Assam Government Rule: बिना कानूनी तलाक दूसरी शादी पर सरकारी कर्मचारियों की सैलरी से कटेगा 20%, पहली पत्नी के खाते में जाएगी राशि

CM हिमंता ने कहा, बिना कानूनी तलाक दूसरी शादी पर पहली पत्नी को मिलेगा वेतन का हिस्सा

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Assam Government Rule: असम सरकार ने राज्य के सरकारी कर्मचारियों के लिए पारिवारिक जवाबदेही और महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा एक सख्त प्रशासनिक आदेश लागू करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपनी पहली पत्नी को कानूनी तौर पर तलाक दिए बिना अथवा उसके जीवित रहते हुए दूसरी शादी करता है, तो उसकी मासिक सैलरी से 20 प्रतिशत राशि काटकर सीधे पहली पत्नी के बैंक खाते में जमा करा दी जाएगी। यह कटौती पहली पत्नी द्वारा प्रस्तुत किए गए औपचारिक आवेदन के आधार पर की जाएगी और मामला अदालत में लंबित रहने या अंतिम फैसला आने तक जारी रखी जा सकेगी। इतना ही नहीं, राज्य सरकार निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए भी इस प्रकार के कानूनी प्रावधानों को विस्तारित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है।

Assam Government Rule: असम में बहुविवाह और पारिवारिक जवाबदेही पर पहले भी बने हैं कड़े कानून

असम में बहुविवाह प्रथा को समाप्त करने और विवाह से जुड़े कानूनी नियमों को पारदर्शी बनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों के दौरान नीतिगत और विधायी स्तर पर कई बड़े कदम उठाए गए हैं। इसी कड़ी में नवंबर 2025 में असम विधानसभा द्वारा असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 को सर्वसम्मति से पारित किया गया था। इस कानून के तहत पहली पत्नी या पति के जीवित रहते हुए दूसरी शादी रचाने को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। इसके अतिरिक्त राज्य में लागू किए गए समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) से जुड़े प्रावधानों के माध्यम से एक से अधिक विवाह पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। सरकारी सेवा नियमों में भी बिना पूर्व अनुमति दूसरी शादी करने पर पहले से ही विभागीय प्रतिबंध लागू रहे हैं।
पारिवारिक दायित्वों से भागने वाले कर्मचारियों पर नकेल कसने के लिए असम सरकार पहले भी इसी तरह का सख्त प्रशासनिक मॉडल अपना चुकी है। इससे पूर्व सरकार ने अपने बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षा करने वाले कर्मचारियों के वेतन से 10 से 15 प्रतिशत की कटौती कर सीधे अभिभावकों के खातों में भेजने का नियम लागू किया था। उस नीति का सकारात्मक परिणाम यह निकला कि प्रशासनिक डर और आर्थिक दबाव के कारण कई कर्मचारियों ने अपने माता-पिता की देखभाल करना शुरू कर दिया। यद्यपि राज्य में बहुविवाह के मामलों में लगातार गिरावट आई है, लेकिन दूरदराज के इलाकों, अशिक्षा और सामाजिक जटिलताओं के कारण चोरी-छिपे ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन और अनुकंपा नियुक्ति पर दोनों पत्नियों के दावों को लेकर अक्सर प्रशासनिक और कानूनी उलझनें खड़ी होती रही हैं, जिसे रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है।

सैलरी कटौती की पूरी प्रक्रिया और नए प्रावधान की मुख्य शर्तें

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस और जनसभा के दौरान इस नए नियम का विस्तृत ब्योरा साझा किया। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक समीक्षा में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें सरकारी कर्मचारी कानूनी तलाक की जटिल प्रक्रिया पूरी किए बिना अपनी पहली पत्नी को उसके हाल पर छोड़ देते हैं और किसी अन्य महिला के साथ अनौपचारिक रूप से रहने लगते हैं या दूसरा विवाह कर लेते हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित पहली पत्नी को तुरंत वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए 20 प्रतिशत सैलरी कटौती का फार्मूला तैयार किया गया है। यह प्रक्रिया पीड़ित पत्नी के प्रशासनिक अधिकारियों को दिए जाने वाले आवेदन पत्र और प्राथमिक सत्यापन के बाद तुरंत प्रभाव से शुरू कर दी जाएगी।
सरकार का प्राथमिक उद्देश्य महिलाओं के सम्मानजनक जीवनयापन को सुनिश्चित करना है। मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए अपने भाषण का संदर्भ देते हुए संकेत दिया कि राज्य सरकार निजी क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं की सुरक्षा के लिए भी एक व्यापक मसौदा तैयार कर रही है। निजी क्षेत्र की कंपनियों और संस्थानों के कर्मचारियों पर भी इस नियम को लागू करने के लिए जल्द ही नया विधेयक या अध्यादेश लाया जा सकता है। सरकार द्वारा कटौती की गई 20 फीसदी की राशि सीधे पहली पत्नी के आधार-लिंक्ड बैंक खाते में ट्रांसफर होगी, ताकि उसे किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर न रहना पड़े और वह सम्मान के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सके।

सामाजिक न्याय और अंतरिम राहत के रूप में फैसले का स्वागत

राज्य के प्रशासनिक हलकों और महिला अधिकार संगठनों द्वारा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के इस फैसले को सामाजिक न्याय और महिला सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया एक प्रभावी कदम बताया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने स्वयं इस निर्णय को महिलाओं की गरिमा से जोड़ते हुए कहा कि जब कोई कर्मचारी अपनी पहली पत्नी को आर्थिक सहायता दिए बिना छोड़ देता है, तो वह महिला गंभीर वित्तीय संकट और सामाजिक असुरक्षा से घिर जाती है। सैलरी का पांचवां हिस्सा सीधे खाते में आने से उसे अपनी दैनिक जरूरतों और अदालती खर्चों के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।
कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत में वैवाहिक विवादों और तलाक के मुकदमों के निपटारे में सालों का समय लग जाता है। ऐसे में अदालती प्रक्रिया लंबी खिंचने के दौरान पहली पत्नी को आर्थिक रूप से पंगु होने से बचाने के लिए यह 20 प्रतिशत की कटौती एक मजबूत ‘अल्पकालिक अंतरिम राहत’ का काम करेगी। यद्यपि कुछ कानूनी जानकारों ने यह भी रेखांकित किया है कि फर्जी शिकायतों और गलत आवेदनों से बचने के लिए सरकार को सत्यापन की प्रक्रिया बेहद चुस्त और पारदर्शी रखनी होगी। प्रशासनिक स्तर पर सरकार ने भरोसा दिलाया है कि यह कदम मौजूदा सेवा नियमों और राज्य के कानूनों के पूरी तरह अनुकूल है।

आर्थिक दबाव से बदलेगा कर्मचारियों का रवैया, घटेगी प्रशासनिक उलझन

असम सरकार का यह निर्णय केवल एक वित्तीय दंड नहीं है, बल्कि यह कर्मचारियों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने का एक सामाजिक प्रयोग है। जब किसी कर्मचारी को यह स्पष्ट दिखेगा कि कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने पर उसकी महीने की कुल कमाई का 20 प्रतिशत हिस्सा सीधे कटेगा, तो वह अनौपचारिक विवाह करने से पहले कई बार सोचेगा। यह व्यवस्था कर्मचारी को या तो पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने या फिर नियमानुसार कानूनी तलाक की प्रक्रिया पूरी करने के लिए मजबूर करेगी। माता-पिता के भरण-पोषण वाले नियम की सफलता ने यह साबित किया है कि आर्थिक दबाव ऐसे मामलों में तुरंत असर दिखाता है।
इसके अलावा, यह निर्णय राज्य के वित्त और सामान्य प्रशासन विभाग के लिए भी दीर्घकालिक राहत लेकर आएगा। पूर्व में किसी कर्मचारी की मृत्यु के बाद पहली और दूसरी पत्नी के बीच पेंशन, ग्रेच्युटी और अनुकंपा के आधार पर मिलने वाली सरकारी नौकरी को लेकर वर्षों तक अदालती मुकदमेबाजी चलती थी। जब सरकार सेवाकाल के दौरान ही पहली पत्नी के कानूनी अधिकारों को मान्यता देकर आर्थिक हिस्सा तय कर देगी, तो भविष्य में होने वाले पेंशन संबंधी विवादों में अपने आप कमी आएगी। निजी क्षेत्र में इसे विस्तारित करने का निर्णय दर्शाता है कि सरकार इस व्यवस्था को केवल अपने कर्मचारियों तक सीमित न रखकर पूरे राज्य का सामाजिक ढांचा सुधारना चाहती है।

Assam Government Rule: दिशानिर्देशों का प्रकाशन और क्रियान्वयन तंत्र की स्थापना

इस ऐतिहासिक निर्णय की घोषणा के बाद अब राज्य के कार्मिक और विधि विभाग द्वारा विस्तृत परिचालन दिशानिर्देश (SOP) जारी किए जाने की उम्मीद है। इन दिशानिर्देशों में आवेदन करने की सटीक प्रक्रिया, जिला स्तर पर सत्यापन अधिकारी की नियुक्ति, कटौती शुरू करने की समयसीमा और कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर देने संबंधी नियम स्पष्ट किए जाएंगे। इसके साथ ही अदालतों में चल रहे वैवाहिक मुकदमों पर भी इस प्रशासनिक आदेश का सीधा प्रभाव देखने को मिलेगा, क्योंकि जब तक अदालत से कोई अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक यह 20 प्रतिशत की कटौती निरंतर जारी रहेगी।
आगामी कुछ महीनों में राज्य सरकार निजी क्षेत्र के लिए बनाए जाने वाले प्रस्तावित विधेयक का ड्राफ्ट तैयार कर विधानसभा में पेश कर सकती है। कर्मचारियों को कानूनी तलाक की पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने और बहुविवाह से बचने के लिए प्रशासनिक स्तर पर जागरूक भी किया जाएगा। राज्य भर में महिला कल्याण समितियों और नागरिक निकायों के माध्यम से इस नियम का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा ताकि पीड़ित महिलाओं को अपने अधिकारों की सही जानकारी मिल सके। असम में बहुविवाह निषेध कानून और इस नए वेतन कटौती प्रावधान का संयुक्त प्रभाव राज्य में पारिवारिक स्थिरता और महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ बनाएगा।

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