Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चार मेडिकल कॉलेजों में 91% आरक्षण पर लगाई रोक, सचिव से मांगा जवाब
Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चार मेडिकल कॉलेजों में 91% आरक्षण पर लगाई रोक, सचिव से मांगा जवाब
Allahabad High Court: उत्तर प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस दाखिले को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इन कॉलेजों में 91 प्रतिशत तक आरक्षण दिए जाने पर रोक लगा दी है। हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने बुधवार को राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि वैधानिक आरक्षण सीमा के भीतर रहते हुए ही आंबेडकरनगर, कन्नौज, सहारनपुर और जालौन के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नामांकन प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने की। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता एएन त्रिपाठी ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार ने पिछले साल ही आरक्षण को कानून के अनुसार लागू करने का आश्वासन दिया था, लेकिन इसके बावजूद यूजी-नीट के तहत मौजूदा सत्र में इन कॉलेजों में आरक्षित सीटों की संख्या करीब 91 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
Allahabad High Court: क्या है पूरा मामला
उत्तर प्रदेश के आंबेडकरनगर, कन्नौज, सहारनपुर और जालौन स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस दाखिले के लिए यूजी-नीट के तहत आरक्षण दिया जा रहा था। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इन कॉलेजों में आरक्षण के तहत भरी जाने वाली सीटों की संख्या वैधानिक सीमा से कहीं अधिक यानी करीब 91 प्रतिशत हो गई थी, जो नियमों के खिलाफ था।
वैधानिक आरक्षण सीमा क्या कहती है
मौजूदा नियमों के अनुसार अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी को 27 प्रतिशत, अनुसूचित जाति को 21 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति को 2 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का प्रावधान है। इस हिसाब से कुल आरक्षण की सीमा तय है, लेकिन याचिकाकर्ताओं के मुताबिक चारों मेडिकल कॉलेजों में इस सीमा का उल्लंघन कर आरक्षण दिया जा रहा था।
कोर्ट ने दिया संतुलित आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने याचिकाकर्ताओं की दलील को गंभीरता से लेते हुए 91 प्रतिशत आरक्षण देने पर तो रोक लगा दी, लेकिन साथ ही राज्य सरकार को वैधानिक आरक्षण सीमा के भीतर रहकर नामांकन प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति भी दे दी। इस तरह कोर्ट ने दाखिला प्रक्रिया को पूरी तरह रोकने के बजाय नियमों के दायरे में इसे जारी रखने का रास्ता खोला।
चिकित्सा सचिव से मांगा जवाब
कोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों को स्वीकार करते हुए चिकित्सा विभाग के सचिव को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सचिव से पूछा है कि पिछले साल दिए गए आश्वासन के उल्लंघन के लिए उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। इस नोटिस से राज्य के चिकित्सा विभाग के अधिकारियों में हलचल मच गई है।
Allahabad High Court: याचिकाकर्ताओं का क्या था तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता एएन त्रिपाठी ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि राज्य सरकार ने पिछले वर्ष स्पष्ट आश्वासन दिया था कि आरक्षण कानून के मुताबिक ही लागू किया जाएगा। इसके बावजूद मौजूदा सत्र में चारों मेडिकल कॉलेजों में आरक्षित सीटों की संख्या तय सीमा से काफी अधिक हो गई, जिसके चलते याचिका दाखिल करनी पड़ी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला प्रदेश के मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण नियमों के सही पालन को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोर्ट ने एक तरफ जहां दाखिला प्रक्रिया को बाधित नहीं होने दिया, वहीं दूसरी तरफ वैधानिक सीमा से अधिक आरक्षण देने पर सख्ती भी दिखाई। चिकित्सा विभाग के सचिव को जारी नोटिस से यह भी साफ है कि कोर्ट सरकारी आश्वासनों के पालन को लेकर गंभीर है। आने वाले दिनों में इस मामले की अगली सुनवाई में यह देखना अहम होगा कि सचिव की ओर से क्या जवाब दाखिल किया जाता है और आरक्षण नियमों के पालन को लेकर राज्य सरकार आगे क्या कदम उठाती है।
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