बंगाल में मतदाता सूची घोटाले में चुनाव आयोग की सख्ती के बाद 4 WBCS अधिकारियों समेत 5 पर FIR, ममता ने कहा तुगलकी है आयोग

चुनाव आयोग की चेतावनी के बाद ममता सरकार ने झुककर 5 लोगों पर FIR दर्ज की, WBCS के 4 अधिकारी शामिल, सुप्रीम कोर्ट ने डेडलाइन बढ़ाई

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West Bengal: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर चल रहा विवाद अब और गहरा गया है। चुनाव आयोग की कड़ी चेतावनी और मंगलवार शाम तक के अल्टीमेटम के बाद बंगाल सरकार को आखिरकार झुकना पड़ा। राज्य सरकार ने मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप में वेस्ट बंगाल सिविल सर्विस (WBCS) के चार अधिकारियों समेत कुल पांच लोगों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर दी है। इन अधिकारियों में दो मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ERO) और दो सहायक मतदाता पंजीकरण अधिकारी (AERO) शामिल हैं।

ये सभी पूर्व मेदिनीपुर के मयना और दक्षिण 24 परगना के बारुईपुर पूर्व विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान तैनात थे। राज्य सचिवालय सूत्रों के अनुसार समय सीमा समाप्त होने से पहले ही पांचों के खिलाफ कार्रवाई कर दी गई। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मंगलवार को बातों-बातों में इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि आयोग के कहने पर कदम उठाया गया है, हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर एफआईआर का उल्लेख नहीं किया।

क्या है मतदाता सूची में गड़बड़ी का पूरा मामला

यह विवाद पश्चिम बंगाल में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) से जुड़ा है। भारत निर्वाचन आयोग ने 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल में मतदाता सूची की बड़े पैमाने पर सफाई और सत्यापन का अभियान चलाया। इस प्रक्रिया के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। आरोप है कि कुछ अधिकारियों ने मतदाता सूची में फर्जी नाम जोड़े और दावों तथा आपत्तियों की सुनवाई के दौरान गैर-सूचीबद्ध पहचान दस्तावेजों को सूचीबद्ध दस्तावेजों के रूप में अपलोड किया।

आयोग ने इसे गंभीर और जानबूझकर किया गया अपराध करार दिया। एक मामले में कोलकाता में संबंधित अधिकारी ने मतदाता के पहचान दस्तावेज के रूप में पासपोर्ट का उल्लेख किया, लेकिन वास्तव में सिस्टम में आधार कार्ड की तस्वीर अपलोड कर दी। ऐसी गड़बड़ियां माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की निगरानी में पकड़ी गईं।

West Bengal: सात अधिकारियों का निलंबन

भारत निर्वाचन आयोग ने इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाया। एफआईआर की कार्रवाई से दो दिन पहले ही आयोग ने पश्चिम बंगाल के सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया था जो विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सहायक मतदाता पंजीकरण अधिकारी के रूप में प्रतिनियुक्ति पर काम कर रहे थे। इन अधिकारियों पर गंभीर कर्तव्य उल्लंघन, कदाचार और वैधानिक शक्तियों के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए।

आयोग ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि इनके खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जाए। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत ये अधिकारी चुनाव आयोग के अधीन काम कर रहे थे और आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची की पवित्रता के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी लिया संज्ञान, बढ़ाई डेडलाइन

यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा जहां मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की समय सीमा एक सप्ताह बढ़ा दी। पहले 14 फरवरी तक अंतिम सूची प्रकाशित होनी थी जो अब 28 फरवरी तक हो सकेगी। कोर्ट ने कहा कि मतदाता पंजीकरण अधिकारियों को दस्तावेजों की जांच और उचित निर्णय लेने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया। यह नोटिस पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान हिंसा और चुनाव रिकॉर्ड जलाए जाने के आरोपों को लेकर जारी किया गया। यह पूरा घटनाक्रम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

West Bengal: ममता बनर्जी ने आयोग पर जमकर साधा निशाना

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हालांकि आयोग के निर्देश का पालन किया लेकिन साथ ही उन पर तीखा हमला भी बोला। ममता ने चुनाव आयोग को तुगलकी आयोग करार दिया और आरोप लगाया कि आयोग राज्य के मामलों में बेवजह हस्तक्षेप कर रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य के अधिकारियों ने पूरी प्रक्रिया के दौरान अथक परिश्रम किया है और सरकार अपने कर्मचारियों के साथ खड़ी है। ममता ने यह भी दावा किया कि कुछ छोटी-मोटी प्रशासनिक गलतियों को बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है। दूसरी ओर विपक्षी दलों ने इस पूरे प्रकरण को तृणमूल सरकार की मतदाता सूची में संगठित धांधली का सबूत बताया है। भारतीय जनता पार्टी ने मांग की है कि इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए।

बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर क्या होगा असर?

यह सारा विवाद ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए तैयारियां जोरों पर हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बंगाल में अप्रैल 2026 में चुनाव हो सकते हैं और चुनाव कार्यक्रम की घोषणा मार्च में संभावित है। ऐसे में मतदाता सूची की शुद्धता सबसे अहम मुद्दा बन गई है। आयोग ने अब माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की भूमिका बढ़ा दी है और वे सुनिश्चित करेंगे कि केवल आयोग द्वारा सूचीबद्ध दस्तावेज ही पहचान प्रमाण के रूप में अपलोड किए जाएं। विशेष रोल ऑब्जर्वर्स एक और स्तर की समीक्षा करेंगे। प्रशासनिक हलकों में यह कार्रवाई तूफान ला चुकी है क्योंकि अपने ही अधिकारियों के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा एफआईआर दर्ज करना एक अभूतपूर्व कदम माना जा रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चुनाव से पहले मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल बने रहे तो इसका सीधा असर चुनावी नतीजों की स्वीकार्यता पर पड़ सकता है। अब सबकी नजरें 28 फरवरी को प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची पर टिकी हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी आरोप लगाया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान उनकी पार्टी के समर्थकों के नाम बड़े पैमाने पर हटाए गए हैं और उन्होंने चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की मांग की है। यह विवाद केवल बंगाल तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे देश में मतदाता सूची की पारदर्शिता और डिजिटल सत्यापन प्रक्रिया पर बहस छेड़ गई है।

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि आने वाले दिनों में और भी कड़ी कार्रवाई हो सकती है और जिन अधिकारियों से संतोषजनक जवाब नहीं मिलेगा उनके खिलाफ सेवा से निलंबन और आपराधिक मुकदमा दोनों चलाए जाएंगे। आयोग ने यह भी सुनिश्चित किया है कि अब बेहतर प्रशिक्षण और तकनीकी निगरानी के जरिए ऐसी गड़बड़ियों की पुनरावृत्ति रोकी जाएगी। कुल मिलाकर यह प्रकरण भारतीय लोकतंत्र की नींव यानी स्वच्छ मतदाता सूची की अहमियत को रेखांकित करता है।

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