मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार, लाडली बहना से गृहलक्ष्मी तक 1.7 लाख करोड़ खर्च, राज्य कर्ज में डूबे
सुप्रीम कोर्ट ने लाडली बहना-गृहलक्ष्मी जैसी फ्रीबी योजनाओं पर कड़ी टिप्पणी की, CJI बोले- आर्थिक विकास बाधित होगा; राज्यों का कर्ज बढ़ा, 1.7 लाख करोड़ का बोझ
Supreme Court: मुफ्त अनाज, साइकिल, लैपटॉप और लाडली बहना जैसी कैश ट्रांसफर योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बेहद कड़ी टिप्पणी की। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों द्वारा चुनाव से पहले मुफ्त सहायता यानी ‘फ्रीबी’ देने की घोषणा की कड़ी आलोचना करते हुए सवाल किया कि अगर सरकारें ऐसे ही मुफ्त भोजन और बिजली देना जारी रखती हैं तो वे वास्तविक विकास के लिए धन की व्यवस्था कैसे करेंगी। मामले की शुरुआत तमिलनाडु सरकार को लगाई गई कड़ी फटकार से हुई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले में दूसरे राज्यों को भी कड़ा संदेश दिया जाएगा।
Supreme Court: CJI का कड़ा रुख
भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान बेबाकी से कहा कि इस तरह की फिजूलखर्ची से देश का आर्थिक विकास बाधित होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राजनीतिक पार्टियों को मुफ्त योजनाओं के जरिए संसाधन बांटने के बजाय ऐसी सुनियोजित नीतियां बनानी चाहिए जिनसे लोगों के जीवन स्तर में वास्तविक और टिकाऊ सुधार हो सके।
1.7 लाख करोड़ रुपये का बोझ
फरवरी में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। वित्त वर्ष 2026 में बिना शर्त कैश ट्रांसफर योजनाओं पर कुल खर्च 1.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है जो राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद का 0.19 से 1.25 प्रतिशत और उनके बजटीय परिव्यय का 8.26 प्रतिशत तक है। इन योजनाओं को चलाने वाले लगभग आधे राज्य पहले से ही राजस्व घाटे में हैं और वे परिसंपत्ति सृजन के बजाय उपभोग को वित्तपोषित करने के लिए लोन ले रहे हैं। राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2022 के 2.6 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 3.2 प्रतिशत हो गया है।
Supreme Court: 9 राज्यों में एक लाख करोड़ से ज्यादा का बजट
2024-25 में 9 राज्यों ने महिला लाभार्थियों के लिए कैश ट्रांसफर योजनाओं पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च का बजट बनाया। कर्नाटक की गृहलक्ष्मी योजना पर 28,608 करोड़, मध्य प्रदेश की लाडली बहना योजना पर 18,984 करोड़, महाराष्ट्र की लड़की बहिन योजना पर 10,000 करोड़ और पश्चिम बंगाल की लक्ष्मीर भंडार योजना पर 14,400 करोड़ रुपये खर्च का अनुमान है। महाराष्ट्र की इस योजना की वार्षिक लागत 46,000 करोड़ रुपये आंकी गई है।
वित्त मंत्री भी दे चुकी हैं चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट से पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी इस मुद्दे पर चेतावनी दे चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि समस्या मुफ्त योजनाओं में नहीं बल्कि इस तथ्य में है कि राज्यों का बजट इसे वहन करने में सक्षम नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ राज्यों की 70 प्रतिशत आय निर्धारित खर्चों में जा रही है जिसके बाद विकास के लिए महज 30 प्रतिशत बचता है। वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि कर्ज चुकाने के लिए उधार लेना अच्छी बात नहीं है और कई राज्य अब केंद्र सरकार के साथ अपने कर्ज के पुनर्गठन के लिए बातचीत कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की यह कड़ी टिप्पणी और आर्थिक सर्वेक्षण के ये आंकड़े मिलकर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं कि क्या चुनावी फायदे के लिए बांटी जा रही ये मुफ्त योजनाएं देश के दीर्घकालिक आर्थिक विकास की कीमत पर तो नहीं चल रहीं।
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