El Niño 2026: अल नीनो का बढ़ता खतरा किसानों के लिए चुनौती, कमजोर मानसून और सूखे की आशंका के बीच वैज्ञानिकों ने दी फसल बचाने की अहम सलाह

कमजोर मानसून और सूखे की आशंका के बीच किसानों को सतर्क रहने की सलाह

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El Niño 2026:  भारत इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है और वैज्ञानिकों का कहना है कि मई-जून के बाद भी मौसम की मार जारी रह सकती है। अमेरिका की NOAA और कोलंबिया विश्वविद्यालय की रिपोर्ट्स के मुताबिक 2026 में अल नीनो बनने की संभावना 82 से 98 प्रतिशत तक है। इससे मानसून कमजोर पड़ सकता है और कई इलाकों में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) भी इस चेतावनी को गंभीरता से ले रहा है। ऐसे में किसानों के लिए चुनौती काफी बढ़ गई है क्योंकि देश की 50 प्रतिशत से ज्यादा कृषि पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि अल नीनो क्या है, इससे क्या खतरे हैं और किसान कैसे खुद को और अपनी फसलों को बचाए रख सकते हैं।

अल नीनो की बढ़ती आशंका और इसका वैश्विक प्रभाव

वैश्विक मौसम विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागर का पानी तेजी से गर्म हो रहा है, जो अल नीनो की दिशा में इशारा कर रहा है। मई से जुलाई के बीच इसकी संभावना काफी मजबूत है और यह दिसंबर 2026 तक कूटनीतिक रूप से प्रभावी रह सकता है। अल नीनो के दौरान भारत में बारिश सामान्य से 10-15 प्रतिशत तक कम हो सकती है। पिछले ऐसे वर्षों में कई राज्यों में फसलें सूख गई थीं और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर अल नीनो मध्यम से मजबूत रहा तो उत्तर भारत, मध्य भारत और कुछ पश्चिमी राज्यों में सूखे की स्थिति बन सकती है। वर्तमान में देश के कई हिस्सों में हीट डोम बना हुआ है, जिसके कारण गर्म हवाएं बाहर नहीं निकल पा रही हैं। विश्व के 100 सबसे गर्म शहरों में 86 भारतीय शहर शामिल हैं और इस भीषण गर्मी का सीधा असर बिजली की बढ़ती खपत पर भी दिख रहा है।

राष्ट्रीय मानसून पर अल नीनो का संभावित असर

IMD के पूर्वानुमान के अनुसार मानसून 26-27 मई के आसपास केरल तट पर पहुंच सकता है, लेकिन उत्तर भारत तक पहुंचने में इसे अभी 4-6 सप्ताह का समय लग सकता है। इस दौरान जून के मध्य तक गर्मी का प्रचंड प्रकोप जारी रहेगा। अल नीनो की स्थिति में मानसून की आगे बढ़ने की प्रगति काफी धीमी पड़ सकती है, जिससे कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश तो कुछ में बेहद कम बारिश होने की आशंका बनी हुई है।

इससे देश के कुल कृषि उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा। गेहूं, धान, गन्ना और दलहन जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार कूटनीतिक रूप से प्रभावित हो सकती है। पिछले अल नीनो वर्ष 2016 में देश में 14 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई थी, और इस बार स्थिति और गंभीर हो सकती है क्योंकि जलवायु परिवर्तन पहले से ही मौसम पैटर्न को बिगाड़ रहा है।

भारतीय किसानों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव

भारत में कृषि क्षेत्र अभी भी करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार बना हुआ है। अल नीनो के कारण बारिश कम होने पर सिंचाई पर निर्भरता बहुत ज्यादा बढ़ेगी, जिससे देश का भूजल स्तर और तेजी से गिर सकता है। फसलों में नए रोग लगने की संभावना बढ़ जाएगी क्योंकि नमी की कमी से पौधे कमजोर हो जाते हैं।

इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में दूध उत्पादन पर भी बुरा असर पड़ेगा क्योंकि चारे की भारी कमी हो सकती है। संपूर्ण ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होने से देश की समग्र विकास दर पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की समस्या के बीच कमजोर मानसून खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा कूटनीतिक खतरा बन सकता है Lights।

किसान कैसे तैयार हों और फसलों की सुरक्षा करें

किसानों को अल नीनो की इस बड़ी चुनौती का सामना करने के लिए कई कूटनीतिक रणनीतियां अपनानी होंगी। सबसे पहले फसल चयन पर विशेष ध्यान दें और कम पानी वाली तथा जल्दी पकने वाली किस्मों का चुनाव करें। उदाहरण के लिए, पारंपरिक धान की जगह छोटी अवधि वाली धान की किस्में लगाएं जो 90-110 दिनों में तैयार हो जाती हैं। दलहन और तिलहन फसलों की ओर अधिक रुख करें क्योंकि ये कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं।

मक्का, बाजरा और रागी जैसी फसलें सूखे के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी होती हैं और इन्हें बढ़ावा देने से फसलों का जोखिम कम होगा। इसके अलावा मिट्टी के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए जैविक खेती को बढ़ावा दें। गोबर की खाद, कंपोस्ट और हरी खाद का नियमित उपयोग करें क्योंकि इससे मिट्टी की नमी बनाए रखने की आंतरिक क्षमता बढ़ती है। अंधाधुंध रासायनिक खादों के उपयोग से बचें क्योंकि ये लंबे समय में मिट्टी को बांझ बना सकते हैं।

जल संरक्षण की आधुनिक तकनीकें अपनाएं

सूखे की स्थिति में पानी का सही और कूटनीतिक प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। इसके लिए ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर सिस्टम का अधिक इस्तेमाल करें, जो पारंपरिक सिंचाई के मुकाबले 40-60 प्रतिशत तक पानी बचाते हैं। मल्चिंग तकनीक अपनाएं जिसमें फसल के अवशेषों से मिट्टी को अच्छी तरह ढक दिया जाता है, जिससे इवेपोरेशन कम होता है और भूमि की नमी बरकरार रहती है।

अपने खेतों में वर्षा जल संचयन संरचनाएं जैसे तालाब, चेक डैम और फार्म पॉन्ड बनाएं ताकि सीमित बारिश का पानी भी भविष्य के लिए सुरक्षित रूप से संग्रहित हो सके।

फसल बीमा और सरकारी योजनाओं का लाभ लें

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) का पूरा कूटनीतिक फायदा उठाएं और समय पर अपनी फसलों का पंजीकरण कराएं ताकि किसी भी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में आर्थिक नुकसान की भरपाई हो सके। सरकार द्वारा चलाई जा रही मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, माइक्रो इरिगेशन सब्सिडी और जैविक खेती मिशन का भरपूर उपयोग करें।

अपने स्थानीय क्षेत्रों के कृषि विज्ञान केंद्रों से लगातार संपर्क बनाए रखें और आधिकारिक मौसम पूर्वानुमान नियमित रूप से चेक करते रहें।

लंबी अवधि की रणनीति और विविधीकरण

किसानों को केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय मिश्रित खेती अपनानी चाहिए, जिसमें फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन, मुर्गी पालन या मधुमक्खी पालन को भी शामिल किया जाए। इससे कठिन समय में आय के वैकल्पिक और मजबूत स्रोत बनते हैं।

फलों और सब्जियों की खेती को बढ़ाएं क्योंकि इनमें मौसम के उतार-चढ़ाव का असर खाद्यान्न फसलों की तुलना में अपेक्षाकृत कम होता है। एग्रोफॉरेस्ट्री यानी पेड़ों के साथ खेती को बढ़ावा दें, जो न केवल मिट्टी का कटाव बचाती है बल्कि अतिरिक्त आय भी सुनिश्चित करती है।

El Niño 2026: वैज्ञानिकों की चेतावनी और सकारात्मक कदम

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि अल नीनो हर बार एक जैसा प्रभाव नहीं दिखाता है, लेकिन पूर्व तैयारी से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कई राज्यों में प्रशासन द्वारा पहले से ही सूखा प्रबंधन अभियान कूटनीतिक रूप से चलाए जा रहे हैं।

किसानों को सामुदायिक स्तर पर मिलकर काम करना चाहिए, जिससे पानी साझा करने, उन्नत बीजों के आदान-प्रदान और कृषि ज्ञान को साझा करने से पूरे इलाके की स्थिति बेहतर हो सकती है। युवा किसानों को आधुनिक तकनीक और मोबाइल ऐप्स के जरिए मौसम और बाजार की ताजा जानकारी लगातार दी जा रही है।

निष्कर्ष

2026 में अल नीनो का खतरा पूरी तरह स्पष्ट है, लेकिन सही कूटनीतिक तैयारी से देश के किसान इस चुनौती से पार पा सकते हैं। कम पानी वाली फसलों, बेहतर जल प्रबंधन और जैविक तरीकों को अपनाकर न केवल सूखे का सामना किया जा सकता है बल्कि कृषि को लंबे समय तक टिकाऊ भी बनाया जा सकता है। सरकार, कृषि वैज्ञानिकों और किसानों के सामूहिक प्रयास से इस बड़े संकट को एक अवसर में बदला जा सकता है। सभी किसानों को सलाह दी जाती है कि वे अपने स्थानीय कृषि विभाग से लगातार संपर्क बनाए रखें और नवीनतम नीतिगत अपडेट पर पैनी नजर रखें।

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