Nana Patekar Real Name: नाना पाटेकर का असली नाम क्या है? जानें विश्वनाथ से नाना बनने की कहानी

जन्म नाम विश्वनाथ पाटेकर था, जानें परिवार के किस्से से पड़ा ‘नाना’ नाम और संघर्ष की कहानी

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Nana Patekar Real Name: हिंदी और मराठी सिनेमा के शिखर पुरुष नाना पाटेकर ने अपनी दमदार आवाज, असाधारण अभिनय और बेबाक संवाद अदायगी से भारतीय फिल्म जगत में अपनी एक अलग ही सल्तनत कायम की। चार दशकों से अधिक समय तक दर्शकों को अपनी अदाकारी से सम्मोहित करने वाले नाना पाटेकर को पूरी दुनिया इसी नाम से जानती है, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि यह उनका असली नाम नहीं है। अभिनेता का जन्म नाम वास्तव में विश्वनाथ पाटेकर था। एक साधारण परिवार के बालक विश्वनाथ से लेकर भारतीय सिनेमा के दिग्गज ‘नाना’ बनने का सफर जितना रोचक है, उतना ही उनके जीवन के संघर्षों और स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है।

Nana Patekar Real Name: विश्वनाथ से कैसे पड़ा ‘नाना’ नाम

नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। जन्म के समय उनका नाम विश्वनाथ पाटेकर रखा गया था। घर-परिवार और प्राथमिक स्कूल तक वे इसी नाम से जाने जाते थे। बचपन में जब वे बहुत छोटे थे, तब उनकी मां की एक बेहद करीबी सहेली उन्हें लाड़-प्यार से ‘नाना’ कहकर पुकारने लगीं।
नाना ने खुद एक पुराने साक्षात्कार में इस किस्से का जिक्र करते हुए बताया था कि उन्हें यह उपनाम इतना सहज, छोटा और अपना सा लगा कि धीरे-धीरे परिवार के बाकी लोग और करीबी दोस्त भी उन्हें ‘नाना’ ही बुलाने लगे। समय के साथ यह नाम उनकी ऐसी स्थायी पहचान बन गया कि आगे चलकर उनके आधिकारिक दस्तावेजों में भी नाना पाटेकर ही दर्ज हो गया। अभिनेता ने मुस्कुराते हुए याद किया था कि जब कभी कोई उन्हें बहुत वर्षों बाद ‘विश्वनाथ’ कहकर पुकारता, तो उन्हें सीधे अपने बचपन और स्कूल के शुरुआती दिनों की याद आ जाती थी।

पोस्टर पेंटिंग से चूल्हा जलाने तक: संघर्षों की भट्टी में तपा बचपन

पर्दे पर नाना पाटेकर के किरदारों में जो कड़वी सच्चाई, आंखों में आक्रोश और यथार्थवाद झलकता था, वह दरअसल उनके अपने वास्तविक जीवन के संघर्षों की देन था। कम उम्र में ही परिवार पर गहरा आर्थिक संकट आ पड़ा था, जिसके चलते उन्हें बहुत छोटी आयु में ही काम की तलाश में निकलना पड़ा।
मुंबई की सड़कों पर गुजारे के लिए उन्होंने फिल्मों के बड़े-बड़े पोस्टर और बैनर पेंट करने का काम किया। उस दौर में उन्हें बेहद मामूली मजदूरी मिलती थी, जिससे वे किसी तरह दिन का एक वक्त का खाना जुटा पाते थे। चिलचिलाती धूप में सड़कों पर काम करने के इसी दौर ने उनके भीतर जीवन के प्रति एक गहरा नजरिया, मेहनत की आदत और बेबाक स्वाभिमान भर दिया, जो बाद में उनके अभिनय की सबसे बड़ी पूंजी बना।

थिएटर की तालीम और ‘गमन’ से रूपहले पर्दे पर पहला कदम

कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बीच भी नाना का झुकाव कला और रंगमंच की ओर लगातार बढ़ता गया। उन्होंने मराठी थिएटर में काम करना शुरू किया, जहां उनके स्वाभाविक अभिनय और संवाद अदायगी ने निर्देशकों का ध्यान खींचा। थिएटर के कड़े अनुशासन ने उनकी अभिनय कला को पूरी तरह तराश दिया।
वर्ष 1978 में मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ से उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा। हालांकि इस फिल्म में उनका रोल छोटा था, लेकिन उनकी सहज मौजूदगी ने जान फूंक दी थी। इसके बाद ‘अंकुश’ और ‘प्रतिघात’ जैसी फिल्मों में उनके तेवर ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि बॉलीवुड में एक ऐसा अभिनेता आ चुका है जो तयशुदा पारंपरिक हीरो की परिभाषा में बंधने वाला नहीं है।

‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’ और राष्ट्रीय पुरस्कारों की ऐतिहासिक श्रृंखला

विधु विनोद चोपड़ा की 1989 की क्लासिक फिल्म ‘परिंदा’ में अंडरवर्ल्ड डॉन अन्ना सेठ का किरदार निभाकर नाना पाटेकर ने इतिहास रच दिया। इस खौफनाक और जटिल किरदार के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद 1994 में आई ‘क्रांतिवीर’ में प्रताप नारायण तिलक के रूप में उन्होंने भ्रष्ट व्यवस्था और समाज को जिस तरह झकझोरा, उसने पूरे देश में तहलका मचा दिया।
‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’, ‘यशवंत’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्मों में उन्होंने यह साबित किया कि जब वे स्क्रीन पर संवाद बोलते हैं, तो सिनेमाघरों में सन्नाटा खिंच जाता है।

Nana Patekar Real Name: नाम छोटा पर विरासत अमर

गंभीर, उग्र और संजीदा भूमिकाओं में लोहा मनवाने के बाद नाना पाटेकर ने अनीस बज्मी की कॉमेडी फिल्म ‘वेलकम’ में डॉन उदय शेट्टी का ऐसा किरदार गढ़ा, जिसने हर उम्र के दर्शकों को लोटपोट कर दिया। उनके अनूठे अंदाज और टाइमिंग ने साबित कर दिया कि एक महान अभिनेता किसी एक जॉनर का बंधक नहीं होता।
विश्वनाथ पाटेकर से ‘नाना’ बनने का यह सफर दर्शाता है कि इंसान अपने नाम से नहीं, बल्कि अपने समर्पण, मेहनत और कला के दम पर इतिहास रचता है। आज नाना पाटेकर का नाम भारतीय सिनेमा के उन गिने-चुने सितारों में शुमार है, जिनकी जगह कोई दूसरा कलाकार कभी नहीं ले सकता।

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