लोकसभा में पेट्रोल-डीजल टैक्स पर घमासान: कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने मोदी सरकार पर साधा निशाना, एक्साइज ड्यूटी में भारी बढ़ोतरी, किसान कर्ज, रुपया गिरावट और आर्थिक असमानता पर उठाए तीखे सवाल

हुड्डा ने एक्साइज ड्यूटी बढ़ोतरी पर सरकार को घेरा, कई मुद्दों पर सवाल

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Deepender Hooda: रोहतक से कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने लोकसभा में वित्त विधेयक पर चर्चा के दौरान पेट्रोल और डीजल पर लगाए जाने वाले टैक्स के आंकड़े सामने रखकर मोदी सरकार को घेरा। हुड्डा ने दावा किया कि कांग्रेस शासन में पेट्रोल पर 9 रुपये और डीजल पर साढ़े तीन रुपये एक्साइज ड्यूटी थी, जो अब बढ़कर क्रमशः 23 रुपये और 21 रुपये प्रति लीटर हो चुकी है। उन्होंने किसान कर्ज माफी, कॉर्पोरेट छूट और रुपये की गिरावट पर भी सरकार को आड़े हाथों लिया।

Deepender Hooda संसद में गूंजा पेट्रोल टैक्स का मुद्दा

नई दिल्ली। मंगलवार को लोकसभा में वित्त विधेयक पर चर्चा के दौरान माहौल उस वक्त गर्म हो गया जब रोहतक से कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले केंद्रीय उत्पाद शुल्क के आंकड़े सदन के सामने रखे। हुड्डा ने सीधे शब्दों में कहा कि जब देश में कांग्रेस की सरकार थी, तब एक लीटर पेट्रोल पर केवल 9 रुपये की एक्साइज ड्यूटी ली जाती थी। उसी दौर में डीजल पर यह राशि मात्र साढ़े तीन रुपये प्रति लीटर थी।

Deepender Hooda: आज पेट्रोल पर 23 और डीजल पर 21 रुपये का बोझ

हुड्डा ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में एक लीटर पेट्रोल पर 23 रुपये की एक्साइज ड्यूटी वसूली जा रही है। एक लीटर डीजल पर यह शुल्क 21 रुपये तक पहुंच चुका है। कांग्रेस सांसद ने इन आंकड़ों की तुलना करते हुए कहा कि पेट्रोल पर टैक्स में ढाई गुना से ज्यादा और डीजल पर छह गुना से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने सरकार को सीधे शब्दों में कहा, “आपको शर्म आनी चाहिए।”

Deepender Hooda: किसानों का कर्ज और कॉर्पोरेट माफी का विरोधाभास

हुड्डा ने संसद में एक और अहम बिंदु उठाया। उन्होंने कहा कि देश के किसानों पर आज कुल 32 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है, लेकिन सरकार के पास उनका एक रुपया भी माफ करने की कोई योजना नहीं है। दूसरी तरफ उन्होंने आरोप लगाया कि बिना किसी औपचारिक योजना के कॉर्पोरेट घरानों के 16 लाख करोड़ रुपये के कर्ज माफ कर दिए गए। उन्होंने कहा कि यही इस सरकार की असली प्राथमिकता है, जो आम किसान और कॉर्पोरेट के बीच के फर्क को उजागर करती है।

Deepender Hooda: सिलेंडर संकट नहीं, यह सरेंडर संकट है

दीपेंद्र हुड्डा ने इस बहस में एक तीखा राजनीतिक कटाक्ष करते हुए कहा कि देश में केवल “सिलेंडर संकट” नहीं, बल्कि “सरेंडर संकट” भी है। उनका इशारा इस बात की तरफ था कि भारत की ऊर्जा नीति और तेल खरीद के फैसले अब अमेरिका के इशारे पर हो रहे हैं। हुड्डा ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि कहीं ऐसा न हो जाए कि अमेरिका के समयानुसार भारत का बजट रात 12 बजे पेश होने लगे।

Deepender Hooda: रुपये की गिरावट पर सीधा सवाल

कांग्रेस सांसद ने भारतीय रुपये की कमजोरी पर भी सरकार से जवाब मांगा। उन्होंने कहा कि ईरानी रियाल और लेबनानी पाउंड के साथ भारतीय रुपया भी उन मुद्राओं में शामिल है जिनमें सबसे तेज गिरावट आई है। हुड्डा ने तंज कसा कि ईरान और लेबनान पर बम गिर रहे हैं, इसलिए उनकी मुद्रा कमजोर हो रही है। लेकिन वित्त मंत्री यह बताएं कि भारत पर कौन सा बम गिर रहा है जिसकी वजह से रुपया इतना कमजोर हो गया है।

Deepender Hooda: संपत्ति असमानता की भयावह तस्वीर

हुड्डा ने देश में बढ़ती आर्थिक असमानता पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि देश की केवल एक प्रतिशत आबादी के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 40 प्रतिशत हिस्सा है। इसके उलट 50 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का मात्र तीन प्रतिशत हिस्सा है। उन्होंने इसे सरकार की गलत आर्थिक नीतियों का सीधा परिणाम बताया।

Deepender Hooda: विशेषज्ञों की राय

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क केंद्र सरकार के राजस्व का एक प्रमुख स्रोत रहा है। वर्ष 2014 के बाद से इस शुल्क में कई बार बढ़ोतरी की गई, विशेषकर तब जब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें कम थीं। कर नीति विशेषज्ञों का मानना है कि एक्साइज ड्यूटी में कटौती से आम उपभोक्ता को सीधी राहत मिल सकती है, लेकिन इसके लिए सरकार को राजकोषीय घाटे का संतुलन भी बनाए रखना होता है।

निष्कर्ष

लोकसभा में दीपेंद्र हुड्डा का यह भाषण केवल पेट्रोल और डीजल के टैक्स तक सीमित नहीं था, बल्कि यह देश की समग्र आर्थिक दिशा पर एक व्यापक प्रश्न था। किसान कर्ज, कॉर्पोरेट माफी, मुद्रा अवमूल्यन और संपत्ति असमानता जैसे गंभीर मुद्दों को एक साथ उठाकर उन्होंने सरकार को कई मोर्चों पर घेरने की कोशिश की। यह बहस इस बात की याद दिलाती है कि राजकोषीय नीतियों का सीधा असर आम नागरिक की जेब पर पड़ता है।

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