Sharad Purnima 2026: चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए कौन-सा कलश है शुभ? जानें सही पात्र और पूजा विधि
शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए मिट्टी, तांबे, पीतल या चांदी में से क्या चुनें?
Sharad Purnima 2026: सनातन धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा अर्थात शरद पूर्णिमा का पर्व अद्वितीय स्थान रखता है। इस पावन निशा को कौमुदी उत्सव और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों और वैदिक ज्योतिष के अनुसार, वर्ष भर की समस्त पूर्णिमाओं में केवल शरद पूर्णिमा की रात्रि ही ऐसी होती है जब चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होकर पृथ्वी पर सुधा अर्थात अमृत की वर्षा करता है। इस दिव्य अवसर पर चंद्र देव के विधिवत पूजन, मध्यरात्रि में खुले आसमान के नीचे खीर रखने और अर्घ्य अर्पित करने का विशेष विधान शास्त्रों में वर्णित है। हालांकि, पूजा के दौरान श्रद्धालुओं के मन में प्रायः यह संशय उभरता है कि चंद्र देव को जल अर्पित करने के लिए मिट्टी, तांबे, चांदी अथवा पीतल में से किस धातु का कलश सर्वाधिक शुभ और शास्त्रसम्मत होता है।
Sharad Purnima 2026: शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा को अर्घ्य देने का धार्मिक और ज्योतिषीय रहस्य
ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन, जल, भावना, शांति, मातृत्व और मानसिक संतुलन का अधिपति ग्रह माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि चंद्रमा का जन्म क्षीरसागर मंथन के समय हुआ था, जिसके चलते उन्हें धन की अधिष्ठात्री देवी मां महालक्ष्मी का भ्राता भी माना जाता है। शरद पूर्णिमा की पावन तिथि पर चंद्र देव की सीधी किरणें अत्यंत शीतल, स्वास्थ्यवर्धक और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण होती हैं।
इस रात्रि को भगवान चंद्र देव को अर्घ्य समर्पित करने से व्यक्ति की जन्मकुंडली में स्थित चंद्र दोष शांत होता है, मानसिक उद्वेग और तनाव से मुक्ति मिलती है तथा घर-परिवार में सुख, आरोग्य और ऐश्वर्य का संचार होता है। अर्घ्य अर्पण करते समय उपयोग में लाए जाने वाले पात्र की धातु और उसमें मिले तत्वों का ज्योतिषीय दृष्टिकोण से सीधा प्रभाव जातक की आभा और मानसिक तरंगों पर पड़ता है, जिसके चलते सही पात्र का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
मिट्टी के कलश से अर्घ्य देना: पंचतत्वों की सादगी और पर्यावरण शुद्धि का प्रतीक
भारतीय सनातन पूजा पद्धति में मिट्टी के पात्रों को अनादि काल से सर्वोच्च पवित्रता और सात्विकता का प्रतीक माना गया है। मिट्टी सीधे तौर पर पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करती है और इसे बिना किसी रासायनिक मिलावट के प्रकृति से तैयार किया जाता है। शास्त्रों में कुम्हार द्वारा निर्मित नवीन सकोरे या मिट्टी की कलशी को किसी भी वैदिक अनुष्ठान के लिए पूर्णतः शुद्ध और निर्दोष स्वीकार किया गया है।
शरद पूर्णिमा की पावन रात नवीन मिट्टी के कलश में स्वच्छ जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, अक्षत और श्वेत पुष्प मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है। मिट्टी की यह प्राकृतिक शीतलता चंद्रमा के सौम्य स्वभाव से पूरी तरह मेल खाती है। जो श्रद्धालु प्रकृति के सानिध्य में सादगीपूर्ण और पारंपरिक तरीके से पूजन संपन्न करना चाहते हैं, उनके लिए मिट्टी का पात्र एक सर्वोत्तम और निर्विवाद विकल्प सिद्ध होता है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अर्घ्य के लिए प्रयुक्त मिट्टी का पात्र बिल्कुल नया, अखंडित और स्वच्छ होना चाहिए।
तांबे के कलश को लेकर ज्योतिषीय मान्यताएं और सावधानियां
हिंदू धर्म में तांबे को एक अत्यंत पावन और शुद्ध धातु माना जाता है। सनातन धर्म के अधिकांश नित्य पूजन, हवन, देव तर्पण और विशेष रूप से भगवान भुवन भास्कर सूर्य देव को नित्य अर्घ्य अर्पित करने में तांबे के लोटे का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है। तांबे का संबंध सूर्य ग्रह और अग्नि तत्व से माना गया है, जो तेजस्विता, ऊष्मा और पौरुष ऊर्जा का संचार करता है।
किंतु जब बात चंद्र देव की आराधना और उन्हें अर्घ्य देने की आती है, तो विभिन्न ज्योतिषीय ग्रंथों और परंपराओं में तांबे के पात्र के उपयोग को लेकर सतर्कता बरतने की सलाह दी जाती है। चंद्रमा स्वयं जल तत्व और शीतलता के अधिपति हैं, जबकि तांबा अग्नि तत्व और तीक्ष्णता का प्रतीक है। इसके अतिरिक्त, चंद्र देव के अर्घ्य में कच्चे दूध का मिश्रण अनिवार्य माना गया है, और आयुर्वेद व धर्मशास्त्रों के अनुसार तांबे के पात्र में दूध डालना रासायनिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से वर्जित माना गया है क्योंकि तांबे के संपर्क में आते ही दूध दूषित हो जाता है। इसी कारण दैनिक जागरण व अन्य प्रतिष्ठित धर्मग्रंथीय समीक्षाओं में भी शरद पूर्णिमा पर चंद्र देव को अर्घ्य देते समय तांबे के कलश से परहेज करने और दूध मिश्रित जल के लिए अन्य सौम्य धातुओं का चयन करने का निर्देश दिया गया है।
पीतल के कलश से अर्घ्य देना: देवगुरु बृहस्पति और चंद्रमा का शुभ संयोग
सनातन पूजा पद्धति में पीतल के बर्तनों का अत्यंत व्यापक और सर्वमान्य उपयोग होता आया है। पीतल को ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति की धातु के रूप में मान्यता प्राप्त है। देवगुरु बृहस्पति ज्ञान, विवेक, सात्विकता, विस्तार और धर्म के कारक ग्रह हैं।
जब शरद पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालु पीतल के कलश में जल, गाय का कच्चा दूध, मिश्री और सफेद चंदन घोलकर चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं, तो यह चंद्रमा और बृहस्पति के मिलन से बनने वाले शुभ ‘गजकेसरी’ प्रभाव की सात्विक ऊर्जा उत्पन्न करता है। पीतल के पात्र में दूध डालने से कोई रासायनिक दुष्प्रभाव भी नहीं होता। इसलिए अधिकांश आचार्यों और कुल परंपराओं में यदि चांदी का पात्र सुलभ न हो, तो पीतल के स्वच्छ और चमकीले कलश से चंद्रमा को अर्घ्य देना अत्यंत शुभ, फलदायी और समृद्धिदायक माना गया है।
चांदी का पात्र: चंद्रमा की कृपा प्राप्त करने का सर्वोत्तम माध्यम
धातुओं के सूक्ष्म ज्योतिषीय वर्गीकरण में चांदी को साक्षात चंद्रमा और शुक्र का प्रतीक माना गया है। चांदी की अंतर्निहित प्रकृति परम शीतल, शांत और जल तत्व को संतुलित करने वाली होती है। शास्त्रों के अनुसार यदि सामर्थ्य हो, तो शरद पूर्णिमा पर चंद्र देव को अर्घ्य देने के लिए चांदी के लोटे या कलश का उपयोग सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्तम फल प्रदान करने वाला माना गया है।
चांदी के कलश में गंगाजल, गाय का ताजा कच्चा दूध, अक्षत, सफेद बताशे अथवा मिश्री और श्वेत कनेर या मदार के फूल डालकर ‘ॐ सों सोमाय नमः’ अथवा ‘ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः’ मंत्र का उच्चारण करते हुए अर्घ्य देने से कुंडली के समस्त चंद्र दोषों का तत्क्षण शमन होता है। जिन व्यक्तियों को अत्यधिक क्रोध, अनिद्रा, अवसाद अथवा मानसिक अस्थिरता की शिकायत रहती है, उनके लिए चांदी के पात्र से शरद पूर्णिमा का अर्घ्य देना किसी दिव्य औषधि के समान कार्य करता है।
Sharad Purnima 2026: शरद पूर्णिमा पर अर्घ्य देते समय पालन किए जाने वाले अनिवार्य नियम
शरद पूर्णिमा की पावन निशा पर चंद्र देव को अर्घ्य अर्पित करते समय केवल पात्र की धातु ही नहीं, बल्कि पूजन की विधि और दिशा का ध्यान रखना भी अनिवार्य है। अर्घ्य देते समय जातक का मुख चंद्रमा की दिशा में होना चाहिए और दोनों हाथों से कलश को सीने के समानांतर ऊपर उठाकर जल की एक निरंतर पतली धार छोड़नी चाहिए।
इस बात का विशेष ध्यान रखें कि अर्घ्य का गिरता हुआ पावन जल सीधे पैरों पर न पड़े। इसके लिए भूमि पर कोई स्वच्छ परात, तांबे-कांसे का बड़ा थाल अथवा गमला रख लेना चाहिए ताकि अर्घ्य का जल किसी शुद्ध पौधे की जड़ में समाहित हो सके। जल अर्पण के पश्चात चंद्रमा की सोलह कलाओं का ध्यान करते हुए उसी स्थान पर तीन बार प्रदक्षिणा करनी चाहिए। अंत में मध्यरात्रि में अमृत रस से अभिसंचित की गई खीर को भगवान को अर्पित कर स्वयं और पूरे परिवार में प्रसाद रूप में वितरण करने से दीर्घायु, निरोगी काया और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
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