Anupama Singh: अनुपमा सिंह कौन हैं, जिन्होंने यूएन मानवाधिकार परिषद में पाकिस्तान को फ्रेंकस्टीन स्टेट करार दिया, जानें पूरा बयान
Anupama Singh: कौन हैं अनुपमा सिंह, जिन्होंने UN में पाकिस्तान को घेरा?
Anupama Singh: जिनेवा से आई एक खबर ने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। भारत की एक युवा राजनयिक ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से पाकिस्तान पर ऐसा तीखा हमला बोला कि उनका नाम अचानक चर्चा का विषय बन गया। नाम है अनुपमा सिंह, जो भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी हैं और इस वक्त जिनेवा में भारत के स्थायी मिशन में अहम जिम्मेदारी संभाल रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 62वें सत्र के दौरान शुक्रवार को अनुपमा सिंह ने भारत के राइट ऑफ रिप्लाई का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान और इस्लामिक सहयोग संगठन की ओर से जम्मू कश्मीर को लेकर लगाए गए आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने पाकिस्तान को एक चरमराता हुआ फ्रेंकस्टीन स्टेट बताया, यानी ऐसा देश जो अपने ही बनाए ढांचे का शिकार हो गया है। उनका यह बयान मानवाधिकार उच्चायुक्त की वार्षिक रिपोर्ट पर हो रहे एक इंटरएक्टिव संवाद के दौरान आया।
Anupama Singh: कौन हैं अनुपमा सिंह
अनुपमा सिंह भारतीय विदेश सेवा यानी आईएफएस की अनुभवी अधिकारी हैं। वे फिलहाल जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव के पद पर तैनात हैं। उनका मुख्य काम संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखना और देश की विदेश नीति को स्पष्ट करना है। साथ ही वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ चलाए जाने वाले प्रचार का जवाब देने का काम भी संभालती हैं।
राजनयिक हलकों में अनुपमा सिंह को उनकी तार्किक और स्पष्ट बोलने की शैली के लिए जाना जाता है। वे भारतीय राजनयिकों की उस नई पीढ़ी का हिस्सा मानी जाती हैं, जिन्हें वैश्विक मंचों पर भारत विरोधी नैरेटिव का मजबूती से जवाब देने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
फ्रेंकस्टीन स्टेट का क्या मतलब होता है
फ्रेंकस्टीन स्टेट एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल उन देशों के लिए किया जाता है, जिन्होंने किसी आतंकवादी संगठन या चरमपंथी सोच को खुद पाला और मजबूत किया, लेकिन बाद में वही ताकत उनके नियंत्रण से बाहर होकर खुद उनके लिए खतरा बन गई। हिंदी में इसे भस्मासुर की कहानी से जोड़कर समझाया जा सकता है, जहां खुद दिया गया वरदान ही विनाश का कारण बन जाता है।
अपने भाषण में सिंह ने कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से छद्म आतंकवादी समूहों के सहारे अपनी रणनीति चलाता रहा है, और अब वही समूह उसके लिए मुसीबत बन गए हैं। उन्होंने इसे एक ऐसा विरोधाभास बताया जिसे शायद ही कोई और देश इस तरह बरकरार रख सकता है।
पाकिस्तान पर पाखंड का आरोप
सिंह के भाषण का सबसे चर्चित हिस्सा वह रहा, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान पर दुनिया की सहानुभूति बटोरने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जिस देश के मौजूदा रक्षा मंत्री खुद यह स्वीकार कर चुके हैं कि आतंकवादियों को पनाह देना और ट्रेनिंग देना उनकी नीति का हिस्सा रहा है, वही देश खुद को आतंकवाद का शिकार बताने की कोशिश करता है। उन्होंने इसे एक ऐसी स्थिति बताया जहां अपना ही पाला हुआ खतरा अब काटने को दौड़ता है।
पीओजेके में मानवाधिकार हनन का मुद्दा भी उठाया
अपने बयान में सिंह ने सिर्फ आतंकवाद ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर यानी पीओजेके में चल रही नागरिक अशांति का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने रावलकोट में हाल ही में हुई कार्रवाई का खास तौर पर जिक्र करते हुए कहा कि वहां सैकड़ों नागरिकों की जान जा चुकी है, और पूरे इलाके में दमनकारी रवैया अपनाया जा रहा है। उनके अनुसार रोटी, बिजली और सम्मान जैसी बुनियादी मांगों का जवाब वहां सख्ती से दिया जा रहा है।
Anupama Singh: सिंधु जल संधि पर भी रखी अपनी बात
सिंह ने अपने संबोधन में सीमा पार आतंकवाद को संसाधनों के बंटवारे से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले जैसी घटनाओं के बाद छह दशक से ज्यादा पुरानी सिंधु जल संधि अब मौजूदा हालात के अनुकूल नहीं रह गई है। उन्होंने यह भी दोहराया कि जम्मू कश्मीर का पूरा क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है और आगे भी रहेगा।
भाषण के अंत में उन्होंने पाकिस्तान के बार बार के हस्तक्षेप को एक तय पैटर्न बताते हुए कहा कि पड़ोसी देश को भारतीय क्षेत्रों पर दावा छोड़कर अपने आंतरिक हालात सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।
Anupama Singh: इस बयान का क्या असर हो सकता है
कूटनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र जैसे बड़े मंच पर इस तरह के सीधे और तीखे बयान कम ही देखने को मिलते हैं। ऐसे बयान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने भारत का रुख स्पष्ट करने में मदद करते हैं, खासकर तब जब कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बार बार आरोप लगाए जाते हैं। हालांकि इस तरह के बयानों का असर लंबे समय तक चलने वाली कूटनीतिक प्रक्रिया पर कितना पड़ता है, यह आने वाले समय में ही साफ हो पाएगा।
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