Mahashivratri Special: भगवान शिव के गले में कौन सा सांप है? जानें नागराज वासुकी की पौराणिक कथा और महादेव के अद्भुत स्वरूप का रहस्य
समुद्र मंथन में रस्सी बने, विष पीने के बाद शिव ने गले लगाया; विजया एकादशी से जुड़ा रहस्य
Mahashivratri Special: भगवान शिव का स्वरूप त्रिलोक में सबसे अनोखा और रहस्यमय है। जहां अन्य देवताओं के शरीर पर स्वर्ण आभूषण, हीरे जवाहरात और कीमती अलंकरण सुशोभित रहते हैं वहीं महादेव का रूप बिल्कुल भिन्न है। भोलेनाथ के तन पर चिता की भस्म लगी रहती है, गले में एक सर्प लिपटा रहता है, मस्तक पर तीसरा नेत्र विराजमान है, हाथों में त्रिशूल और डमरू सुशोभित हैं और वाहन के रूप में नंदी बैल उनके साथ रहता है।
शिवजी के इस अद्भुत और विचित्र स्वरूप के पीछे गहरे आध्यात्मिक और पौराणिक कारण छिपे हुए हैं। भगवान शिव को भोलेनाथ कहा जाता है क्योंकि उन्हें प्रसन्न करने के लिए छप्पन भोग या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती। महादेव तो केवल एक लोटा स्वच्छ जल और कुछ बेलपत्र अर्पित करने मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। 15 फरवरी 2026 को देशभर में महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाएगा। इस महाशिवरात्रि विशेष लेख में हम जानेंगे कि आखिर भगवान शिव ने एक नाग सर्प को अपने गले का हार क्यों बनाया। साथ ही यह भी समझेंगे कि शिवजी के गले में लिपटे इस पवित्र सांप का क्या नाम है और उनकी क्या महिमा है। आइए विस्तार से जानते हैं इस पौराणिक रहस्य को।
नागराज वासुकी “शिव के गले का दिव्य आभूषण”
भगवान शिव के कंठ में जो सर्प सदैव लिपटा रहता है उसका नाम नागराज वासुकी है। वासुकी को समस्त नागों का देवता और राजा माना जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार नागराज वासुकी को भगवान विष्णु के शेषनाग का छोटा भाई कहा गया है। नागों के देवता माने जाने वाले नागराज वासुकी भगवान शिव के परम भक्त और अनन्य सेवक थे। उन्होंने महादेव की आराधना और सेवा में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था। वासुकी की भक्ति इतनी गहन और निष्कपट थी कि शिवजी उनसे अत्यंत प्रसन्न हुए।
नागराज वासुकी को शिवजी के सबसे प्रिय भक्त और सेवक के रूप में जाना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में वासुकी का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। विशेष रूप से समुद्र मंथन की कथा में नागराज वासुकी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय है। वासुकी ना केवल एक शक्तिशाली नाग हैं बल्कि वे परम तपस्वी और भगवान शिव के अनन्य उपासक भी हैं। उनकी तपस्या और भक्ति की गाथाएं पुराणों में विस्तार से वर्णित हैं।
Mahashivratri Special: समुद्र मंथन और वासुकी की भूमिका
समुद्र मंथन या क्षीरसागर मंथन की पौराणिक कथा हिंदू धर्म की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक है। इस महान घटना में नागराज वासुकी ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। देवताओं और असुरों के बीच हुए इस महामंथन में नागराज वासुकी को रस्सी के रूप में उपयोग किया गया था। मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और नागराज वासुकी को उस पर्वत के चारों ओर लपेटा गया। एक ओर से देवताओं ने और दूसरी ओर से असुरों ने वासुकी को पकड़ रखा था। इस प्रकार समुद्र मंथन की प्रक्रिया संपन्न हुई।
इस मंथन से चौदह रत्न निकले जिनका वितरण देवताओं और असुरों के बीच किया गया। इनमें अमृत, लक्ष्मी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष और अन्य अनमोल वस्तुएं शामिल थीं। लेकिन सबसे पहले समुद्र से भयंकर हलाहल विष निकला जो इतना घातक था कि संपूर्ण सृष्टि को नष्ट कर सकता था। इस विष की भयानकता से त्रिलोक में हाहाकार मच गया।
शिवजी का विष पान और वासुकी को गले लगाना
जब समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष से पूरी सृष्टि के विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया तब सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे। संसार और प्राणियों को बचाने के लिए भोलेनाथ ने उस घातक विष को स्वयं पी लिया। माता पार्वती ने तुरंत शिवजी के कंठ को अपने हाथों से दबा दिया जिससे विष नीचे न उतर सके। इस कारण वह विष शिवजी के कंठ में ही रुक गया और उनका कंठ नीला पड़ गया। तभी से भगवान शिव को नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है।
समुद्र मंथन की इस कठिन प्रक्रिया में नागराज वासुकी बुरी तरह घायल और क्षत विक्षत हो गए थे। देवताओं और असुरों द्वारा दोनों ओर से खींचे जाने के कारण उनके शरीर पर अनगिनत घाव हो गए थे। वासुकी अत्यंत पीड़ा में थे। भगवान शिव ने नागराज वासुकी की इस अपार भक्ति, समर्पण और बलिदान को देखा। वासुकी ने संसार के कल्याण के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना समुद्र मंथन में सहयोग दिया था। महादेव ने वासुकी की इस निष्काम सेवा और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें अपने गले में स्थान दिया। यह शिवजी की ओर से वासुकी को दिया गया सर्वोच्च सम्मान और पुरस्कार था।
Mahashivratri Special: शिव के गले में सर्प का आध्यात्मिक अर्थ
भगवान शिव द्वारा नाग को गले में धारण करने का गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ है। सर्प को मृत्यु और भय का प्रतीक माना जाता है। शिवजी का सर्प को गले में पहनना यह दर्शाता है कि उन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है। वे महाकाल हैं और काल के भी काल हैं। सर्प कुंडलिनी शक्ति का भी प्रतीक है जो मनुष्य के शरीर में सुप्त अवस्था में रहती है।
शिव के गले में वासुकी की उपस्थिति यह संदेश देती है कि शिव ने इस दैवीय शक्ति को जागृत कर लिया है। सांप का जहर भी विष का प्रतीक है और शिव ने विष को अपने कंठ में धारण किया है। यह उनकी असीम शक्ति का प्रमाण है। सर्प का फन भी शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। तीन कुंडली वाला सर्प तीन काल – भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतीक है। शिव त्रिकालदर्शी हैं। सांप का त्वचा बदलना पुनर्जन्म और नवीकरण का संकेत देता है।
महाशिवरात्रि 2026 का शुभ मुहूर्त
इस वर्ष महाशिवरात्रि का पावन पर्व 15 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा। प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का त्यौहार आता है। इस बार फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ 15 फरवरी 2026 को संध्या 5 बजकर 4 मिनट पर होगा। चतुर्दशी तिथि का समापन 16 फरवरी 2026 को संध्या 5 बजकर 34 मिनट पर होगा। इस दिन भक्तगण व्रत रखेंगे और रात्रि जागरण करते हुए शिवलिंग पर जलाभिषेक करेंगे।
अस्वीकरण: यहां प्रस्तुत जानकारी धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
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