Meloni Trump NATO: अमेरिका से लड़ रहे ईरान को इटली क्यों दे रहा सफाई? ट्रंप के बाद NATO चीफ पर भड़कीं मेलोनी

ट्रंप और NATO चीफ के बयान पर इटली की PM मेलोनी का पलटवार, ईरान को साफ किया संदेश

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Meloni Trump NATO: अमेरिका और इजराइल के साथ ईरान के हालिया सैन्य संघर्ष के बीच यूरोपीय देश इटली ने वैश्विक मंच पर एक बार फिर अपनी तटस्थता, संप्रभुता और संयम की मजबूत छवि पेश की है। इटली की दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने ईरान को एक बेहद स्पष्ट और सीधा संदेश दिया है कि इटली के हवाई अड्डों या सैन्य ठिकानों का उपयोग अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के खिलाफ चलाए गए किसी भी प्रत्यक्ष युद्ध अभियान में नहीं किया गया है। इस संवेदनशील मामले को तूल पकड़ने से रोकने के लिए इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने खुद आगे बढ़कर ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची से फोन पर लंबी बातचीत की और दोनों देशों के बीच पैदा हो रही किसी भी बड़ी गलतफहमी को तुरंत दूर करने का प्रयास किया। प्रधानमंत्री मेलोनी ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि इटली द्वारा दिए गए इस कूटनीतिक स्पष्टीकरण को ईरानी पक्ष ने बहुत ही सकारात्मक तरीके से समझ लिया है।

यह पूरा अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम नाटो (NATO) के नवनियुक्त महासचिव मार्क रूटे के एक बेहद विवादास्पद और बिना सोचे-समझे दिए गए बयान के बाद सामने आया है, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह अजीबोगरीब दावा कर दिया था कि अमेरिकी युद्धक विमानों ने ईरान पर हमला करने के लिए सीधे इटली के ठिकानों से उड़ान भरी थी। नाटो चीफ के इस दावे के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सोशल मीडिया पर की गई इटली की तीखी आलोचना ने मेलोनी सरकार की नाराजगी को और अधिक बढ़ा दिया। यह पूरा मामला न केवल ट्रांस-अटलांटिक नाटो गठबंधन के भीतर उभरती हुई गंभीर दरारों को दुनिया के सामने उजागर कर रहा है, बल्कि यह संकट के समय यूरोपीय देशों की स्वतंत्र और स्वायत्त विदेश नीति पर भी एक नई वैश्विक बहस छेड़ रहा है।

इटली-ईरान के बीच संपर्क: गलतफहमी दूर करने का प्रयास

इटली की सरकार ने इस नाजुक मोड़ पर बिना कोई समय गंवाए ईरान के साथ सीधे कूटनीतिक संपर्क स्थापित किया ताकि यह पूरी तरह से स्पष्ट किया जा सके कि उसके संप्रभु क्षेत्र का उपयोग अमेरिका और इजराइल के संयुक्त सैन्य अभियान ‘एपिक फ्यूरी’ में किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष युद्धकारी गतिविधि के लिए नहीं हुआ था। विदेश मंत्री ताजानी की अपने ईरानी समकक्ष के साथ हुई उच्च स्तरीय फोन वार्ता के दौरान इटली ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अमेरिकी विमानों को केवल तकनीकी खराबी को सुधारने और लॉजिस्टिकल सपोर्ट जैसी सामान्य गैर-घातक गतिविधियों की ही अनुमति दी गई थी। यह अनुमति भी दोनों देशों के बीच दशकों पहले हुए द्विपक्षीय रक्षा समझौतों के कानूनी प्रावधानों के तहत दी गई थी, जिन्हें अचानक रोकना संभव नहीं था।

प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने फ्रांसो-इटालियन द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के दौरान मीडिया से बात करते हुए कहा कि नाटो प्रमुख मार्क रूटे के गैर-जिम्मेदाराना बयान के कारण दुनिया भर में एक गलत और भ्रामक धारणा बन गई थी। उन्होंने संतोष व्यक्त करते हुए बताया कि जब इटली ने ईरान के सामने वास्तविक तथ्यों को रखा, तो ईरानी शीर्ष अधिकारी इस स्पष्टीकरण से पूरी तरह संतुष्ट दिखे। इटली का यह कदम अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ईरान ने पहले कड़ा रुख अपनाते हुए नाटो के सभी सदस्य देशों को अमेरिकी आक्रामकता में प्रत्यक्ष साझेदार बताकर उनकी गंभीर आलोचना की थी। इटली, जो भूमध्य सागर (मेडिटेरेनीयन सी) के केंद्र में बेहद रणनीतिक रूप से स्थित है, किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहता कि उसके शांत ठिकाने पश्चिम एशिया के इस विनाशकारी युद्ध का नया केंद्र बिंदु बनें।

यह कूटनीतिक सफाई इटली की आंतरिक और घरेलू राजनीति को भी मजबूती से ध्यान में रखकर जारी की गई लगती है। वर्तमान में इटली की आम जनता के बीच ईरान या किसी भी अन्य देश के खिलाफ अमेरिकी युद्ध में शामिल होना बेहद अलोकप्रिय है और वहां के नागरिक अपनी सरकार से अंतरराष्ट्रीय मामलों में पूर्ण तटस्थता बनाए रखने की लगातार पुरजोर मांग कर रहे हैं। मेलोनी सरकार ने इटली के पावन संविधान और संसद द्वारा तय की गई सैन्य मंजूरी की अनिवार्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि देश की संसद की पूर्व अनुमति के बिना सरकार किसी भी नई युद्धकारी या आक्रामक गतिविधि का हिस्सा कानूनी तौर पर नहीं बन सकती है।

नाटो प्रमुख रूटे का बयान और इटली का तीखा विरोध

इस पूरे अंतरराष्ट्रीय विवाद की मुख्य शुरुआत नाटो महासचिव मार्क रूटे के अमेरिकी न्यूज चैनल ‘फॉक्स न्यूज’ को दिए गए एक लाइव इंटरव्यू के बाद हुई थी। रूटे ने इंटरव्यू के दौरान यह बड़ा और विवादित दावा कर दिया था कि इटली में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों से करीब 500 से अधिक अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने सीधे उड़ान भरकर ईरान के खिलाफ चलाए गए हवाई हमलों के अभियान में सक्रिय रूप से भाग लिया था। उन्होंने अपने बयान में पूरे यूरोप महाद्वीप को अमेरिका के लिए एक ‘पावर प्रोजेक्शन प्लेटफॉर्म’ (शक्ति प्रदर्शन का मंच) बताते हुए नाटो की ताकत के रूप में हजारों विमानों की तैनाती का जिक्र किया था।

नाटो चीफ के इस बयान पर इटली की सरकार तुरंत आगबबूला हो गई और इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेट्टो ने इस दावे को ‘पूरी तरह से तथ्यहीन और गुमराह करने वाला’ करार देते हुए इसकी घोर निंदा की। उन्होंने आधिकारिक दस्तावेज पेश करते हुए कहा कि इटली के हवाई क्षेत्र से केवल गैर-घातक (नॉन-काइनेटिक), मानवीय और पूर्व-निर्धारित लॉजिस्टिकल उड़ानों को ही मंजूरी दी गई थी। रक्षा मंत्री ने यह बड़ा खुलासा भी किया कि युद्ध के दौरान जब भी अमेरिकी सेना द्वारा इटली के सिगोनेला या अवियानो एयरबेस से सीधे ईरान पर हमला करने या घातक हथियारों से लैस जेट्स उड़ाने की मांग आई, तो इटली ने अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल करते हुए उस मांग को सिरे से ठुकरा दिया। मेलोनी ने भी रूटे पर कड़ा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने अमेरिका के सामने अपनी और अपने गठबंधन की छवि चमकाने के लिए जमीनी तथ्यों को बुरी तरह मरोड़ा है।

यह पहली बार नहीं है जब नाटो गठबंधन के अंदर आंतरिक स्तर पर इतना गंभीर तनाव और मतभेद खुलकर सामने आया हो। वर्तमान में इटली के पास सिगोनेला नौसेना एयर स्टेशन और अवियानो जैसे प्रमुख अमेरिकी वायु सेना ठिकाने मौजूद हैं, जहां कुल मिलाकर करीब 120 से अधिक अमेरिकी सैन्य सुविधाएं और ठिकाने संचालित होते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद जॉर्जिया मेलोनी की सरकार का रुख पूरी तरह से साफ और अडिग है – इटली पुराने और शांतिपूर्ण रक्षा समझौतों का सम्मान तो जरूर करेगा, लेकिन अपनी धरती का इस्तेमाल किसी भी नए देश पर हमला करने या नई युद्ध गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कभी नहीं होने देगा।

ट्रंप की आलोचना और मेलोनी का पलटवार

इस त्रिकोणीय विवाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हमेशा की तरह बेहद आक्रामक और मुखर रुख भी सबसे महत्वपूर्ण रहा है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक लंबी पोस्ट लिखकर सीधे तौर पर जॉर्जिया मेलोनी पर निशाना साधा और उन पर हमला बोलते हुए कहा कि संकट के समय इटली ने अमेरिकी वायुसेना के विमानों को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण लैंडिंग स्ट्रिप्स का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी, जिसके कारण अमेरिकी सेना को गंभीर लॉजिस्टिकल समस्याओं और देरी का सामना करना पड़ा। ट्रंप ने अपने पुराने अंदाज में नाटो के यूरोपीय सहयोगियों पर एक बार फिर अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसों पर ‘फ्री राइड’ (मुफ्त की सवारी) लेने का बड़ा आरोप लगाया।

ट्रंप और मेलोनी के बीच हाल ही में हुए जी7 (G7) शिखर सम्मेलन के दौरान एक फोटो सेशन को लेकर हुई तीखी बहस भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में खूब चर्चा का विषय बनी रही, जिसे मेलोनी ने बाद में पूरी तरह से खारिज कर दिया था। इटली की प्रधानमंत्री ने ट्रंप को कड़ा जवाब देते हुए जोर देकर कहा कि इटली किसी का गुलाम नहीं बल्कि एक पूर्ण संप्रभु और स्वतंत्र राष्ट्र है, और वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट में केवल और केवल अपने राष्ट्रीय हितों तथा अपनी जनता की सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही फैसले लेगी। ट्रंप की इस अवांछित आलोचना के बाद ही मेलोनी की नाराजगी का गुबार नाटो चीफ मार्क रूटे पर फूटा, जिन्होंने इस आग में घी डालने का काम किया था।

मेलोनी ने वैश्विक मंच पर यह पूरी तरह से साफ कर दिया कि इटली इस युद्ध में किसी भी पक्ष की तरफ से शामिल नहीं है और न ही वह भविष्य में इस विनाशकारी जंग का हिस्सा बनना चाहती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा द्विपक्षीय समझौतों के तकनीकी पहलुओं का सम्मान करना उनकी कूटनीतिक मजबूरी है, लेकिन उससे आगे बढ़कर किसी भी अमेरिकी हमले को सहयोग देने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इटली का यह मजबूत रुख स्पेन और फ्रांस जैसी अन्य प्रमुख यूरोपीय सरकारों से काफी मिलता-जुलता है, जिन्होंने भी इस संकट के दौरान अमेरिकी सेना को अपनी संप्रभु धरती का असीमित उपयोग करने से साफ मना कर दिया था।

अमेरिका-ईरान तनाव की पृष्ठभूमि

हालिया महीनों में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच हुआ यह भीषण सैन्य संघर्ष मुख्य रूप से ईरान के विवादित परमाणु कार्यक्रम और मध्य पूर्व में बढ़ते वर्चस्व को लेकर उपजे भारी तनाव का सीधा नतीजा था। अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के कई रणनीतिक और परमाणु ठिकानों पर विनाशकारी हवाई हमले किए थे, जिसे अमेरिकी पेंटागन ने ‘एपिक फ्यूरी’ (Epic Fury) कोडनेम नाम दिया था। ईरान ने इस हमले को अपनी संप्रभुता पर एक बड़ा और सीधा हमला बताते हुए इसके लिए पूरे नाटो संगठन को जिम्मेदार ठहराया था और जवाबी कार्रवाई की धमकी दी थी। इसी तनाव के बीच यूरोपीय देशों की दोहरी भूमिका पर पूरी दुनिया में बड़े सवाल उठने लगे थे।

इटली, जो ऐतिहासिक और पारंपरिक रूप से हमेशा से ही वाशिंगटन और अमेरिका का एक बेहद वफादार और मजबूत रणनीतिक सहयोगी रहा है, अब इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में दोनों पक्षों के बीच एक बहुत ही बारीक संतुलन बनाने का प्रयास करता हुआ दिख रहा है। मेलोनी की सरकार दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी विचारधारा की होने के बावजूद अपने घरेलू जनमत, नागरिकों की भावनाओं और संवैधानिक बाध्यताओं को सर्वोपरि प्राथमिकता दे रही है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना यूरोप में तेजी से बढ़ रहे ‘सॉवरेनिस्ट’ (संप्रभुतावादी) राजनीतिक रुझान का एक बहुत बड़ा संकेत है, जहां यूरोपीय देश अब अमेरिकी नीतियों का आंख बंद करके अंधानुकरण करने की बजाय अपने स्वतंत्र अस्तित्व और हितों की रक्षा के लिए मुखर हो रहे हैं।

नाटो गठबंधन में उभरती चुनौतियां

मार्क रूटे के इस विवादित और जल्दबाजी में दिए गए बयान से नाटो (North Atlantic Treaty Organization) की आंतरिक एकजुटता और ‘वन फॉर ऑल, ऑल फॉर वन’ की मूल भावना पर बहुत गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। डोनाल्ड ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल से ही लगातार नाटो के सहयोगी देशों से अपने वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम से कम 2% रक्षा खर्च पर बढ़ाने और युद्ध अभियानों में अधिक आर्थिक व सैन्य योगदान देने की जिद पर अड़े रहे हैं। ऐसे में इटली द्वारा अमेरिका की युद्धक मांगों को ठुकराए जाने और ईरान को सफाई दिए जाने का यह नया रुख राष्ट्रपति ट्रंप की निराशा और गुस्से को कई गुना अधिक बढ़ा रहा है, जिससे आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों में खटास आ सकती है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि यदि इटली, फ्रांस और स्पेन जैसे बड़े और शक्तिशाली यूरोपीय देश इस तरह अमेरिकी सेना की गतिविधियों पर अपनी सीमाएं तय करते रहे, तो भविष्य में किसी भी बड़े वैश्विक संकट के समय नाटो की सैन्य प्रभावशीलता और उसकी धाक बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, इटली का अपना यह बेहद मजबूत तर्क है कि वह किसी भी विदेशी दबाव में आकर अपने देश के पवित्र संविधान का उल्लंघन नहीं कर सकती है, जिसमें साफ लिखा है कि बिना संसद की पूर्ण लोकतांत्रिक मंजूरी के देश किसी भी बाहरी युद्धकारी गतिविधि का हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं बन सकता।

आगे क्या? संभावित परिदृश्य

यह पूरा प्रकरण वैश्विक राजनीति के रंगमंच पर एक नई और दूरगामी (Meloni Trump NATO) हलचल पैदा कर रहा है। इटली की यह कूटनीतिक ‘सफाई’ सिर्फ ईरान को शांत करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया के सामने अपनी जनता की आवाज, अपने संप्रभु अस्तित्व और अपने संवैधानिक मूल्यों के प्रति उसकी सर्वोच्च प्रतिबद्धता का एक जीवंत उदाहरण भी है। जैसे-जैसे आने वाले दिनों में यह वैश्विक घटनाक्रम आगे बढ़ेगा, नाटो गठबंधन के भविष्य और ट्रांस-अटलांटिक संबंधों के ताने-बाने पर इसका गहरा और स्थाई असर साफ तौर पर पूरी दुनिया को दिखाई देगा।

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