महाशिवरात्रि पर हिंदू पक्ष को बड़ी राहत, कर्नाटक हाई कोर्ट ने दरगाह में शिवलिंग पूजा की दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने दरगाह कमेटी की याचिका खारिज की, 15 श्रद्धालुओं को सीमित पूजा की इजाजत, सुरक्षा के कड़े इंतजाम

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Mahashivratri: कर्नाटक के कलबुर्गी जिले से हिंदू पक्ष को महाशिवरात्रि से ठीक पहले बड़ी कानूनी राहत मिली है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए आलंद टाउन में स्थित एक दरगाह परिसर के अंदर मौजूद शिवलिंग की महाशिवरात्रि पर्व के अवसर पर पूजा-अर्चना करने की अनुमति प्रदान कर दी है। यह फैसला सिद्ध रामैया हीरेमठ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद आया है। अदालत ने पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी 15 फरवरी 2026 को महाशिवरात्रि के दिन सीमित संख्या में श्रद्धालुओं के साथ शिवलिंग की विधिवत पूजा करने की अनुमति दी है। यह निर्णय उस समय आया जब दरगाह कमेटी ने हिंदू संगठनों को पूजा करने की अनुमति न देने की अपील करते हुए सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

हालांकि, चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने दरगाह कमेटी की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि इस प्रकार की हर याचिका की सुनवाई सीधे सुप्रीम कोर्ट में होने लगी तो यह गलत संदेश जाएगा कि उच्च न्यायालय बेकार हो चुके हैं। यह मामला धार्मिक सौहार्द, ऐतिहासिक विरासत और न्यायिक प्रक्रिया के बीच एक नाजुक संतुलन को दर्शाता है। आइए विस्तार से जानते हैं इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि, कानूनी पहलुओं और इसके निहितार्थों के बारे में।

कर्नाटक हाई कोर्ट का आदेश

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सिद्ध रामैया हीरेमठ की याचिका पर विचार करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। अदालत ने पिछले वर्ष के अपने आदेश की निरंतरता में इस वर्ष भी इसी प्रकार की अनुमति प्रदान की है।

  • न्यायालय के आदेश के अनुसार, 15 फरवरी 2026 को महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर सीमित संख्या में हिंदू श्रद्धालुओं को दरगाह परिसर में प्रवेश करने और राघव चैतन्य शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने की अनुमति होगी।

  • यह पूजा पूरी तरह से नियंत्रित और सुरक्षित वातावरण में संपन्न होगी। केवल 15 श्रद्धालुओं को ही परिसर में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी, जिससे भीड़ नियंत्रण और शांति बनाए रखना संभव हो सके।

  • अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया है कि पूजा के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बनी रहे। स्थानीय प्रशासन को सख्त सुरक्षा व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं।

  • पिछले वर्ष फरवरी 2025 में भी इसी प्रकार का आदेश पारित किया गया था और उस समय भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच बिना किसी अप्रिय घटना के पूजा संपन्न हुई थी।

Mahashivratri: सुप्रीम कोर्ट ने दरगाह कमेटी की याचिका खारिज की

हाई कोर्ट के फैसले से पहले बुधवार दरगाह कमेटी ने सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। कमेटी ने हिंदू संगठनों को पूजा करने की अनुमति न देने की अपील की थी।

  • दरगाह कमेटी की याचिका में कहा गया था कि वहां जो हो रहा है वह अदालत से अंतरिम आदेश लेकर किसी धार्मिक स्थल का चरित्र बदलने का एक समन्वित प्रयास (coordinated pattern) है।

  • हालांकि, चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि हर याचिका की सुनवाई सीधे शीर्ष अदालत में होने लग जाए तो यह गलत संदेश जाएगा कि उच्च न्यायालय बेकार या अप्रासंगिक हो चुके हैं। यह टिप्पणी न्यायिक पदानुक्रम और उच्च न्यायालयों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है।

विवाद का ऐतिहासिक संदर्भ

यह विवाद केवल वर्तमान का नहीं बल्कि सदियों पुरानी साझी विरासत से जुड़ा है। यह स्थल 14वीं सदी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी (जिन्हें लाडले मशाइक के नाम से भी जाना जाता है) और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य दोनों से संबंधित है।

  • दोनों संतों के अवशेष इसी पवित्र स्थल पर विराजमान हैं। यह भारत की सांझी संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता की एक अनूठी मिसाल है।

  • राघव चैतन्य शिवलिंग नामक एक धार्मिक संरचना भी इसी परिसर में स्थित है। यह संरचना हिंदू आस्था का प्रतीक है।

  • ऐतिहासिक रूप से, मुसलमान और हिंदू दोनों ही समुदायों के लोग इस स्थल पर आकर पूजा-अर्चना करते थे। यह सांप्रदायिक सद्भाव का एक सुंदर उदाहरण था।

Mahashivratri: 2022 की घटना, तनाव का बिंदु

वर्ष 2022 में इस स्थल पर पूजा के अधिकार को लेकर गंभीर सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो गया। यह घटना विवाद के वर्तमान स्वरूप की प्रत्यक्ष पृष्ठभूमि बनी।

  • कुछ असामाजिक तत्वों ने शिवलिंग पर मल फेंक दिया। यह घटना अत्यंत निंदनीय और धार्मिक भावनाओं को गहरा आघात पहुंचाने वाली थी।

  • इस अपमानजनक कृत्य ने हिंदू समुदाय में व्यापक आक्रोश पैदा किया। स्थानीय स्तर पर तनाव बढ़ गया और सांप्रदायिक संवेदनशीलता चरम पर पहुंच गई। इस घटना के बाद हिंदू पक्ष ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और अपने पूजा के अधिकार की मांग की।

2025 का पहला आदेश

फरवरी 2025 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने पहली बार हिंदू समुदाय के 15 सदस्यों को राघव चैतन्य शिवलिंग पर शिवरात्रि पूजा करने की अनुमति प्रदान की थी।

  • यह आदेश एक ऐतिहासिक मिसाल बना क्योंकि इसने विवादित स्थल पर सीमित और नियंत्रित पूजा की व्यवस्था स्थापित की।

  • पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण रही और बिना किसी अप्रिय घटना के पूजा संपन्न हुई। दोनों समुदायों ने संयम बरता और कानून-व्यवस्था बनी रही। इस सफल अनुभव ने इस वर्ष के आदेश के लिए एक मजबूत आधार प्रदान किया।

Mahashivratri: कानूनी और सामाजिक निहितार्थ

यह मामला कई महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक प्रश्न उठाता है। पूजा का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण – ये सभी पहलू इसमें शामिल हैं। न्यायालय ने धार्मिक अधिकारों और सामाजिक शांति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है। यह मामला यह भी दिखाता है कि कैसे न्यायपालिका संवेदनशील धार्मिक मुद्दों को संभालती है।

निष्कर्ष

कर्नाटक हाई कोर्ट का यह निर्णय महाशिवरात्रि पर हिंदू पक्ष के लिए राहत है। दरगाह परिसर में शिवलिंग की सीमित पूजा की अनुमति धार्मिक अधिकारों को मान्यता देती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दरगाह कमेटी की याचिका खारिज करना उच्च न्यायालयों की भूमिका को मजबूत करता है। यह मामला भारत की साझी विरासत और सांप्रदायिक सद्भाव की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ही समाधान का मार्ग है।

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