रुद्राष्टाध्यायी पाठ से होगा जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश, जानें संपूर्ण विधि और महत्व

शुक्ल यजुर्वेद के आठ अध्यायों में वर्णित है भगवान रुद्र की महिमा, बिना इस पाठ के अधूरा माना जाता है रुद्राभिषेक

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Rudrashtadhyayi Path on Mahashivratri: महाशिवरात्रि का पावन पर्व नजदीक आते ही भगवान शिव के भक्तों में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। इस दिन शिव मंदिरों में रुद्राभिषेक और रुद्री पाठ की विशेष धूम रहती है। वैदिक परंपरा में रुद्राष्टाध्यायी का पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण और फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रुद्राष्टाध्यायी का श्रद्धा से पाठ करने और इसके मंत्रों से शिवलिंग का अभिषेक करने पर जन्म-जन्मांतरों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

वेदों में भगवान शिव को ‘रुद्र’ कहा गया है, यानी वह महादेव जो समस्त दुखों का नाश करते हैं। इसलिए महाशिवरात्रि, सावन माह और किसी भी शुभ अवसर पर की जाने वाली शिव पूजा में रुद्राष्टाध्यायी का पाठ विशेष फलदायी और पुण्यदायक माना गया है।

Rudrashtadhyayi Path on Mahashivratri: क्या है रुद्राष्टाध्यायी और इसका महत्व?

रुद्राष्टाध्यायी शुक्ल यजुर्वेद संहिता के आठ अध्यायों में वर्णित भगवान रुद्र की महिमा और स्तुति का संग्रह है। ये आठ अध्याय शिव आराधना में सर्वोच्च स्थान रखते हैं और इनका विशेष धार्मिक महत्व है।

प्रत्येक अध्याय में भगवान शिव के विभिन्न रूपों, गुणों और शक्तियों का वर्णन किया गया है। पहले अध्याय में शिव संकल्प सूक्त है, दूसरे में पुरुष सूक्त, तीसरे में अप्रतिरथ सूक्त, चौथे में सूर्य सूक्त, पांचवें में प्रसिद्ध रुद्र सूक्त या नील सूक्त, छठे में त्र्यम्बक यजन, सातवें में जटा अध्याय और आठवें में चमक प्रश्न का समावेश है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार, रुद्राष्टाध्यायी के बिना न तो रुद्राभिषेक पूर्ण माना जाता है और न ही रुद्री पाठ। विशेषकर सावन के महीने में इसके मंत्रों से जल या दूध का अभिषेक करना अत्यंत शुभ और पापों का नाश करने वाला माना गया है।

रुद्र सूक्त में छिपा है विशेष रहस्य

रुद्राष्टाध्यायी के पांचवें अध्याय में वर्णित रुद्र सूक्त (नील सूक्त) को सबसे अधिक शक्तिशाली माना जाता है। इस सूक्त में भगवान शिव के विभिन्न रूपों का वर्णन है – नीलग्रीव, शितिकंठ, त्र्यम्बक, मृत्युंजय आदि।

इस सूक्त में महादेव से प्रार्थना की गई है कि वे अपने धनुष-बाण को हटा दें और हमें अपने कल्याणकारी रूप से दर्शन दें। “नमस्ते रुद्र मन्यव” से शुरू होने वाला यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली है और रोग, शोक, संताप से मुक्ति दिलाता है।

रुद्र सूक्त में भगवान शिव को पशुपति, वनस्पतिपति, पथीनां पति, औषधीनां पति आदि विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है, जो उनके सर्वव्यापी स्वरूप को दर्शाता है।

Rudrashtadhyayi Path on Mahashivratri: त्र्यम्बकं यजामहे – महामृत्युंजय मंत्र का स्रोत

रुद्राष्टाध्यायी के छठे अध्याय में प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥” का उल्लेख है।

यह मंत्र अकाल मृत्यु के भय को दूर करने, दीर्घायु की प्राप्ति, रोगों से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। महाशिवरात्रि पर इस मंत्र का जाप करना विशेष फलदायी होता है।

मंत्र में भगवान शिव से प्रार्थना की गई है कि जिस प्रकार ककड़ी अपनी बेल से सहज रूप से अलग हो जाती है, उसी प्रकार हमें भी मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, परंतु अमरत्व (मोक्ष) से वंचित न करें।

पाठ करने की विधि और नियम

रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करने से पहले स्नान आदि से शुद्ध होकर शिवलिंग की स्थापना करनी चाहिए। पाठ करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है:

पाठ का समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या महाशिवरात्रि की रात्रि में पाठ करना सर्वोत्तम माना जाता है। दिन के किसी भी शुभ समय में भी पाठ किया जा सकता है।

आवश्यक सामग्री: रुद्राक्ष माला, गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, भांग, चंदन और धूप-दीप की व्यवस्था करें।

पाठ विधि: सबसे पहले गणेश वंदना और गुरु वंदना करें। फिर संकल्प लेकर रुद्राष्टाध्यायी का पाठ प्रारंभ करें। प्रत्येक अध्याय के मंत्रों से शिवलिंग पर जल, दूध या गंगाजल अर्पित करते रहें।

Rudrashtadhyayi Path on Mahashivratri: किन परिस्थितियों में है पाठ आवश्यक

धर्मशास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में रुद्राष्टाध्यायी का पाठ अत्यंत आवश्यक और फलदायी होता है:

विशेष रुद्राभिषेक: जब महारुद्राभिषेक या लघुरुद्राभिषेक करना हो, तब इस पाठ के बिना अनुष्ठान अपूर्ण रहता है।

महामृत्युंजय अनुष्ठान: गंभीर रोग, अकाल मृत्यु के योग या किसी संकट से मुक्ति के लिए महामृत्युंजय मंत्र के अनुष्ठान से पहले रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करना आवश्यक है।

विशेष मनोकामना: जब कोई विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए भगवान शिव की आराधना की जा रही हो, तब यह पाठ अवश्य करना चाहिए।

संकट निवारण: ग्रह दोष, पितृ दोष, कालसर्प दोष या किसी भी प्रकार के संकट से मुक्ति के लिए विशेष पूजा-अनुष्ठान में यह पाठ करना चाहिए।

कब नहीं देखना जरूरी

हालांकि, कुछ परिस्थितियों में यह पाठ आवश्यक नहीं माना गया है:

  • जब निष्काम भाव से बिना किसी इच्छा के पूजा की जा रही हो
  • श्रावण मास के पूरे महीने में नियमित शिव पूजन के समय
  • 12 ज्योतिर्लिंगों या पवित्र तीर्थ स्थलों पर साधारण पूजा करते समय
  • प्रतिदिन सुबह-शाम की जाने वाली नियमित पूजा-अर्चना में

Rudrashtadhyayi Path on Mahashivratri: पाठ के अद्भुत लाभ

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रुद्राष्टाध्यायी के पाठ से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। यह पाठ जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

इस पाठ से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। रोग, शोक, दरिद्रता, शत्रु भय और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।

भगवान शिव की कृपा से सुख, समृद्धि, यश, कीर्ति और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। घर में शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

महाशिवरात्रि पर विशेष महत्व

महाशिवरात्रि के दिन रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इस दिन भगवान शिव गौरी पार्श्व में विराजमान होते हैं, जो अत्यंत शुभ और मंगलकारी स्थिति है।

इस दिन पूरी रात्रि जागरण करके, एकादश रुद्र या महारुद्र का पाठ करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। भक्तगण व्रत रखकर और पूर्ण श्रद्धा-भक्ति के साथ यह पाठ करके भोलेनाथ को प्रसन्न कर सकते हैं।

Rudrashtadhyayi Path on Mahashivratri: निष्कर्ष

रुद्राष्टाध्यायी वैदिक साहित्य की अमूल्य धरोहर है और शिव आराधना का सर्वोच्च मंत्र संग्रह है। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर इस पाठ को करने से भक्तों को अपार पुण्य और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जो भक्तगण पूर्ण विधि-विधान के साथ श्रद्धापूर्वक इस पाठ को करते हैं, उन पर महादेव की असीम कृपा बरसती है और उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय!

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