Lancet Report: भारत में 10 हजार लोगों पर सिर्फ 10.5 डॉक्टर, चीन से कई गुना पीछे स्वास्थ्य व्यवस्था

Lancet रिपोर्ट में खुलासा, भारत में डॉक्टर-नर्सों की भारी कमी, चीन से बड़ा अंतर

0

Lancet Report: भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक कड़वी हकीकत एक बार फिर सामने आ गई है। प्रसिद्ध चिकित्सा पत्रिका ‘द लांसेट Public Health’ में छपी ताजा रिपोर्ट ने देश के हेल्थकेयर सिस्टम की कमजोरियों को पूरी तरह उजागर कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रति 10,000 की आबादी पर महज 10.5 डॉक्टर और 10.8 नर्सें उपलब्ध हैं। यानी दस हजार लोगों की जान और इलाज की जिम्मेदारी सिर्फ दस डॉक्टरों के कंधों पर टिकी हुई है। यह आंकड़ा न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि चीन जैसे पड़ोसी देश से तुलना करने पर और भी गंभीर नजर आता है। चीन में प्रति 10,000 लोगों पर डॉक्टरों और नर्सों की संख्या भारत से तीन से चार गुना ज्यादा है।

यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन के इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया है। रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में मध्यम स्तर की यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज हासिल करने के लिए कम से कम 3.44 करोड़ अतिरिक्त स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत है। इनमें डॉक्टर, नर्स, दाई, डेंटिस्ट और फार्मासिस्ट शामिल हैं। सबसे ज्यादा कमी दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका के देशों में पाई गई है, जहां भारत भी शामिल है।

Lancet Report: भारत के स्वास्थ्य आंकड़े क्या कहते हैं

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 10,000 लोगों पर कुल 73 स्वास्थ्यकर्मी हैं। पहली नजर में यह आंकड़ा संतोषजनक लग सकता है, लेकिन गहराई से देखने पर तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। प्रति 10,000 आबादी पर डॉक्टरों की संख्या 10.5 है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार यह आंकड़ा लगभग सही लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर डॉक्टर बड़े शहरों और निजी अस्पतालों में केंद्रित हैं। गांवों और छोटे कस्बों के सरकारी अस्पताल आज भी डॉक्टरों की भारी कमी से जूझ रहे हैं।

नर्सों की स्थिति और भी चिंताजनक है। प्रति 10,000 लोगों पर सिर्फ 10.8 नर्सें उपलब्ध हैं। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार एक डॉक्टर पर कम से कम तीन नर्सें होनी चाहिए, लेकिन भारत में डॉक्टर और नर्सों की संख्या लगभग बराबर है। इसका सीधा मतलब है कि अस्पतालों, खासकर आईसीयू और वार्ड में मरीजों की देखभाल का बोझ नर्सों पर तीन गुना ज्यादा पड़ रहा है। पैरामेडिकल स्टाफ की संख्या प्रति 10,000 पर 8.1 है, जबकि दाइयों की संख्या महज 1.2 है। मां और नवजात की सुरक्षा में दाइयों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी प्रसव के समय जोखिम बना रहता है।

ये आंकड़े साफ बताते हैं कि भारत का स्वास्थ्य ढांचा सिर्फ संख्या की कमी से नहीं, बल्कि वितरण की असमानता से भी जूझ रहा है। शहरों में बड़े-बड़े निजी अस्पताल खुल गए हैं, लेकिन देश का आम और गरीब वर्ग अभी भी बुनियादी इलाज के लिए सरकारी व्यवस्था पर निर्भर है, जो दबाव में है।

चीन से तुलना में भारत कहां खड़ा है

जब इन आंकड़ों की तुलना चीन से की जाती है तो अंतर और साफ नजर आता है। चीन में प्रति 10,000 की आबादी पर कुल लगभग 130 स्वास्थ्यकर्मी हैं। इनमें डॉक्टरों की संख्या 30 से ज्यादा और नर्सों की संख्या करीब 45 है। यानी डॉक्टर और नर्स दोनों के मामले में चीन भारत से तीन से चार गुना आगे है। पिछले कुछ दशकों में चीन ने अपने मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और नर्सिंग स्टाफ पर भारी निवेश किया। नए मेडिकल कॉलेज खोले, नर्सिंग ट्रेनिंग को बढ़ावा दिया और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य कर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की। भारत उसी रफ्तार से काफी पीछे रह गया है।

यह तुलना सिर्फ आंकड़ों की नहीं है। चीन में आम नागरिक को इलाज के लिए लंबी कतारें कम लगती हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं ज्यादा सुलभ हैं। भारत में इसके उलट सरकारी अस्पतालों में भीड़ इतनी ज्यादा है कि छोटे-मोटे चेकअप के लिए भी घंटों इंतजार करना पड़ता है।

आम जनता पर पड़ रहा सीधा असर

लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टरों और नर्सों की इस भारी कमी का खामियाजा सबसे ज्यादा आम आदमी भुगत रहा है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या बेतहाशा बढ़ने से एक छोटे से ऑपरेशन या जांच के लिए भी महीनों का इंतजार करना पड़ता है। डॉक्टरों पर इतना ज्यादा बोझ है कि वे चाहकर भी हर मरीज को पर्याप्त समय और ध्यान नहीं दे पाते। इससे न सिर्फ इलाज की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि डॉक्टरों का मानसिक तनाव और वर्कलोड भी बढ़ जाता है।

लंबी कतारें और देरी से परेशान होकर कई मरीज निजी अस्पतालों का रुख करने को मजबूर हो जाते हैं। निजी इलाज महंगा होने के कारण परिवार की सालों की बचत एक झटके में खत्म हो जाती है। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और खराब है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर और नर्सों की कमी के कारण लोग छोटी-मोटी बीमारियों के लिए भी दूर के शहरों का रुख करते हैं। इससे न सिर्फ समय और पैसा खर्च होता है, बल्कि गंभीर बीमारियों का समय पर पता भी नहीं चल पाता।

स्वास्थ्य कर्मियों की वैश्विक कमी और भारत की स्थिति

रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर भी स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी बताई गई है। मध्यम स्तर की यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज हासिल करने के लिए दुनिया को 3.44 करोड़ अतिरिक्त स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत है। दक्षिण एशिया और अफ्रीका के देशों में यह कमी सबसे ज्यादा है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में यह समस्या और जटिल हो जाती है क्योंकि यहां शहर और गांव के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं का अंतर बहुत बड़ा है।

भारत में मेडिकल शिक्षा का विस्तार जरूर हुआ है, लेकिन पास आउट होने वाले डॉक्टरों और नर्सों का एक बड़ा हिस्सा या तो शहरों में निजी प्रैक्टिस चुनता है या विदेश चला जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन और सुविधाएं नहीं होने से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खाली पड़े रहते हैं।

समाधान के रास्ते क्या हो सकते हैं

लांसेट की रिपोर्ट सिर्फ समस्या नहीं बताती, बल्कि समाधान की दिशा भी इशारा करती है। अगर देश को हर नागरिक तक बेहतर इलाज पहुंचाना है तो कागजी दावों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले मेडिकल और नर्सिंग सीटों को तेजी से बढ़ाना होगा। नए मेडिकल कॉलेज और नर्सिंग स्कूल खोलने के साथ-साथ मौजूदा संस्थानों की क्षमता भी बढ़ानी होगी। पास आउट होने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को तुरंत सरकारी अस्पतालों में तैनात करने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम ग्रामीण क्षेत्रों में मेडिकल स्टाफ की तैनाती सुनिश्चित करना है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की नियमित उपस्थिति बिना किसी समझौते के होनी चाहिए। इसके लिए ग्रामीण पोस्टिंग को आकर्षक बनाने वाले प्रोत्साहन पैकेज दिए जा सकते हैं।

तीसरा और सबसे जरूरी कदम स्वास्थ्य बजट में बड़ी बढ़ोतरी करना है। जब तक भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का पर्याप्त हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च नहीं करेगा, तब तक पर्याप्त संख्या में डॉक्टर, नर्स और दाई तैयार करना मुश्किल रहेगा। स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने से न सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा, बल्कि ट्रेनिंग और रिसर्च को भी बढ़ावा मिलेगा।

Lancet Report: भविष्य की चुनौतियां और जरूरत

भारत की आबादी लगातार बढ़ रही है और बुजुर्गों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। गैर-संचारी रोग जैसे डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर के मामले भी बढ़ रहे हैं। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य कर्मियों की कमी और गंभीर रूप ले सकती है। अगर अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव और बढ़ेगा।

लांसेट की यह रिपोर्ट एक चेतावनी की तरह है। जब तक डॉक्टरों और नर्सों की भारी किल्लत दूर नहीं की जाती, तब तक ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ का लक्ष्य सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगा। सरकार, मेडिकल संस्थानों और नीति निर्माताओं को मिलकर काम करना होगा ताकि आम आदमी को सही समय पर और सस्ता इलाज मिल सके। स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाना सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन और गरिमा से जुड़ा मुद्दा है।

Read More Here

Moto G Max vs Redmi Note 17: ₹27,999 के बजट में कैमरा, परफॉर्मेंस, डिस्प्ले और 8000mAh बैटरी के मामले में कौन सा 5G फोन बेहतर?

Ludhiana Firing: BRS Nagar के पिज्जा आउटलेट पर 3 सेकंड में चलीं 3 गोलियां, CCTV में कैद वारदात; कथित गैंग ने ली जिम्मेदारी

Maoist Leader Azad: माओवादी नेता आजाद सभी 49 मामलों में बरी, 15 साल से अधिक विचाराधीन कैदी रहने के बाद जेल से हुए रिहा

Anupamaa 19 August 2026: वसुंधरा ने अनुपमा के सामने रखी बड़ी डील, क्या बेटी राही के लिए ट्रॉफी और अपने सपनों के घर का सौदा करेगी?

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.