क्या ऑप्शंस ट्रेडिंग अब सिर्फ अमीरों का खेल बन जाएगी? NSE प्रमुख के बयान ने छेड़ी बड़ी बहस, 91% रिटेल निवेशकों को हुआ था 1 लाख करोड़ का नुकसान

न्यूनतम पूंजी सीमा की मांग, 91% रिटेल निवेशकों को 1 लाख करोड़ का नुकसान, अमेरिका-सिंगापुर जैसे कड़े नियमों की बहस तेज, क्या बंद होगी आम आदमी की ट्रेडिंग?

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Share Market Update: भारतीय शेयर बाजार में ऑप्शंस और फ्यूचर्स ट्रेडिंग को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के शीर्ष अधिकारी ने फ्यूचर इंडस्ट्री एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में कहा है कि भारत को भी अमेरिका और सिंगापुर जैसे विकसित देशों की तर्ज पर डेरिवेटिव ट्रेडिंग के लिए न्यूनतम पात्रता मानदंड लागू करने चाहिए। इस बयान ने देशभर के लाखों रिटेल निवेशकों की नींद उड़ा दी है और यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आने वाले दिनों में आम आदमी के लिए ऑप्शंस ट्रेडिंग करना बंद हो जाएगा। इस बयान के पीछे जो कारण बताया गया है वह भी उतना ही चिंताजनक है, क्योंकि सेबी के आंकड़े बताते हैं कि बीते वित्त वर्ष में डेरिवेटिव सेगमेंट में कारोबार करने वाले 91 प्रतिशत रिटेल निवेशकों को एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ।

Share Market Update: क्यों उठाई जा रही है न्यूनतम पूंजी सीमा की मांग?

दरअसल डेरिवेटिव यानी फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस ट्रेडिंग एक बेहद जटिल और जोखिम भरा बाजार है। इसमें बिना पर्याप्त जानकारी और पूंजी के उतरने वाले निवेशक अक्सर बड़े घाटे में डूब जाते हैं। जो बात इस मामले को और गंभीर बना देती है वह यह है कि इस नुकसान की चपेट में सबसे अधिक समाज के निचले और मध्यम वर्ग के लोग आते हैं जो छोटी-छोटी बचत लगाकर जल्दी अमीर बनने के सपने के साथ इस बाजार में उतरते हैं। इन लोगों की अत्यधिक सट्टेबाजी की धारणा जब तक बनी रहेगी, सरकार और नियामक संस्थाएं इस पर लगाम लगाने के लिए नए-नए सख्त नियम बनाती रहेंगी।

यही कारण है कि अब यह सुझाव दिया जा रहा है कि डेरिवेटिव ट्रेडिंग में भाग लेने के लिए एक न्यूनतम पूंजी की सीमा तय की जानी चाहिए ताकि जो लोग इस बाजार का जोखिम वहन कर सकते हैं, केवल वही इसमें प्रवेश करें। इससे छोटे निवेशकों को अनजाने में बड़े नुकसान से बचाया जा सकेगा।

अमेरिका और सिंगापुर में कैसा है नियम?

अमेरिका में डेरिवेटिव ट्रेडिंग के लिए मार्जिन खाते में कम से कम 25,000 डॉलर यानी करीब 21 लाख रुपये की अनिवार्य न्यूनतम शेष राशि रखना जरूरी होता है। इसके अलावा अमेरिका और सिंगापुर दोनों देशों में आधुनिक ट्रेडिंग अनुमतियां और मार्जिन खाते के रखरखाव से जुड़े कठोर नियम लागू हैं। इन नियमों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि केवल वही व्यक्ति डेरिवेटिव बाजार में प्रवेश करे जिसके पास पर्याप्त वित्तीय क्षमता और जोखिम झेलने की ताकत हो। भारत में अभी ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है, जिसकी वजह से कोई भी व्यक्ति बेहद कम पूंजी के साथ ऑप्शंस और फ्यूचर्स में ट्रेडिंग शुरू कर सकता है।

Share Market Update: सेबी और सरकार पहले से कस रहे हैं शिकंजा

यह बयान ऐसे समय में आया है जब बाजार नियामक सेबी और केंद्र सरकार पहले से ही फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस सेगमेंट में खुदरा निवेशकों की भागीदारी सीमित करने के लिए कई कड़े कदम उठा रहे हैं। एक फरवरी को पेश केंद्रीय बजट में डेरिवेटिव लेनदेन पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स यानी STT बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके तहत इक्विटी फ्यूचर्स पर STT 0.02 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.05 प्रतिशत और ऑप्शंस प्रीमियम पर 0.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.15 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है। STT बढ़ने से ट्रेडिंग की लागत बढ़ेगी जिससे स्वाभाविक रूप से छोटे निवेशकों का इस बाजार में आना कम होगा।

चौंकाने वाले हैं नुकसान के आंकड़े

सेबी के आंकड़े इस पूरी बहस को और गंभीर बना देते हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में डेरिवेटिव सेगमेंट में कारोबार करने वाले 91 प्रतिशत व्यक्तिगत रिटेल निवेशकों को एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। यह आंकड़ा पिछले वित्त वर्ष के 74,812 करोड़ रुपये के मुकाबले 41 प्रतिशत अधिक है। औसतन देखें तो हर रिटेल ट्रेडर को वित्त वर्ष 2024-25 में 1.1 लाख रुपये का नुकसान हुआ जो सालाना आधार पर 27 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाता है।

ये आंकड़े बताते हैं कि लाखों आम लोग इस बाजार में आकर अपनी मेहनत की कमाई गंवा रहे हैं। इनमें से अधिकांश लोग यूट्यूब और सोशल मीडिया पर चल रहे तथाकथित ट्रेडिंग गुरुओं के बहकावे में आकर बिना उचित जानकारी के इस बेहद जोखिम भरे बाजार में उतर जाते हैं।

Share Market Update: क्या सच में बंद होगी रिटेल ट्रेडिंग?

हालांकि इस मामले में राहत की बात यह है कि कुछ डेरिवेटिव विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल बाजार नियामक प्रवेश स्तर पर किसी उपयुक्तता मानदंड को लागू करने की संभावना कम है। मार्च 2025 में सेबी के तत्कालीन एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया था कि नियामक फिलहाल फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस ट्रेडिंग के लिए किसी परीक्षा या योग्यता परीक्षण पर विचार नहीं कर रहा है।

लेकिन NSE के शीर्ष अधिकारी का यह बयान और सेबी तथा सरकार की सख्त होती नीतियां यह संकेत जरूर देती हैं कि आने वाले वर्षों में डेरिवेटिव ट्रेडिंग के नियम और कड़े हो सकते हैं। यदि आप भी ऑप्शंस ट्रेडिंग करते हैं या करने की सोच रहे हैं तो यह जरूरी है कि पहले इस बाजार को अच्छी तरह समझें, पर्याप्त पूंजी रखें और बिना सोचे-समझे किसी के कहने पर इसमें न उतरें।

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