ईरान-अमेरिका युद्ध से अदाणी पोर्ट्स के चाबहार निवेश पर मंडराया खतरा, हाइफा बंदरगाह सुरक्षित लेकिन शिपिंग पर बड़ा संकट, जानें भारत को क्या होगा नुकसान
मिडल-ईस्ट संकट में अदाणी पोर्ट्स का हाइफा बंदरगाह सुरक्षित, चाबहार निवेश जोखिम में। होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावित, शिपिंग लागत बढ़ी, भारत को तेल-व्यापार नुकसान।
US-Iran War: पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच छिड़ी जंग ने जहां एक तरफ पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है वहीं इसका असर भारत के बड़े कारोबारी समूह अदाणी पोर्ट्स एंड एसईजेड लिमिटेड यानी APSEZ पर भी पड़ने लगा है। अदाणी समूह के दो बड़े बंदरगाह इस संकट के केंद्र में हैं। एक है इजरायल का हाइफा बंदरगाह जिसे अदाणी समूह ने 2022 में 1.13 अरब डॉलर में खरीदा था और दूसरा है ईरान का चाबहार बंदरगाह जो भारत के लिए केवल एक व्यापारिक केंद्र नहीं बल्कि मध्य एशिया तक पहुंचने की रणनीतिक जीवनरेखा है। हाइफा बंदरगाह फिलहाल सुरक्षित है लेकिन चाबहार को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। इस पूरे संकट में भारत के समुद्री व्यापार और निवेश पर क्या असर पड़ सकता है आइए विस्तार से समझते हैं।
हाइफा बंदरगाह फिलहाल सुरक्षित
रविवार को हाइफा पोर्ट कंपनी ने आधिकारिक बयान जारी कर पुष्टि की कि मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष के बावजूद बंदरगाह की सभी संपत्तियां और बुनियादी ढांचा पूरी तरह सुरक्षित और चालू हैं। कंपनी के सभी कर्मचारी भी सुरक्षित हैं। यह खबर अदाणी समूह के लिए थोड़ी राहत देने वाली है।
हाइफा बंदरगाह इजरायल के उत्तरी हिस्से में स्थित है और यह देश का सबसे बड़ा बंदरगाह है। 2021 में इस बंदरगाह ने इजरायल की कुल कार्गो मात्रा का 56 प्रतिशत अकेले संभाला था। इसमें दस टर्मिनल हैं और यह सड़क और रेल दोनों मार्गों से अच्छी तरह जुड़ा है। वित्त वर्ष 2025 की पहली तिमाही में इस बंदरगाह ने कंटेनर कार्गो में 25 प्रतिशत और अन्य माल में 38 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की थी। लेकिन युद्ध की स्थिति में यह प्रदर्शन बनाए रखना कठिन होगा।
US-Iran War: चाबहार पर सबसे बड़ा रणनीतिक दांव
असली चिंता चाबहार को लेकर है। ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए सिर्फ एक व्यापारिक बंदरगाह नहीं है। यह भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का एकमात्र ऐसा रास्ता है जो पाकिस्तान को बायपास करता है। 2024 में भारत की सरकारी कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल यानी IPGL ने 10 साल के समझौते के तहत करीब 370 मिलियन डॉलर यानी करीब 3,100 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की थी।
अब जब ईरान और अमेरिका सीधे युद्ध में उलझ गए हैं तो यह पूरा निवेश खतरे में पड़ गया है। युद्ध की स्थिति में दुनियाभर की शिपिंग कंपनियां ईरानी बंदरगाहों से दूरी बनाने लगती हैं जिससे वहां का कार्गो कारोबार लगभग शून्य हो सकता है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में चलने वाले जहाजों के लिए युद्ध जोखिम बीमा बेहद महंगा हो जाता है जिससे माल ढुलाई की लागत आसमान छूने लगती है।
यह जरूर है कि चाबहार बंदरगाह होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर स्थित है लेकिन व्यापक संघर्ष की स्थिति में मिसाइल या ड्रोन हमले का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता। 2018 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रंप प्रशासन ने चाबहार के लिए विशेष छूट दी थी लेकिन अब जब ट्रंप खुद इस युद्ध में शामिल हैं तो वह छूट बनाए रखने की कोई गारंटी नहीं है।
FIEO ने जताई गंभीर चिंता
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन यानी FIEO के महानिदेशक और सीईओ अजय सहाय ने इस पूरे संकट पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव से वैश्विक शिपिंग मार्गों में व्यवधान तो आया है लेकिन जरूरी नहीं कि यह लंबे समय तक चले। हालांकि उन्होंने एक बड़ी चेतावनी भी दी। सहाय ने कहा कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में व्यवधान लंबे समय तक बना रहा तो जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर गुजरना पड़ सकता है। इससे यात्रा का समय 12 से 20 दिन तक बढ़ जाएगा और माल ढुलाई की लागत, बीमा शुल्क और निर्यातकों के परिचालन खर्चों में भारी बढ़ोतरी होगी।
सहाय ने पिछला एक बेहद चौंकाने वाला आंकड़ा भी साझा किया। उन्होंने बताया कि ईरान के पिछले संघर्ष के दौरान माल ढुलाई की दरों में 200 से 300 प्रतिशत तक का उछाल आया था जिससे भारतीय निर्यातकों के व्यापार लाभ पर भारी दबाव पड़ा था।
US-Iran War: भारत-ईरान व्यापार पर भी असर
भारत और ईरान के बीच 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार करीब 1.6 अरब डॉलर का रहा था जिसमें भारत का निर्यात 1.2 अरब डॉलर और आयात 0.4 अरब डॉलर के आसपास था। युद्ध की स्थिति में यह पूरा व्यापार बाधित हो सकता है। इसके अलावा मध्य-पूर्व के देश भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार हैं और इस पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था अगर प्रभावित हुई तो मुंद्रा जैसे भारत के बड़े बंदरगाहों पर भी कार्गो कम हो सकता है।
फिलहाल भारत सरकार संबंधित सभी पक्षों से लगातार संपर्क में है और चाबहार पर अमेरिकी नीतियों के प्रभाव को कम करने के लिए वार्ता जारी है। लेकिन जब तक मध्य-पूर्व में शांति नहीं लौटती तब तक यह अनिश्चितता बनी रहेगी।
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