Oil War Crisis 2026: मिडिल ईस्ट की आग से जल सकती है दुनिया की अर्थव्यवस्था, 80 फीसदी तक महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल, भारत की जेब पर कितनी भारी पड़ेगी यह मार
मिडिल ईस्ट तनाव से होर्मुज पर खतरा, भारत पर गहरा असर; पेट्रोल-डीजल में भारी उछाल, महंगाई सुनामी
Oil War Crisis 2026: मध्य-पूर्व एशिया यानी मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर खतरे का रूप ले चुका है। ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार यदि यह संघर्ष और गहराया और तेल के कुओं, रिफाइनरियों या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर सीधा प्रहार हुआ तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। विशेषज्ञों का आकलन है कि सबसे विपरीत परिस्थिति में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 80 फीसदी तक की भारी बढ़ोतरी हो सकती है, जो न सिर्फ आम आदमी की जेब पर बोझ डालेगी बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी के गर्त में धकेल सकती है। भारत जैसे विशाल तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।
1970 के दशक की याद दिला रहा है मौजूदा हालात
पचास साल पहले 1970 के दशक में मिडिल ईस्ट में उपजे तेल संकट ने दुनिया की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। तब अरब देशों ने तेल की आपूर्ति में कटौती कर दी थी, जिसके चलते ईंधन की कीमतें कई गुना बढ़ गई थीं और अमेरिका से लेकर यूरोप तक हर जगह भीषण मंदी का दौर आया था। आज की परिस्थितियां भले ही उस दौर से कुछ अलग हैं, लेकिन खतरे की जड़ वही है। ईरान-अमेरिका के बीच चल रही तनातनी, ओमान में हो रही वार्ता में गतिरोध और होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरानी गनबोट्स द्वारा अमेरिकी तेल टैंकरों से टकराव जैसी घटनाएं बता रही हैं कि स्थिति किसी भी वक्त बेकाबू हो सकती है।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार और केंद्रीय बैंक इस संघर्ष को ‘निगरानी लायक जोखिम’ की श्रेणी में रख रहे हैं, न कि ‘तत्काल आर्थिक आपदा’ के रूप में। लेकिन विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि अगर किसी भी पक्ष ने ऊर्जा अवसंरचना को निशाना बनाया तो तस्वीर रातोंरात बदल सकती है।
Oil War Crisis 2026: तेल की कीमतें 80 फीसदी तक बढ़ने की आशंका कितनी वास्तविक
विशेषज्ञों ने मिडिल ईस्ट संकट के तीन संभावित परिदृश्य प्रस्तुत किए हैं। पहले परिदृश्य में तनाव सीमित रहता है और कूटनीतिक प्रयासों से स्थिति काबू में आ जाती है, जिससे तेल बाजार पर न्यूनतम प्रभाव पड़ता है। दूसरे परिदृश्य में सीमित सैन्य कार्रवाई होती है, जिससे कच्चे तेल में 15 से 25 फीसदी तक की बढ़त देखी जा सकती है। लेकिन तीसरा और सबसे भयावह परिदृश्य वह है जिसमें होर्मुज जलसंधि की नाकाबंदी या ईरान के खार्ग द्वीप जैसे प्रमुख निर्यात केंद्र पर हमला होता है। ऐसी स्थिति में ब्रेंट क्रूड की कीमत 105 से 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है, जो मौजूदा स्तर से लगभग 70 से 80 फीसदी अधिक होगी।
ध्यान रहे कि होर्मुज जलसंधि से दुनिया का लगभग 20 फीसदी तेल गुजरता है। अगर यह रास्ता बाधित हुआ तो सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि एलएनजी, रसायन और उर्वरकों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला भी बुरी तरह प्रभावित होगी।
भारत पर पड़ेगा सबसे गहरा असर, जानिए कैसे
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 फीसदी हिस्सा आयात करता है और इसका लगभग 40 फीसदी हिस्सा होर्मुज जलसंधि के रास्ते ही आता है। इसके अलावा भारत का 50 फीसदी से अधिक एलएनजी आयात भी इसी मार्ग से होता है, जो बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण और घरेलू ईंधन के लिए जरूरी है। ऐसे में अगर होर्मुज बंद हुआ तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा संकट आ जाएगा।
फिलहाल दिल्ली में पेट्रोल की कीमत करीब 94.72 रुपये और डीजल 87.62 रुपये प्रति लीटर है। मुंबई में पेट्रोल 104 रुपये के पार है। अगर कच्चा तेल 105 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर गया तो सरकार को या तो उत्पाद शुल्क में कटौती करनी होगी या फिर तेल विपणन कंपनियों को खुदरा कीमतें बढ़ानी पड़ेंगी। दोनों ही स्थितियों में आम नागरिक और सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ेगा।
Oil War Crisis 2026: महंगाई का सुनामी ला सकता है तेल का बढ़ता दाम
तेल की कीमतें सिर्फ गाड़ियों में ईंधन भरने तक सीमित नहीं होतीं। परिवहन लागत बढ़ने से सब्जियों, फलों, अनाज और दूध जैसी रोजमर्रा की चीजों की कीमतें भी ऊपर जाती हैं। फैक्ट्रियों में उत्पादन खर्च बढ़ता है, जो अंततः उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत में झलकता है। केंद्रीय बैंकों को बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ती हैं, जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।
भारतीय रिजर्व बैंक पहले से ही मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने के लिए सतर्क रहा है। अगर कच्चे तेल में तेज उछाल आती है तो आरबीआई के लिए ब्याज दरों में कटौती का रास्ता और संकरा हो जाएगा, जिसका सीधा असर गृह ऋण, वाहन ऋण और कारोबारी कर्ज लेने वालों पर पड़ेगा।
क्या भारत के पास कोई बचाव का रास्ता है?
इस गंभीर चुनौती के बावजूद भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने पहले ही स्पष्ट किया है कि भारत की तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा अब होर्मुज के बाहर के मार्गों से भी आता है और तेल विपणन कंपनियों के पास कई हफ्तों का पर्याप्त भंडार मौजूद है। इसके अलावा भारत ने अपने सामरिक पेट्रोलियम भंडार यानी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व को भी बढ़ाया है ताकि आपात स्थिति में तेल की कमी न हो।
सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि यदि कच्चा तेल 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाता है तो उत्पाद शुल्क में समायोजन सहित अन्य आर्थिक उपाय अपनाए जा सकते हैं। पूर्ण नाकाबंदी की स्थिति में भारत पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात को रोककर घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों से तेल मंगाने के लिए तैयार है।
Oil War Crisis 2026: अमेरिका-ईरान वार्ता पर टिकी दुनिया की उम्मीदें
फिलहाल सबसे बड़ी उम्मीद कूटनीतिक मोर्चे से जुड़ी है। अमेरिका और ईरान के बीच ओमान में हुई बातचीत से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला और वार्ता के तुरंत बाद अमेरिका ने ईरान पर नए तेल प्रतिबंधों की घोषणा कर दी, जिसने तनाव को और बढ़ा दिया। हालांकि दोनों पक्षों के बीच संवाद का रास्ता अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार शांतिपूर्ण समाधान के लिए दबाव बना रहा है।
ओपेक प्लस देशों के पास अभी करीब 50 लाख बैरल प्रतिदिन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता मौजूद है, जो किसी आपात स्थिति में बफर का काम कर सकती है। लेकिन अगर संकट लंबा खिंचा तो यह बफर भी अपर्याप्त साबित हो सकता है।
कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट का यह तेल संकट एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा है जो दुनिया के हर देश, हर परिवार और हर व्यक्ति की जेब से सीधे जुड़ा हुआ है। अभी यह एक संभावित खतरा है, लेकिन अगर हालात और बिगड़े तो 1970 के दशक जैसा वैश्विक ऊर्जा संकट दोबारा दस्तक दे सकता है।
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