भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा: जब गणेश जी की बुद्धि के आगे हार गए कार्तिकेय, इसी दिन मिली विघ्नहर्ता की उपाधि

15 मार्च को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत, गणेश जी को मिली विघ्नहर्ता उपाधि, जानें पूरी कथा और पूजा विधि

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Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की कृपा पाने का सबसे सरल और फलदायी मार्ग माना जाता है। हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को यह व्रत रखा जाता है लेकिन चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का विशेष महत्व है। इसे भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से गणपति की पूजा करने और व्रत कथा सुनने या पढ़ने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है।

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा

पुराणों में वर्णन मिलता है कि एक समय देवता किसी बड़े संकट में फंस गए। परेशान और भयभीत होकर सभी देवता भगवान शिव के पास सहायता के लिए पहुंचे। उस समय कैलाश पर्वत पर भगवान शिव, माता पार्वती और उनके दोनों पुत्र भगवान कार्तिकेय और श्री गणेश एक साथ विराजमान थे। देवताओं ने अपनी पीड़ा और संकट का विस्तार से वर्णन किया और भगवान शिव से मुक्ति की प्रार्थना की। देवताओं की व्यथा सुनकर भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों की ओर देखा और पूछा कि तुम दोनों में से कौन देवताओं की इस परेशानी को दूर करने में सक्षम है।

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: शर्त रखी गई पृथ्वी परिक्रमा की

भगवान शिव का यह प्रश्न सुनते ही दोनों पुत्रों ने एक साथ उत्तर दिया कि वे इस कार्य को करने में पूरी तरह सक्षम हैं। अब शिव जी और माता पार्वती के समक्ष यह प्रश्न खड़ा हो गया कि इस महत्वपूर्ण दायित्व के लिए किसे चुना जाए। थोड़ा विचार करने के बाद भगवान शिव ने एक उपाय सोचा। उन्होंने दोनों पुत्रों से कहा कि तुम दोनों में से जो पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आएगा वही देवताओं की सहायता के लिए जाएगा। यह सुनते ही भगवान कार्तिकेय देरी न करते हुए तुरंत अपने वाहन मोर पर सवार होकर पृथ्वी परिक्रमा के लिए निकल पड़े।

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: गणेश जी ने दिखाई अद्भुत बुद्धिमत्ता

दूसरी ओर गणेश जी के सामने एक बड़ी चुनौती थी। उनका वाहन छोटा सा मूषक है जो पृथ्वी की विशाल परिक्रमा के लिए उचित नहीं लग रहा था। गणेश जी कुछ देर विचारमग्न हो गए। उनकी बुद्धि काम करने लगी और उन्हें एक अद्भुत और सुंदर उपाय सूझा। गणेश जी उठे और उन्होंने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की सात बार विधिपूर्वक परिक्रमा की। परिक्रमा पूरी होने के बाद वे शांत भाव से अपने स्थान पर वापस आकर बैठ गए और भाई कार्तिकेय के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे।

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: माता-पिता ही हैं संपूर्ण जगत

जब कार्तिकेय पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस लौटे तो उन्होंने देखा कि गणेश जी पहले से ही वहां उपस्थित हैं। कार्तिकेय को आश्चर्य हुआ। तब भगवान शिव ने सबको समझाया कि माता और पिता ही संपूर्ण जगत के समान होते हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है कि जो संतान अपने माता-पिता की परिक्रमा करती है उसे पूरी पृथ्वी की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त होता है। इस प्रकार गणेश जी की अद्भुत बुद्धिमत्ता और माता-पिता के प्रति भक्ति भाव देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने गणेश जी को देवताओं के संकट दूर करने का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा।

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: कैसे मिली विघ्नहर्ता की उपाधि?

इसी घटना के बाद से भगवान गणेश को विघ्नहर्ता यानी संकटों और बाधाओं को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजा जाने लगा। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाती है ताकि कार्य में कोई विघ्न न आए। भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी के दिन इस पावन कथा का पाठ करने या सुनने से भक्तों के जीवन के सभी संकट दूर होने और गणपति की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।

Bhalchandra Sankashti Chaturthi Katha: व्रत समापन और पूजन विधि

व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है जब पूजन के साथ-साथ व्रत कथा का भी विधिवत पाठ किया जाए। इस व्रत को करने वाले भक्त दिनभर उपवास रखें, संध्याकाल में चंद्रोदय के समय गणेश जी की पूजा करें, यह कथा सुनें या पढ़ें और चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का समापन करें। भगवान गणेश की कृपा से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

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