मद्रास हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला,- ‘नो कास्ट, नो रिलिजन’ प्रमाणपत्र के लिए पहले औपचारिक रूप से त्यागना होगा धर्म

मदुरै बेंच ने कहा- हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार औपचारिक त्याग का प्रमाण जरूरी, बिना इसके प्रमाणपत्र नहीं

0

Highcourt News: तमिलनाडु की मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति कृष्णन रामासामी की एकल पीठ ने फैसला सुनाया कि ‘नो कास्ट, नो रिलिजन’ प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को पहले हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार औपचारिक रूप से अपना धर्म त्यागना होगा। बिना ऐसे प्रमाण के तहसीलदार या अन्य अधिकारी इस तरह का प्रमाणपत्र जारी नहीं कर सकते। यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में माना रहा है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को स्पष्ट निर्देश दिए कि जब तक वे धर्म त्याग की औपचारिक प्रक्रिया पूरी नहीं करते और इसका प्रमाण नहीं देते, तब तक उनका अनुरोध खारिज रहेगा। हालांकि, कोर्ट ने याचिका पूरी तरह खारिज करते हुए भी याचिकाकर्ता को नई राह दिखाई है। यदि वे त्याग का प्रमाण लेकर नया आवेदन करते हैं तो अधिकारी उस पर विचार कर सकते हैं। यह निर्णय तमिलनाडु समेत देश के कई राज्यों में ऐसे प्रमाणपत्रों को लेकर चल रही बहस को नई दिशा देगा।

Highcourt News: मदुरै बेंच का फैसला और उसकी पृष्ठभूमि

मामला मदुरै बेंच में चेल्लामणिक्कम नामक याचिकाकर्ता की याचिका से जुड़ा था। उनके माता-पिता हिंदू धर्म का पालन करते हैं। याचिकाकर्ता ने तिरुप्पत्तूर तालुक के तहसीलदार से ‘नो कास्ट, नो रिलिजन’ प्रमाणपत्र मांगा था। उन्होंने दावा किया कि वे जातिगत और धार्मिक पहचान से मुक्त जीवन जीना चाहते हैं। तहसीलदार ने 9 जुलाई 2025 को आवेदन खारिज कर दिया। मुख्य आधार था कि ऐसे प्रमाणपत्र जारी करने के लिए कोई सरकारी आदेश (जीओ) नहीं है।

याचिकाकर्ता ने इस आदेश को चुनौती दी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति रामासामी ने याचिकाकर्ता से सीधा सवाल किया- क्या आपने अपना धर्म त्याग दिया है? याचिकाकर्ता का जवाब था- नहीं। उन्होंने कोई लिखित या औपचारिक प्रमाण भी नहीं दिया। इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि बिना धर्म त्याग की औपचारिक प्रक्रिया के प्रमाणपत्र का अनुरोध विचारणीय नहीं है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “जब तक याचिकाकर्ता हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अपना धर्म नहीं त्यागते, तब तक अधिकारियों द्वारा जाति और धर्म का उल्लेख न करने वाला प्रमाणपत्र जारी करना संभव नहीं है।” याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को स्वतंत्रता दी कि वे धर्म त्याग की प्रक्रिया पूरी कर नया आवेदन कर सकते हैं।

Highcourt News: संविधान के अनुच्छेद 25 का विस्तृत विश्लेषण

न्यायालय ने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 25 का गहराई से जिक्र किया। यह अनुच्छेद नागरिकों को विवेक की स्वतंत्रता देता है, जिसमें किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने, प्रचार करने और त्यागने का अधिकार शामिल है। कोर्ट ने जोर दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता केवल अपनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि त्यागने का अधिकार भी इसमें निहित है।

लेकिन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक दस्तावेजों के लिए यह स्वतंत्रता सिर्फ घोषणा तक नहीं रुक सकती। औपचारिक प्रक्रिया का पालन जरूरी है। हिंदू धर्म में धर्म त्याग की स्थापित प्रक्रिया है, जिसमें घोषणा, अनुष्ठान और दस्तावेजी प्रमाण शामिल होते हैं। बिना इनके प्रशासनिक अधिकारी बाध्य नहीं हैं कि वे प्रमाणपत्र जारी करें।

कोर्ट ने कहा कि संविधान सभी धर्मों के प्रति तटस्थ है, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रियाओं में मनमानी नहीं होनी चाहिए। धर्म त्याग की स्पष्टता के बिना ‘नो कास्ट, नो रिलिजन’ प्रमाणपत्र जारी करना संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं होगा।

Highcourt News: याचिकाकर्ता के तर्क और कोर्ट का जवाब

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वे जातिगत भेदभाव और धार्मिक पूर्वाग्रहों से दूर रहना चाहते हैं। इसलिए ऐसे प्रमाणपत्र की जरूरत है जो उनकी पहचान को किसी जाति या धर्म से न जोड़े। उन्होंने कहा कि यह उनका व्यक्तिगत अधिकार है और प्रशासन को इसमें बाधा नहीं डालनी चाहिए।

कोर्ट ने इन तर्कों का सम्मान किया, लेकिन जोर दिया कि अधिकारों का प्रयोग कानूनी प्रक्रिया के साथ होना चाहिए। न्यायमूर्ति रामासामी ने कहा कि केवल मन में त्याग की भावना रखने से काम नहीं चलेगा। हिंदू परंपरा के अनुसार औपचारिक त्याग जरूरी है। बिना प्रमाण के अधिकारी इस तरह के आवेदनों पर विचार नहीं कर सकते, क्योंकि इससे प्रणाली का दुरुपयोग हो सकता है।

कोर्ट ने रेखांकित किया कि भारत में कई लोग जाति और धर्म से ऊपर उठकर जीवन जीना चाहते हैं, लेकिन प्रशासनिक दस्तावेजों के लिए स्पष्टता अनिवार्य है।

Highcourt News: प्रशासनिक और कानूनी निहितार्थ

यह फैसला तमिलनाडु के राजस्व विभाग के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश है। अब तहसीलदारों को ऐसे आवेदनों पर सिर्फ इसलिए खारिज नहीं करना है कि कोई जीओ नहीं है, बल्कि धर्म त्याग का प्रमाण मांगना होगा। यदि प्रमाण मिलता है तो आवेदन पर विचार किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय प्रशासनिक अखंडता बनाए रखेगा। इससे वे लोग रोके जा सकेंगे जो सिर्फ लाभ के लिए बिना असली इरादे के ऐसे प्रमाणपत्र मांगते हैं। साथ ही, यह फैसला अन्य राज्यों के लिए भी मिसाल बन सकता है, जहां इसी तरह के मुद्दे अदालतों में लंबित हैं।

पिछले वर्षों में मद्रास हाई कोर्ट की अन्य पीठों ने ‘नो कास्ट, नो रिलिजन’ प्रमाणपत्र जारी करने के निर्देश दिए थे, लेकिन इस फैसले ने प्रक्रिया को और स्पष्ट किया है। अब त्याग की औपचारिकता को अनिवार्य मान लिया गया है।

Highcourt News: सामाजिक बहस और विशेषज्ञों की राय

इस फैसले पर समाज में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक वर्ग इसे प्रशासनिक स्पष्टता का कदम बता रहा है। वे कहते हैं कि धर्म और जाति से अलग होने का अधिकार तो है, लेकिन उसे कानूनी रूप से दर्ज करना जरूरी है। इससे भ्रम नहीं फैलेगा।

दूसरी ओर, कुछ सामाजिक कार्यकर्ता चिंता जता रहे हैं कि यह फैसला उन युवाओं के लिए बाधा बन सकता है जो जाति-धर्म से परे सोचते हैं। वे मानते हैं कि आधुनिक भारत में व्यक्ति को अपनी पहचान चुनने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

धार्मिक विद्वान कहते हैं कि हिंदू धर्म में त्याग की परंपरा प्राचीन है। इसमें व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म छोड़ सकता है, लेकिन इसे औपचारिक रूप देना चाहिए। इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक व्यवस्था दोनों बनी रहती है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाता है। अनुच्छेद 25 की स्वतंत्रता बरकरार रहेगी, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी मजबूत होंगी।

Highcourt News: याचिकाकर्ता के लिए आगे का रास्ता

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के सपनों को पूरी तरह नहीं तोड़ा है। न्यायमूर्ति रामासामी ने साफ कहा कि यदि याचिकाकर्ता हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार धर्म त्याग का प्रमाण लेकर नया आवेदन करते हैं, तो अधिकारी उस पर विचार करेंगे।

इसका मतलब है कि याचिकाकर्ता अब औपचारिक घोषणा, आवश्यक दस्तावेज और यदि जरूरी हो तो संबंधित अनुष्ठान पूरे कर सकते हैं। उसके बाद तहसीलदार को प्रमाणपत्र जारी करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं रहेगी। यह प्रावधान उन हजारों युवाओं के लिए राहत है जो इसी तरह की पहचान चाहते हैं।

Highcourt News: देश में जाति-धर्म मुक्त प्रमाणपत्रों की बढ़ती मांग

भारत में जाति और धर्म के आधार पर कई सरकारी योजनाएं, आरक्षण और दस्तावेज चलते हैं। लेकिन नई पीढ़ी में कई लोग इनसे ऊपर उठकर ‘केवल भारतीय’ की पहचान चाहते हैं। स्कूल दाखिले, नौकरियां, विवाह और अन्य क्षेत्रों में ऐसे प्रमाणपत्र की मांग बढ़ रही है।

तमिलनाडु जैसे राज्यों में जहां द्रविड़ आंदोलन की परंपरा है, वहां जाति विरोधी सोच मजबूत है। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था अभी भी पुरानी ढांचे पर टिकी है। इस फैसले ने इस द्वंद्व को उजागर किया है।

निष्कर्ष: स्वतंत्रता और प्रक्रिया का संतुलन

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की परिपक्वता को दर्शाता है। कोर्ट ने न तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया और न ही प्रशासनिक प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया। बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाया।

यह निर्णय याद दिलाता है कि संविधान अधिकार देता है, लेकिन उनके प्रयोग के लिए जिम्मेदारी भी सौंपता है। धर्म त्याग एक गंभीर और व्यक्तिगत निर्णय है। इसे औपचारिक रूप देने से न केवल व्यक्ति का अधिकार सुरक्षित रहेगा, बल्कि व्यवस्था भी मजबूत होगी।

देश भर के युवा अब इस फैसले को ध्यान में रखकर आगे बढ़ सकते हैं। यदि वे सच में जाति-धर्म मुक्त जीवन चाहते हैं, तो कानूनी प्रक्रिया का पालन कर अपना लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। यह फैसला न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे भारत के लिए एक नया मील का पत्थर साबित हो सकता है, जहां व्यक्ति अपनी पहचान खुद चुन सके, लेकिन कानून की चौहद्दी में रहते हुए।

read more here

EPFO का ‘सिंगल पूल’ प्लान,- PF सदस्यों पर बड़ा असर, ETF निवेश में आएगा बड़ा बदलाव

मथुरा-वृंदावन की अनोखी होली,- फूलों और लड्डुओं से रंगीन मस्ती, एक-दूसरे पर बरसते हैं मीठे लड्डू

HRA नियमों में बड़ा बदलाव,- किराएदार को अब मकान मालिक से रिश्ता बताना होगा, फर्जी क्लेम पर लगेगी रोक

SIP से रिटायरमेंट के लिए 1 करोड़ कैसे तैयार करें, उम्र के हिसाब से जानें मासिक निवेश की रणनीति

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.