Why Sunday is Holiday: 1700 साल पुराने इतिहास से लेकर भारत में 10 जून 1890 तक की दिलचस्प कहानी, नारायण मेघाजी लोखंडे के 7 साल के संघर्ष ने दिलाया था मजदूरों को यह हक

10 जून 1890 की ऐतिहासिक जीत, लोखंडे के 7 साल के संघर्ष से मिला रविवार अवकाश

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Why Sunday is Holiday: हर हफ्ते जब रविवार आता है तो एक अलग ही सुकून का एहसास होता है। न ऑफिस की चिंता, न स्कूल की भागदौड़। बस परिवार के साथ इत्मीनान से समय बिताने का दिन। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रविवार को ही साप्ताहिक छुट्टी क्यों मिलती है? शनिवार या सोमवार को क्यों नहीं? इसके पीछे एक बेहद रोचक और प्रेरणादायक कहानी छिपी है जो मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई, ब्रिटिश शासन और 1700 साल पुराने इतिहास से जुड़ी है। आइए जानते हैं इस दिलचस्प सफर के बारे में।

पहले सातों दिन होता था काम, कोई आराम नहीं

आज हम जिस रविवार की छुट्टी को당연 अधिकार समझते हैं वह हमेशा से ऐसी नहीं थी। ब्रिटिश शासनकाल में भारत में मजदूरों की हालत बेहद दयनीय थी। मुंबई की कपड़ा मिलों में काम करने वाले हजारों मजदूर सप्ताह के सातों दिन बिना किसी छुट्टी के काम करने को मजबूर थे। न रविवार को आराम, न किसी त्योहार पर राहत। लंबे घंटों तक लगातार मिलों में काम करने से उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा था। परिवार के साथ समय बिताना तो जैसे सपना बन गया था।

Why Sunday is Holiday: नारायण मेघाजी लोखंडे – मजदूरों के असली नायक

इन मजदूरों की पीड़ा को देखकर एक व्यक्ति आगे आया जिनका नाम था नारायण मेघाजी लोखंडे। इन्हें भारत में श्रमिक आंदोलन का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने मुंबई की कपड़ा मिलों के मजदूरों को संगठित करना शुरू किया और उनके अधिकारों के लिए ब्रिटिश प्रशासन के खिलाफ आवाज बुलंद की।

साल 1881 से 1884 के बीच लोखंडे ने लगातार विरोध प्रदर्शन आयोजित किए। उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन को कई याचिकाएं और संदेश भेजे। उनकी अपील पर हजारों मजदूर एकजुट होकर सामने आए। लेकिन यह संघर्ष कोई आसान काम नहीं था। अंग्रेजों की सत्ता के सामने आवाज उठाना खतरे से खाली नहीं था।

सात साल का महासंग्राम – और फिर मिली जीत

लोखंडे और मजदूरों का यह आंदोलन पूरे सात साल तक चला। यह महज एक छुट्टी की मांग नहीं थी बल्कि यह इंसान की गरिमा और आराम के अधिकार की लड़ाई थी। मजदूरों की एकजुटता और लोखंडे की अडिग कोशिशों के आगे अंततः ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। 10 जून 1890 को ऐतिहासिक फैसला हुआ और भारत में रविवार को आधिकारिक रूप से साप्ताहिक छुट्टी घोषित कर दिया गया। यह तारीख भारत के श्रमिक इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।

घटनाक्रम वर्ष
लोखंडे का आंदोलन शुरू 1881
ब्रिटिश प्रशासन को याचिकाएं 1881-1884
हजारों मजदूरों का एकजुट होना 1884-1890
भारत में रविवार को आधिकारिक साप्ताहिक छुट्टी 10 जून 1890

Why Sunday is Holiday: रविवार ही क्यों – धार्मिक और व्यावहारिक दोनों कारण

अब सवाल यह उठता है कि छुट्टी के लिए रविवार का ही चुनाव क्यों किया गया? इसके पीछे दो अलग-अलग कारण थे।

पहला कारण था ब्रिटिश शासकों की धार्मिक आस्था। उस समय भारत पर ईसाई धर्म को मानने वाले ब्रिटिश शासन कर रहे थे। ईसाई परंपरा में रविवार का दिन प्रभु यीशु के पुनरुत्थान का दिन माना जाता है और इसी दिन चर्च जाने की परंपरा है। इसलिए अंग्रेजों के लिए रविवार पहले से ही विशेष दिन था।

दूसरा कारण भारतीय संस्कृति और हिंदू परंपरा से जुड़ा था। हिंदू धर्म में रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित है। सूर्य को जीवन का आधार माना जाता है और कई क्षेत्रों में रविवार को भगवान खंडोबा की पूजा का दिन भी माना जाता है। इस तर्क से भारतीय मजदूरों को भी उनकी आस्था और पूजा-पाठ के लिए एक दिन मिलना न्यायसंगत लगा।

1700 साल पुराना इतिहास – रोमन सम्राट से शुरू हुई थी परंपरा

दिलचस्प बात यह है कि रविवार को आराम का दिन बनाने की शुरुआत भारत से नहीं हुई थी। इसका इतिहास करीब 1700 साल पुराना है। सन 321 ईस्वी में रोमन सम्राट कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट ने पूरे रोमन साम्राज्य में रविवार को आराम का दिन घोषित किया था। कॉन्स्टेंटाइन ने ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का आधिकारिक धर्म मानने की दिशा में कदम उठाए थे और उसी के तहत रविवार को खास दर्जा दिया था।

धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे यूरोप में फैल गई और फिर ब्रिटेन की प्रशासनिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन गई। जब ब्रिटिश भारत आए तो वे अपने साथ यह परंपरा भी लेकर आए।

Why Sunday is Holiday: आज की दुनिया में सप्ताहांत

आज दुनिया के अधिकांश देशों में शनिवार और रविवार दोनों दिन साप्ताहिक अवकाश होता है जिसे वीकेंड कहते हैं। भारत में भी सरकारी दफ्तरों में शनिवार को आधे दिन या पूरे दिन की छुट्टी होती है। लेकिन जो रविवार की छुट्टी हम आज निर्विवाद रूप से भोगते हैं उसके पीछे नारायण मेघाजी लोखंडे और उन हजारों अनाम मजदूरों का सात साल का कठिन संघर्ष है जिन्होंने अपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए आराम का हक लड़कर लिया। अगली बार जब रविवार की सुबह आप चैन से उठें तो उन मजदूरों को जरूर याद करें जिनकी वजह से यह सुकून आपको नसीब हुआ है।

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