PM-AASHA Yojana: फसल के भाव गिरने पर किसानों को मिलेगा MSP का सुरक्षा कवच, ₹7,200 करोड़ के बजट से बढ़ेगी आय की सुरक्षा
फसल का भाव MSP से नीचे गिरने पर खरीद और मुआवजे से किसानों को मिलेगा राहत
PM-AASHA Yojana: देशभर में खेती-किसानी से जुड़े अन्नदाताओं के सामने केवल पसीना बहाकर बंपर पैदावार हासिल करना ही एकमात्र चुनौती नहीं होती, बल्कि फसल कटाई के बाद खुले बाजार में उस उपज का वाजिब और लाभकारी मूल्य पाना भी एक अत्यंत जटिल समस्या रही है। भारतीय कृषि क्षेत्र में अक्सर यह देखा गया है कि जब किसी विशेष मौसम में दलहन या तिलहन की बंपर आवक होती है, तो स्थानीय कृषि उपज मंडियों में फसलों के दाम औंधे मुंह गिर जाते हैं। कई बार स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि किसानों के लिए अपनी बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी की बुनियादी लागत निकालना भी दूभर हो जाता है। ऐसी ही विकट और अनिश्चित परिस्थितियों से देश के करोड़ों किसानों को सुरक्षित निकालने और उनकी मेहनत का एक-एक पैसा दिलाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान’ यानी ‘पीएम-आशा’ योजना को व्यापक स्तर पर लागू कर रही है।
इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य ध्येय किसानों को उनकी कृषि उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित कराना और सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था को धरातल पर अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाना है। अक्सर यह सवाल उठता है कि जब मंडियों में फसल के दाम अचानक न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चले जाते हैं, तब किसानों की आजीविका और आर्थिक स्थिरता को कैसे सुरक्षित रखा जाता है। केंद्र सरकार ने पीएम-आशा योजना के जरिए दलहन, तिलहन और खोपरा जैसी प्रमुख फसलों के लिए एक ऐसा त्रिस्तरीय सुरक्षा तंत्र विकसित किया है, जो बाजार में मंदी के समय किसानों के लिए मजबूत ढाल का कार्य करता है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत 7,200 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया है, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सरकार अन्नदाताओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को लेकर पूरी तरह सजग और गंभीर है।
PM-AASHA Yojana: पीएम-आशा योजना की पृष्ठभूमि, उद्देश्य और व्यापक कार्यप्रणाली
केंद्र सरकार ने सितंबर 2018 में ‘पीएम-आशा’ (PM-AASHA) योजना को औपचारिक रूप से मंजूरी दी थी। इस योजना की मूल संकल्पना किसानों की आय को सुरक्षित रखने और कृषि बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतों में होने वाले अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के उद्देश्य से तैयार की गई थी। इसके अंतर्गत पूर्व में संचालित विभिन्न बिखरी हुई मूल्य समर्थन व्यवस्थाओं को एक एकीकृत मंच पर लाया गया है ताकि आवश्यकतानुसार बाजार की तात्कालिक परिस्थितियों के अनुरूप त्वरित निर्णय लिए जा सकें।
जब भी खुले बाजार में किसी अधिसूचित फसल का थोक भाव केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे गिरता है, तो इस योजना के प्रावधान तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। इसका उद्देश्य केवल सरकारी खरीद करना ही नहीं है, बल्कि किसानों को किसी भी आपात स्थिति में अपनी उपज औने-पौने दामों पर बिचौलियों को बेचने (डिस्ट्रेस सेल) की पुरानी मजबूरी से पूरी तरह मुक्ति दिलाना है। सरकार का यह प्रयास विशेष रूप से दलहन और तिलहन की घरेलू पैदावार को बढ़ावा देने और खाद्य तेलों व दालों के महंगे विदेशी आयात पर देश की निर्भरता को न्यूनतम करने की राष्ट्रीय रणनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मूल्य समर्थन योजना (PSS): दलहन, तिलहन और खोपरा की शत-प्रतिशत खरीद का प्रावधान
पीएम-आशा योजना के अंतर्गत ‘मूल्य समर्थन योजना’ (Price Support Scheme – PSS) सबसे महत्वपूर्ण और धरातलीय घटक के रूप में कार्य करती है। इस व्यवस्था के तहत जब बाजार भाव एमएसपी से नीचे फिसल जाता है, तो राज्य सरकारों के विशेष प्रस्ताव पर केंद्रीय नोडल एजेंसियों के माध्यम से सीधे किसानों से भौतिक रूप से फसल की खरीद की जाती है। इस खरीद प्रक्रिया का दायित्व प्रमुख रूप से ‘नेफेड’ (NAFED) और ‘भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ’ (NCCF) जैसी शीर्ष संस्थाओं को सौंपा गया है।
फसल कटाई के मुख्य सीजन के दौरान जब मंडियों में बंपर आवक से कीमतों पर दबाव बनता है, तब पूर्व-पंजीकृत किसानों से निर्धारित गुणवत्ता (FAQ मानक) वाली उपज एमएसपी दरों पर खरीदी जाती है। देश को दलहन उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए अब तुअर (अरहर), उड़द और मसूर जैसी प्रमुख दालों के लिए केंद्रीय एजेंसियों द्वारा शत-प्रतिशत खरीद का विशेष प्रावधान भी लागू किया गया है। इसके अलावा मूंगफली, सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी और खोपरा (नारियल) जैसी नकदी फसलों के किसानों को भी इस योजना के माध्यम से मूल्य संरक्षण की गारंटी दी जाती है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच व्यय और नुकसान साझा करने की मजबूत व्यवस्था होने के कारण इसका दायरा देश के कोने-कोने तक विस्तृत हो चुका है।
मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS): बिना फसल खरीदे सीधे खाते में मुआवजा
पीएम-आशा की सबसे आधुनिक और अनूठी विशेषताओं में ‘मूल्य अंतर भुगतान योजना’ (Price Deficiency Payment Scheme – PDPS) शामिल है। यह योजना मुख्य रूप से तिलहनी फसलों के किसानों के लिए बनाई गई है। इस प्रणाली के तहत सरकार को किसान की पूरी फसल को गोदामों में खरीदकर रखने या उसके रखरखाव पर भारी खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती है।
इसके बजाय, पंजीकृत किसान अपनी तिलहन की उपज को स्थानीय कृषि उपज मंडी में पारदर्शी बोली के माध्यम से खुले बाजार में बेचते हैं। यदि किसान को मिला वास्तविक बिक्री मूल्य सरकार के घोषित एमएसपी से कम होता है, तो एमएसपी और बिक्री मूल्य के बीच के अंतर की राशि की सीधे गणना की जाती है। यह अंतर राशि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से बिना किसी बिचौलिए के सीधे किसान के बैंक खाते में जमा कर दी जाती है। इस तकनीक आधारित व्यवस्था से जहां एक ओर सरकारी खजाने पर भंडारण और परिवहन का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता, वहीं दूसरी ओर किसानों को उनकी फसल का पूरा और उचित मूल्य भी मिल जाता है।
बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS): फल और सब्जियों जैसी खराब होने वाली फसलों का संरक्षण
पीएम-आशा योजना के तीसरे महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में ‘बाजार हस्तक्षेप योजना’ (Market Intervention Scheme – MIS) कार्य करती है। यह योजना विशेष रूप से उन बागवानी और जल्दी खराब होने वाली कृषि उपजों (पेरिशेबल कमोडिटीज) के लिए बनाई गई है जिनके लिए केंद्र सरकार द्वारा कोई नियमित एमएसपी घोषित नहीं किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप से टमाटर, प्याज, आलू, अदरक, लहसुन, सेब और अन्य मौसमी फल व सब्जियां शामिल हैं।
जब भी किसी राज्य में बंपर उत्पादन या परिवहन अवरोधों के कारण इन खराब होने वाली फसलों के दाम उत्पादन लागत से भी नीचे गिर जाते हैं, तो संबंधित राज्य सरकार के अनुरोध पर केंद्र सरकार बाजार हस्तक्षेप लागू करती है। इसके तहत पूर्व-निर्धारित दरों पर खरीद की जाती है और खरीद में होने वाले नुकसान को केंद्र और राज्य सरकारें 50:50 (पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 75:25) के अनुपात में वहन करती हैं। यह व्यवस्था बागवानी किसानों को भारी वित्तीय तबाही से बचाने में अत्यंत कारगर सिद्ध होती है।
बजट में निरंतर ऐतिहासिक वृद्धि और वित्तीय सुदृढ़ता का रोडमैप
अन्नदाताओं की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने पीएम-आशा योजना के बजटीय आवंटन में लगातार उल्लेखनीय वृद्धि की है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए सरकार ने इस योजना हेतु 7,200 करोड़ रुपये का विशाल बजट निर्धारित किया है। इससे पूर्व वित्तीय वर्ष 2025-26 में इस योजना का संशोधित बजट 6,941 करोड़ रुपये था, जबकि वर्ष 2024-25 में वास्तविक व्यय 5,437 करोड़ रुपये दर्ज किया गया था।
बजट में की जा रही यह निरंतर वृद्धि इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को केवल कागजी घोषणाओं तक सीमित न रखकर उसे वास्तविक खरीद और वित्तीय क्षतिपूर्ति के रूप में किसानों तक पहुंचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। पर्याप्त बजटीय सहायता मिलने से केंद्रीय खरीद एजेंसियों को समय पर वित्तीय संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं, जिससे किसानों को अपनी फसल बेचने के कुछ ही दिनों के भीतर उनके बैंक खातों में भुगतान प्राप्त हो रहा है।
डिजिटल क्रांति, ई-समृद्धि पोर्टल और खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता
पीएम-आशा योजना की सफलता और विश्वसनीयता के पीछे डिजिटल तकनीकों और आधुनिक डेटाबेस का व्यापक उपयोग है। खरीद प्रणाली में पारदर्शिता लाने और फर्जीवाड़े को पूरी तरह समाप्त करने के लिए पूरी व्यवस्था को डिजिटल मंचों से जोड़ा गया है। इसके अंतर्गत किसानों का बायोमेट्रिक सत्यापन और भूमि अभिलेखों (भूलेख) का डिजिटल मिलान अनिवार्य किया गया है।
राष्ट्रीय स्तर पर ‘ई-समृद्धि’ (e-Samridhi) और ‘ई-संयुक्ति’ (e-Sanyukti) जैसे आधुनिक पोर्टल्स के माध्यम से किसानों का अग्रिम ऑनलाइन पंजीकरण किया जाता है। इसके अलावा राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ‘ई-नाम’ (e-NAM) प्लेटफॉर्म के एकीकरण से मंडियों में फसलों की नीलामी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो गई है। डिजिटल ट्रैकिंग के कारण वास्तविक किसानों को समय पर टोकन जारी होते हैं, वजन की सटीक डिजिटल माप होती है और भुगतान में किसी भी प्रकार की मानवीय देरी या भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं रहती है।
PM-AASHA Yojana: ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा और किसानों के जीवन पर दीर्घकालिक प्रभाव
पीएम-आशा योजना केवल एक मूल्य समर्थन कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह देश की संपूर्ण ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करने का एक प्रमुख माध्यम बन चुकी है। जब किसानों को अपनी दलहनी और तिलहनी फसलों का सुनिश्चित मूल्य मिलता है, तो वे पारंपरिक धान-गेहूं के फसल चक्र से बाहर निकलकर फसल विविधीकरण (क्रॉप डायवर्सिफिकेशन) की ओर अग्रसर होते हैं। इससे भूजल का संरक्षण होता है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति में सुधार होता है।
दालों और तिलहन के घरेलू उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ने से देश को हजारों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है, जिसे पूर्व में पाम ऑयल और दालों के आयात पर खर्च करना पड़ता था। एमएसपी को उत्पादन लागत (A2+FL) का कम से कम 1.5 गुना (डेढ़ गुना) रखने की नीति के साथ जब पीएम-आशा का सुरक्षा कवच जुड़ता है, तो किसानों को एक सम्मानजनक मुनाफा प्राप्त होता है। यह व्यवस्था अन्नदाताओं को साहूकारों के कर्ज के दुष्चक्र से बाहर निकालकर उन्हें आत्मनिर्भर, सशक्त और आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभा रही है।
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