अधिक मास और खरमास में क्या अंतर है? ज्योतिषीय गणना, धार्मिक महत्व और शुभ-अशुभ कार्यों की पूरी जानकारी, जानें कब और क्यों लगते हैं दोनों
अधिक मास और खरमास में क्या अंतर है? चंद्र-सौर गणना, धार्मिक महत्व और मांगलिक कार्यों पर प्रतिबंध की पूरी ज्योतिषीय जानकारी।
Adhik Maas vs Kharmas: ज्योतिष गणना के अनुसार, पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में यानी एक सौर वर्ष में करीब 365 दिन और 6 घंटे लगते हैं, जबकि चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है। इन दोनों वर्षों के बीच प्रतिवर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर आता है। इसी अंतर को संतुलित करने और ऋतुओं के साथ तालमेल बिठाने के लिए हर लगभग तीन साल में पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे ‘अधिक मास’ कहा जाता है। जिस महीने में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती, यानी सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता, उसे ही अधिक मास माना जाता है। इस मास को ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह साक्षात भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस महीने में की गई पूजा-पाठ, जप और दान का फल अन्य महीनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है। भले ही इस काल में विवाह जैसे सांसारिक मांगलिक कार्य वर्जित हों, लेकिन आध्यात्मिक साधना के दृष्टिकोण से यह समय वर्ष का सबसे श्रेष्ठ काल माना गया है।
Adhik Maas vs Kharmas: खरमास का ज्योतिषीय आधार और प्रभाव
अधिक मास के विपरीत, खरमास एक ऐसी ज्योतिषीय स्थिति है जो हर साल नियमित रूप से दो बार आती है। इसका संबंध पूरी तरह से सूर्य के गोचर से है। जब सूर्य बृहस्पति की राशियों यानी धनु या मीन में प्रवेश करता है, तब उस एक महीने की अवधि को खरमास कहा जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इन राशियों में प्रवेश करने पर सूर्य की गति कुछ धीमी हो जाती है और उनका प्रभाव कम हो जाता है, जिससे यह समय शुभ कार्यों के शुभारंभ के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। यही कारण है कि खरमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यापार की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्यों पर प्रतिबंध रहता है। जैसे ही सूर्य मकर या मेष राशि में प्रवेश करता है, खरमास समाप्त हो जाता है और मांगलिक कार्यों की शुरुआत पुनः हो जाती है। खरमास मुख्य रूप से संयम, स्वाध्याय और मानसिक विराम का समय माना जाता है।
अधिक मास और खरमास के बीच के मुख्य अंतर और धार्मिक महत्व
इन दोनों अवधियों के बीच सबसे बड़ा अंतर इनकी पुनरावृत्ति और गणना पद्धति का है। अधिक मास का संबंध चंद्र-सौर गणना के संतुलन से है और यह लगभग हर 32 महीने के बाद आता है, जबकि खरमास पूरी तरह सूर्य के गोचर पर आधारित है और यह हर साल निश्चित समय पर आता है। अधिक मास एक पूर्ण अतिरिक्त महीना होता है, जबकि खरमास सूर्य की स्थिति के कारण उत्पन्न हुई एक स्थिति है। आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक मास में भगवान विष्णु की भक्ति का विशेष महत्व है, जहाँ व्यक्ति अपने अंतर्मन की शुद्धि के लिए साधना करता है। वहीं, खरमास में सूर्य की ऊर्जा क्षीण होने के कारण सांसारिक उत्सवों से परहेज किया जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दौरान किए गए शुभ कार्य फलदायी नहीं होते। हालांकि, दोनों ही समय में दान-पुण्य की महिमा समान रूप से बताई गई है, जो व्यक्ति को मानसिक शांति और सकारात्मकता प्रदान करती है।
Adhik Maas vs Kharmas: भ्रम का निवारण और निष्कर्ष
अक्सर सामान्य जनमानस में यह धारणा बनी रहती है कि अधिक मास और खरमास एक ही हैं क्योंकि दोनों ही समय में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। परंतु विद्वानों का मत है कि अधिक मास जहाँ भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खोलता है, वहीं खरमास प्रकृति के साथ तालमेल बिठाते हुए रुकने और विचार करने का संदेश देता है। अधिक मास चंद्र गणना का हिस्सा है और खरमास सौर गणना का। इन दोनों के सूक्ष्म अंतर को समझना इसलिए आवश्यक है ताकि श्रद्धालु अपने धार्मिक कृत्यों का संपादन सही तिथि और सही उद्देश्य के साथ कर सकें। संक्षेप में, अधिक मास जहाँ ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करने का विशेष अवसर है, वहीं खरमास ग्रहों की स्थिति के अनुसार जीवन में अनुशासन और संयम का पालन करने की सीख देता है।
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