होर्मुज स्ट्रेट पर भारत का सख्त संदेश: जयशंकर बोले- समुद्री मार्गों की सुरक्षा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी, BRICS बैठक में दिया कड़ा बयान
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने होर्मुज स्ट्रेट और रेड सी की सुरक्षा पर चिंता जताई, कहा- इन मार्गों का खुला रहना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य
BRICS Meeting: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर मंडराते युद्ध के बादलों के बीच भारत ने एक बार फिर अपनी चिंताओं और कूटनीतिक रुख को वैश्विक मंच पर स्पष्ट कर दिया है। ब्रिक्स (BRICS) देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अत्यंत कड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि होर्मुज स्ट्रेट और रेड सी जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों का सुरक्षित और खुला रहना न केवल क्षेत्रीय स्थिरता, बल्कि संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में एक भारतीय जहाज के होर्मुज क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त होने की खबर ने हड़कंप मचा दिया है। ईरानी विदेश मंत्री की उपस्थिति में दिया गया यह संदेश भारत की उस रणनीतिक जरूरत को दर्शाता है, जो अपने 85 प्रतिशत कच्चे तेल के आयात के लिए इन समुद्री मार्गों पर निर्भर है।
ब्रिक्स बैठक में जयशंकर का प्रहार: कूटनीति और सुरक्षा का संदेश
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की उच्च स्तरीय बैठक में एस. जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा के गिरते स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि इन जलमार्गों पर होने वाली कोई भी रुकावट या हिंसक गतिविधि न केवल वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ देगी, बल्कि दुनिया भर में व्यापार और खाद्य सुरक्षा के लिए भी संकट पैदा करेगी। बैठक में ईरान के विदेश मंत्री अराघची की मौजूदगी ने इस बयान को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। इसे ईरान के लिए एक प्रत्यक्ष कूटनीतिक नसीहत माना जा रहा है कि समुद्री जलमार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना क्षेत्रीय शक्तियों की जिम्मेदारी है। भारत ने पुनः अंतरराष्ट्रीय कानून और नौवहन की स्वतंत्रता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
भारतीय जहाज का डूबना: सुरक्षा चिंताओं में इजाफा
हाल ही में होर्मुज स्ट्रेट के पास एक भारतीय मालवाहक जहाज के दुर्घटनाग्रस्त होकर डूबने की घटना ने भारत की चिंताओं को धरातल पर ला दिया है। यद्यपि आधिकारिक जांच अभी जारी है और दुर्घटना के सटीक कारणों का खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में बढ़ती सैन्य हलचल और अस्थिरता इसके पीछे की मुख्य वजह हो सकती है। भारत सरकार ने इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया है और विदेश मंत्रालय ने चालक दल की सुरक्षा के साथ-साथ इस घटना के पीछे के रणनीतिक पहलुओं की जांच के सख्त निर्देश दिए हैं। इस हादसे ने भारत को यह अहसास करा दिया है कि उसके ऊर्जा सुरक्षा मार्ग कितने अधिक संवेदनशील और जोखिम भरे हो चुके हैं।
होर्मुज स्ट्रेट: वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा
होर्मुज स्ट्रेट की रणनीतिक अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ से प्रतिदिन लगभग 21 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरता है, जो दुनिया के कुल तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत है। भारत के लिए यह मार्ग किसी जीवन रेखा से कम नहीं है क्योंकि सऊदी अरब, इराक, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे प्रमुख ऊर्जा भागीदारों से आने वाला तेल इसी संकरे रास्ते से होकर भारतीय बंदरगाहों तक पहुँचता है। यदि इस मार्ग पर कोई बड़ा तनाव पैदा होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100-120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिसका सीधा असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई दर पर पड़ेगा।
भारत की रणनीति: संतुलन और आत्मनिर्भरता की ओर
विदेश मंत्री जयशंकर का यह बयान भारत की संतुलित और सशक्त विदेश नीति का परिचायक है। भारत एक ओर जहाँ ईरान के साथ चाबहार पोर्ट जैसी परियोजनाओं के माध्यम से रणनीतिक सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर वह समुद्री सुरक्षा के मुद्दे पर किसी भी प्रकार के समझौते के पक्ष में नहीं है। भारत न तो किसी गुटबाजी का समर्थन करता है और न ही तनाव को बढ़ावा देना चाहता है; उसका एकमात्र लक्ष्य शांति और निर्बाध व्यापार सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही, भारत अब अपनी ऊर्जा निर्भरता को कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को मजबूत करने जैसी दूरगामी नीतियों पर तेजी से काम कर रहा है।
निष्कर्ष: वैश्विक शांति और समुद्री सुरक्षा का आह्वान
अंततः, ब्रिक्स मंच से दिया गया यह संदेश यह साबित करता है कि भारत अब केवल एक मूकदर्शक नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली एक जिम्मेदार शक्ति है। होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा केवल भारत की नहीं, बल्कि उन सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है जिनका विकास वैश्विक व्यापार पर टिका है। उम्मीद है कि जयशंकर की इस नसीहत के बाद संबंधित देश संवाद का रास्ता अपनाएंगे और इन संवेदनशील जलमार्गों को युद्ध क्षेत्र बनाने के बजाय शांति और समृद्धि का गलियारा बनाए रखेंगे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह समझना होगा कि समुद्री सुरक्षा में ही वैश्विक अर्थव्यवस्था का भविष्य सुरक्षित है।
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