Budhwar Puja: बुधवार की पूजा में भगवान गणेश को क्यों प्रिय है दूर्वा? जानें पौराणिक रहस्य, संपूर्ण पूजा विधि, बुध ग्रह की मान्यताएं और शुभ दान

गणेश जी को 21 दूर्वा क्यों चढ़ाते हैं, जानें पूजा विधि, मंत्र और बुध ग्रह के उपाय

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Budhwar Puja: सनातन धर्म परंपरा में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी विशिष्ट देव शक्ति और नवग्रह को समर्पित है। इसी क्रम में बुधवार का दिन प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश और नवग्रह मंडल में बुद्धि व वाणी के कारक बुध देव की आराधना के लिए अत्यंत पावन माना गया है। किसी भी मांगलिक कार्य, अनुष्ठान या नवीन व्यवसाय के शुभारंभ से पूर्व विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा का विधान है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार बुध ग्रह के अधिष्ठाता देवता भी भगवान गणेश ही हैं, जिसके कारण इस दिन की गई पूजा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व दोगुना हो जाता है।

बुधवार के दिन भगवान गणेश को 21 गांठ दूर्वा अर्पित करने, मोदक का भोग लगाने, बुध मंत्रों के जप तथा हरी वस्तुओं के दान का विशेष विधान शास्त्रों में वर्णित है। यह दिन विद्या, बुद्धि, व्यापार और वाणी में निपुणता प्राप्त करने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

Budhwar Puja: गणेश जी को दूर्वा चढ़ाने के पीछे का पौराणिक रहस्य

पौराणिक मान्यताओं और गणेश पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में ‘अनलसुर’ नाम का एक अत्यंत भयंकर और उपद्रवी दैत्य था। वह अपने मुख से भयंकर अग्नि की लपटें निकालता था और ऋषि-मुनियों तथा निर्दोष प्राणियों को जीवित ही निगल जाता था। उसके बढ़ते अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता और ऋषि-मुनि देवराज इंद्र के नेतृत्व में भगवान शिव की शरण में पहुंचे और रक्षा की गुहार लगाई।

भगवान शिव ने देवताओं को बताया कि अनलासुर का संहार केवल विघ्नहर्ता भगवान गणेश ही कर सकते हैं। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान गणेश ने प्रकट होकर अनलासुर से भीषण युद्ध किया और अंततः संसार की रक्षा के लिए उस दैत्य को समूचा निगल लिया। दैत्य को उदरस्थ करते ही भगवान गणेश के पेट में तीव्र अग्नि और असहनीय जलन शुरू हो गई।

समस्त देवताओं द्वारा शीतल जल, चंद्रमा की शीतलता और औषधियां अर्पित करने के बाद भी जब गणेश जी की पेट की जलन शांत नहीं हुई, तब कश्यप ऋषि ने दूर्वा (दूब घास) की 21 गांठें एकत्रित करके भगवान गणेश को खाने के लिए दीं। दूर्वा का सेवन करते ही गणेश जी के उदर की जलन तत्काल शांत हो गई और उन्हें परम शीतलता प्राप्त हुई। तभी से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने वरदान दिया कि जो भी भक्त उन्हें श्रद्धापूर्वक दूर्वा की गांठें अर्पित करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और जीवन के समस्त ताप व विघ्न समाप्त हो जाएंगे।

बुधवार पूजा की तैयारी और प्रामाणिक विधि

बुधवार के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इस दिन हरे अथवा लाल रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। पूजा स्थल की उत्तर या पूर्व दिशा में एक लकड़ी की चौकी स्थापित कर उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

पूजा प्रारंभ करते समय सर्वप्रथम आचमन और पवित्रीकरण करें। इसके बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत अथवा पूजा का संकल्प लें। भगवान गणेश को गंगाजल और पंचामृत से प्रतीकात्मक स्नान कराएं। तत्पश्चात उन्हें रोली, चंदन, अक्षत, सिंदूर और जनेऊ अर्पित करें। लाल पुष्प, गेंदे के फूल और विशेष रूप से दूर्वा के 11 या 21 जोड़े उनके चरणों व मस्तक पर समर्पित करें।

भोग के रूप में भगवान गणेश के प्रिय मोदक, बेसन के लड्डू, ऋतु फल और पान का बीड़ा अर्पित करें। इसके बाद शुद्ध घी का दीपक और धूप प्रज्वलित कर विधिवत आरती करें। पूजा के दौरान मन में किसी भी प्रकार का द्वेष या क्रोध न लाएं और पूर्ण सात्विकता बनाए रखें।

भगवान गणेश और बुध देव के प्रभावशाली मंत्र

पूजा के समय मंत्रों का स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है। भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मूल मंत्र का अपनी श्रद्धा अनुसार 108 बार जप करना चाहिए। इसके साथ ही गणेश गायत्री मंत्र ‘ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्’ और विघ्न निवारण मंत्र ‘वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा’ का पाठ करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से जिनकी कुंडली में बुध ग्रह कमजोर स्थिति में हो या जो व्यापार, शिक्षा और संचार क्षेत्र में सफलता पाना चाहते हैं, वे बुध ग्रह के बीज मंत्र ‘ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः’ अथवा सामान्य मंत्र ‘ॐ बुं बुधाय नमः’ का जप कर सकते हैं। मंत्र जप के उपरांत श्री गणेश अथर्वशीर्ष, संकटनाशन गणेश स्तोत्र या बुधवार व्रत कथा का पाठ व श्रवण करने से पूजा संपूर्ण मानी जाती है।

बुध ग्रह से जुड़ी ज्योतिषीय मान्यताएं और पारंपरिक उपाय

वैदिक ज्योतिष में बुध को ग्रहों का ‘राजकुमार’ माना गया है। बुध ग्रह बुद्धि, तर्क, संचार, वाणी, त्वचा, गणित, वाणिज्य और व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। यदि किसी जातक की जन्मकुंडली में बुध अनुकूल स्थिति में हो, तो व्यक्ति अत्यंत चतुर, कुशल वक्ता और सफल व्यवसायी बनता है। वहीं बुध के कमजोर होने पर वाणी दोष, व्यापार में हानि और निर्णय लेने में कठिनाई जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

बुध ग्रह के शुभ प्रभावों को बढ़ाने के लिए बुधवार के दिन कुछ पारंपरिक और सात्विक उपाय किए जाते हैं। इनमें गौमाता को हरी घास या पालक खिलाना, पक्षियों को भीगी हुई हरी मूंग की दाल डालना और तुलसी के पौधे में नियमित जल अर्पित करना शामिल है। किन्नरों को बुधवार के दिन यथाशक्ति दान देकर उनका आशीर्वाद लेना भी ज्योतिषीय मान्यताओं में बुध शांति का एक प्रमुख उपाय माना जाता है।

बुधवार को किन वस्तुओं का दान करना माना जाता है शुभ?

सनातन परंपरा में दान को आत्मशुद्धि और परोपकार का सर्वोत्तम साधन माना गया है। बुधवार के दिन बुध ग्रह के कारकत्व वाली वस्तुओं का दान करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

इस दिन किसी जरूरतमंद ब्राह्मण, विद्यार्थी या निर्धन व्यक्ति को साबुत हरी मूंग की दाल, हरे रंग के वस्त्र, हरी सब्जियां, कांस्य के बर्तन या हरे फल दान करने का विधान है। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े निर्धन बच्चों को पुस्तकें, कॉपियां, हरे रंग के पेन या अध्ययन सामग्री भेंट करना भी ज्ञान के संवर्धन की दृष्टि से अत्यंत फलदायी माना जाता है। दान सदैव निस्वार्थ भाव और अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही करना चाहिए।

Budhwar Puja: क्या करें और क्या न करें

बुधवार का व्रत रखने वाले जातकों को दिनभर सात्विक नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा का पूरी तरह त्याग करना अनिवार्य है। आहार में नमक का कम से कम उपयोग करें या केवल सेंधा नमक युक्त फलाहार जैसे साबूदाना, कूटू, फल और दूध का सेवन करें।

पूजा और व्रत के दौरान अपनी वाणी पर संयम रखें। किसी के प्रति कटु वचन, अपशब्द, झूठ और छल-कपट से दूर रहें। बुधवार के दिन किसी भी व्यक्ति का अपमान करने या कर्ज के लेन-देन में धोखेबाजी करने से बचना चाहिए। परिवार में शांति और सौहार्द का वातावरण बनाए रखना ही सच्ची देव उपासना का आधार है। शाम के समय भगवान गणेश की आरती और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही सात्विक भोजन के साथ व्रत का पारण करें।

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