवरहित ड्रोन को पलक झपकते ही चिन्हित करने में सक्षम हैं। वहीं मरीन गैस टर्बाइन इंजनों का स्वदेशीकरण भारतीय युद्धपोतों की गति, ईंधन दक्षता और लंबी दूरी तक गश्त करने की क्षमता को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करेगा। इससे नीले पानी की नौसेना (Blue Water Navy) के रूप में भारत की वैश्विक स्थिति और अधिक सुदृढ़ होगी।
भारतीय वायुसेना का इलेक्ट्रॉनिक शील्ड: उन्नत जैमर्स और सुरक्षित डेटा कार्ड्स
हवाई युद्धक्षेत्र में दुश्मन के संचार तंत्र को पंगु बनाने और अपने लड़ाकू विमानों के डेटा नेटवर्क को अभेद्य बनाए रखने के उद्देश्य से भारतीय वायुसेना के लिए उन्नत इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर (EW) प्रणालियों को मंजूरी दी गई है। इसके अंतर्गत अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स और सिक्योर एक्सेस क्रेडेंशियल कार्ड सिस्टम की खरीद शामिल है।
ये इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स दुश्मन के रडार सिग्नल्स, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के गाइडेंस सिस्टम और वायरलेस संचार नेटवर्क को जाम करने की मारक क्षमता रखते हैं। वहीं, सुरक्षित डेटा एक्सेस प्रणालियां यह सुनिश्चित करेंगी कि वायुसेना के कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स, ग्राउंड रडार स्टेशंस और हवा में उड़ते सुखोई-30 एमकेआई व राफेल जैसे लड़ाकू विमानों के बीच होने वाला डेटा आदान-प्रदान किसी भी साइबर हमले या विदेशी ईव्सड्रॉपिंग से शत-प्रतिशत सुरक्षित रहे।
समझिए क्या होती है Acceptance of Necessity (AoN) की प्रक्रिया?
रक्षा खरीद के संदर्भ में ‘एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी’ यानी AoN को समझना अत्यंत आवश्यक है। किसी भी रक्षा खरीद प्रक्रिया में AoN पहला और सबसे महत्वपूर्ण औपचारिक प्रशासनिक पड़ाव होता है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि संबंधित हथियार तुरंत खरीद लिए गए हैं या कंपनियों को अंतिम भुगतान कर दिया गया है।
AoN मिलने का अर्थ यह है कि रक्षा मंत्रालय ने औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है कि सशस्त्र बलों को इन प्रणालियों की तात्कालिक आवश्यकता है और इसके लिए बजटीय आवंटन सुरक्षित कर दिया गया है। इसके बाद रक्षा मंत्रालय का खरीद विंग विस्तृत रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) यानी निविदा जारी करता है, जिसके बाद तकनीकी मूल्यांकन, फील्ड ट्रायल्स, वाणिज्यिक बोलियां और मूल्य वार्ता (CNC) के चरण आते हैं। अंत में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की अंतिम स्वीकृति के बाद ही संबंधित विनिर्माता के साथ पक्का अनुबंध हस्ताक्षरित किया जाता है।
DAC Defence Procurement 2026: 2026 में रक्षा खरीद का निरंतर बढ़ता ग्राफ
यह पहली बार नहीं है जब चालू वर्ष 2026 में रक्षा मंत्रालय ने बड़े स्तर पर पूंजीगत व्यय को मंजूरी दी है। इससे पूर्व फरवरी 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने ₹3.60 लाख करोड़ के विशाल प्रस्तावों को AoN दिया था, जबकि जुलाई 2026 में लगभग ₹52,000 करोड़ के अन्य रक्षा प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे।
सितंबर माह में स्वीकृत हुआ ₹1.10 लाख करोड़ का यह ताजा पैकेज इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत अब रक्षा आधुनिकीकरण में किसी भी प्रकार की वित्तीय या नीतिगत सुस्ती बरतने के मूड में नहीं है। थल, जल और नभ की सुरक्षा को एक साथ मजबूत करते हुए भारत अब वैश्विक रक्षा निर्यातक बनने के अपने महत्वाकांक्षी विजन की ओर तेजी से अग्रसर हो रहा है।
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