Rangbhari Ekadashi 2026: जानिए कब है फाल्गुन की यह खास एकादशी, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, पारण का समय और धार्मिक महत्व

फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर विष्णु-शिव पूजा, पूजन मुहूर्त 6:48-11:08 AM, पारण 28 फरवरी 6:59-9:20 AM; काशी में रंगों का त्योहार

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Rangbhari Ekadashi: हिंदू पंचांग में एकादशी तिथि को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है। प्रत्येक माह में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष मिलाकर दो एकादशी आती हैं और हर एक का अपना अलग धार्मिक महत्व एवं विधान होता है। इन्हीं में से एक विशिष्ट एकादशी है फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली रंगभरी एकादशी, जिसे कई स्थानों पर आमलकी एकादशी के नाम से भी पुकारा जाता है। यह एकादशी इसलिए भी अनूठी मानी जाती है क्योंकि इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के साथ-साथ देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती की आराधना का भी विधान है।

ऐसे में जो भक्त इस व्रत को विधिपूर्वक रखते हैं, उन्हें दोनों देवताओं की असीम कृपा प्राप्त होती है और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस वर्ष रंगभरी एकादशी किस तारीख को पड़ रही है, उपवास और पूजन का उत्तम समय क्या रहेगा और इस पर्व से जुड़ी पौराणिक कथा क्या है।

Rangbhari Ekadashi 2026 की तिथि कब है

हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ 27 फरवरी 2026 को मध्य रात्रि 12 बजकर 33 मिनट पर हो रहा है। इसी दिन रात्रि 10 बजकर 32 मिनट पर एकादशी तिथि का समापन हो जाएगा। चूंकि उदयातिथि के नियमानुसार एकादशी 27 फरवरी को सूर्योदय के समय विद्यमान रहेगी, इसलिए रंगभरी एकादशी का उपवास 27 फरवरी 2026, दिन शुक्रवार को रखा जाएगा। यह तिथि होली से ठीक पहले आती है, जिसके कारण इसका उत्साह और भी बढ़ जाता है।

Rangbhari Ekadashi 2026 का पूजन मुहूर्त

किसी भी व्रत या पूजा का पूरा लाभ तभी मिलता है जब उसे शास्त्रों में बताए गए शुभ मुहूर्त में संपन्न किया जाए। रंगभरी एकादशी के दिन 27 फरवरी 2026 को पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय प्रातःकाल 6 बजकर 48 मिनट से लेकर सुबह 11 बजकर 8 मिनट तक रहेगा। भक्तगण इस अवधि में भगवान विष्णु एवं शिव-पार्वती की विधिवत आराधना कर सकते हैं।

इसके अतिरिक्त जो श्रद्धालु और भी अधिक शुभ समय में पूजन करना चाहते हैं, उनके लिए ब्रह्म मुहूर्त का समय प्रातः 5 बजकर 9 मिनट से 5 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। ब्रह्म मुहूर्त में की गई पूजा का फल कई गुना अधिक माना जाता है क्योंकि यह दिन का सबसे सात्विक और पवित्र प्रहर होता है। इसी दिन अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 11 मिनट से दोपहर 12 बजकर 57 मिनट तक रहेगा, जो पूजा-अर्चना के लिए एक और उत्तम समय है।

Rangbhari Ekadashi 2026 व्रत पारण का समय

एकादशी का उपवास रखने वाले भक्तों के लिए पारण यानी व्रत तोड़ने का सही समय जानना उतना ही आवश्यक है जितना कि व्रत रखना। शास्त्रों के अनुसार एकादशी का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में ही करना चाहिए और द्वादशी समाप्त होने से पूर्व व्रत अवश्य खोल लेना चाहिए।

रंगभरी एकादशी का पारण 28 फरवरी 2026, दिन शनिवार को किया जाएगा। इस दिन पारण का उचित समय प्रातः 6 बजकर 59 मिनट से सुबह 9 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। द्वादशी तिथि इसी दिन रात्रि 8 बजकर 43 मिनट पर समाप्त होगी। भक्तों को ध्यान रखना चाहिए कि पारण का समय बीत जाने के बाद व्रत खोलने से शास्त्रोक्त विधान का पालन अधूरा रह जाता है, इसलिए निर्धारित समय में ही अन्न ग्रहण करें।

Rangbhari Ekadashi की पूजा कैसे करें

रंगभरी एकादशी के दिन व्रती को सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। सबसे पहले भगवान श्रीहरि विष्णु की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें और तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन, धूप एवं नैवेद्य अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें।

चूंकि इस एकादशी पर शिव-पार्वती की उपासना का भी विधान है, इसलिए शिवलिंग पर जल, दूध, बिल्वपत्र और धतूरे के फूल चढ़ाएं। ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करते हुए भोलेनाथ और माता पार्वती का ध्यान करें। पूजा के उपरांत एकादशी व्रत की कथा सुनें या पढ़ें और संध्या काल में भी भगवान का स्मरण करें। रात्रि में जागरण करना इस व्रत का विशेष अंग माना जाता है, जो व्रत के फल को और अधिक बढ़ा देता है।

Rangbhari Ekadashi से जुड़ी पौराणिक मान्यता और काशी का विशेष संबंध

रंगभरी एकादशी का सबसे गहरा संबंध काशी नगरी यानी वाराणसी से जोड़ा जाता है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी वह शुभ दिन था जब भगवान शंकर अपना विवाह संपन्न होने के पश्चात पहली बार माता पार्वती को साथ लेकर अपनी नगरी काशी में पधारे थे। महादेव और उमा के काशी आगमन पर समस्त देवी-देवताओं, गणों, ऋषियों और नगरवासियों में अपार हर्ष छा गया। सबने मिलकर दीप प्रज्वलित किए, मंगल गीत गाए और एक-दूसरे पर रंग, गुलाल तथा अबीर उड़ाकर इस आनंदमय अवसर को मनाया।

तभी से काशी में इस तिथि को बाबा विश्वनाथ और माता पार्वती के साथ होली खेलने की अनोखी परंपरा चली आ रही है। यही कारण है कि इस एकादशी को “रंगभरी” कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन से काशी में होली का उत्सव आरंभ हो जाता है। वाराणसी के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर में इस दिन भव्य आयोजन होता है, जहां हजारों श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ को रंग-गुलाल अर्पित करते हैं और मंदिर परिसर में भक्ति संगीत की मधुर धुनों के बीच रंगों का त्योहार मनाते हैं।

Rangbhari Ekadashi व्रत के आध्यात्मिक लाभ

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार रंगभरी एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और उसे इहलोक एवं परलोक दोनों में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस व्रत से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और भक्त को मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। साथ ही शिव-पार्वती की कृपा से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और अविवाहित व्यक्तियों को शीघ्र योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। जो भक्त इस एकादशी पर विधिपूर्वक उपवास, पूजन और रात्रि जागरण करते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल मिलता है।

इस प्रकार रंगभरी एकादशी न केवल आध्यात्मिक साधना का पर्व है, बल्कि यह रंगों और उल्लास के साथ ईश्वर भक्ति को जोड़ने वाला एक अद्भुत अवसर भी है। विशेष रूप से काशी में इस दिन का माहौल अत्यंत दिव्य और मनमोहक होता है, जो हर भक्त के हृदय को आनंद से भर देता है।

(डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।)

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