न्यायपालिका में सुधार की जरूरत, CJI सूर्यकांत बोले- समय पर सुनवाई और हस्तक्षेप से ही मिलेगा असली न्याय
केरल हाई कोर्ट के प्लेटिनम जुबली समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक प्रक्रिया को समयबद्ध, पारदर्शी और प्रभावी बनाने की जरूरत बताई।
CJI Surya Kant: देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को और अधिक प्रभावी, संवेदनशील और समयबद्ध बनाने की पुरजोर वकालत की है। उन्होंने कहा कि न्याय और अन्याय के बीच का फासला कई बार केवल अंतिम फैसले से तय नहीं होता, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि अदालत ने संकट के समय कितनी त्वरित गति से हस्तक्षेप किया। सीजेआई ने विशेष रूप से संवैधानिक अदालतों से गहन आत्ममंथन करने का आह्वान किया ताकि मुकदमों की सुनवाई और केस लिस्टिंग की व्यवस्था को इतना पारदर्शी व सुसंगत बनाया जा सके कि आम नागरिक को वक्त पर राहत मिल सके।
CJI Surya Kant: केरल हाई कोर्ट के प्लेटिनम जुबली समारोह में संवैधानिक ढांचे पर बात
सीजेआई सूर्यकांत ने रविवार को केरल हाई कोर्ट के प्लेटिनम जुबली समारोह को संबोधित करते हुए भारत की न्याय व्यवस्था में उच्च न्यायालयों की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में संवैधानिक न्याय की अवधारणा केवल राजधानी नई दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में स्थापित 25 हाई कोर्ट इस व्यवस्था की सबसे मजबूत रीढ़ हैं।
नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा और विधि का शासन बनाए रखने में हाई कोर्ट्स की भूमिका अपरिहार्य है। सीजेआई के अनुसार, स्थानीय परिस्थितियों, क्षेत्रीय समस्याओं और सामाजिक वास्तविकताओं की सीधी समझ होने के कारण हाई कोर्ट आम जनता की दिक्कतों को सुप्रीम कोर्ट से कहीं अधिक निकटता से महसूस कर सकते हैं।
अनुच्छेद 226: नागरिकों के अधिकारों का व्यापक सुरक्षा कवच
अपने संबोधन में सीजेआई ने संविधान के अनुच्छेद 226 को उच्च न्यायालयों की सबसे प्रभावी संवैधानिक शक्ति करार दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि जहां सुप्रीम कोर्ट का अनुच्छेद 32 केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन तक सीमित है, वहीं अनुच्छेद 226 का दायरा इससे कहीं अधिक विस्तृत है, जिसके तहत प्रशासनिक, वैधानिक, संविदात्मक और विधिक विवादों में भी रिट जारी की जा सकती है।
सीजेआई ने कहा कि अनेक मामलों में अंतिम फैसले से पहले मिलने वाली अंतरिम राहत ही जीवन और आजीविका की रक्षा करती है। यदि किसी पीड़ित व्यक्ति को तत्काल संरक्षण न मिले, तो वर्षों बाद आने वाला अनुकूल फैसला भी उसके किसी काम का नहीं रह जाता। इसलिए संवैधानिक अदालतों की तात्कालिक सक्रियता न्याय की मूल भावना से जुड़ी हुई है।
हाई कोर्ट के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट आने की प्रवृत्ति पर आत्ममंथन
सीजेआई सूर्यकांत ने एक महत्वपूर्ण प्रक्रियागत चिंता की ओर न्यायपालिका का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में ऐसी याचिकाओं में भारी वृद्धि देखी गई है, जहां वादी केवल अपने मुकदमों की जल्द सुनवाई या तत्काल लिस्टिंग का निर्देश पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर रहे हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हमारी वर्तमान व्यवस्था में जरूरी और आपात मामलों की पहचान पहले से बेहतर तरीके से नहीं की जा सकती? क्या रोस्टर और सुनवाई की तारीखों को इतना स्पष्ट नहीं बनाया जाना चाहिए कि किसी को प्रक्रियागत देरी के चलते सीधे शीर्ष अदालत न भागना पड़े? सीजेआई ने दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट सदैव हाई कोर्ट की स्वतंत्रता और उनके प्रशासनिक अधिकारों का आदर करता है, लेकिन इस प्रवृत्ति को प्रणालीगत सुधारों के लिए एक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए।
केस लिस्टिंग में तकनीक का समावेश और सुगम न्याय की परिकल्पना
न्यायिक सुधारों को धरातल पर उतारने के लिए मुख्य न्यायाधीश ने आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर विशेष जोर दिया। उनका मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और एल्गोरिदम-आधारित केस मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से उन मामलों को स्वतः प्राथमिकता दी जा सकती है, जिनमें जरा सी देरी से अपूरणीय क्षति होने की आशंका रहती है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि किसी भी नागरिक को अपने मुकदमे की सुनवाई मात्र के लिए दिल्ली तक की लंबी और महंगी यात्रा करने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। मुकदमों की लिस्टिंग पारदर्शी, निष्पक्ष और पूर्वानुमान योग्य होनी चाहिए, ताकि वादी को अपने मामले की प्रगति की सटीक जानकारी घर बैठे मिल सके।
केरल हाई कोर्ट की गौरवशाली और दूरदर्शी न्यायिक परंपरा
समारोह के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने केरल हाई कोर्ट के ऐतिहासिक योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। वर्ष 1956 में अस्तित्व में आई इस संस्था की जड़ें त्रावणकोर और कोचीन की रियासती अदालतों से जुड़ी रही हैं, जिनकी निष्पक्षता की परंपरा दशकों पुरानी है।
सीजेआई ने विशेष रूप से पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकारों की रक्षा और जनहित से जुड़े ऐतिहासिक फैसलों का स्मरण किया। उन्होंने वर्ष 1999 में केरल हाई कोर्ट द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान पर लगाए गए ऐतिहासिक प्रतिबंध का उल्लेख करते हुए इसे एक अत्यंत दूरदर्शी कदम बताया, जिसने पूरे देश के लिए एक नजीर पेश की थी।
CJI Surya Kant: संस्थागत सहयोग से ही सुदृढ़ होगी न्यायिक व्यवस्था
सीजेआई सूर्यकांत ने यह स्पष्ट किया कि उनके द्वारा उठाए गए सवाल किसी आलोचना का हिस्सा नहीं, बल्कि न्यायपालिका को जनोन्मुखी और भविष्य के लिए तैयार करने की सामूहिक जिम्मेदारी का प्रकटीकरण हैं। जब तक सभी संवैधानिक अदालतें संस्थागत समन्वय, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ कार्य नहीं करेंगी, तब तक आम जनता को अदालती चौखट पर अनावश्यक विलंब से बचाना संभव नहीं होगा। न्यायपालिका का परम दायित्व केवल फैसले सुनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि न्याय सही समय पर और सहजता से प्रत्येक नागरिक तक पहुंचे।
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