लालू प्रसाद की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टली, CBI ने कहा गैरकानूनी है हाईकोर्ट का आदेश, 22 अप्रैल को होगी अगली सुनवाई

झारखंड HC का आदेश गैरकानूनी, लालू की जमानत रद्द करने की मांग; कोर्ट ने उम्र और मौतों का जिक्र कर टाला फैसला

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Lalu Prasad Yadav: बिहार की राजनीति को दशकों से हिलाकर रखने वाला चारा घोटाला एक बार फिर सुर्खियों में है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की जमानत के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। देवघर जिला कोषागार से जुड़े इस मामले में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई 22 अप्रैल तक टाल दी है। पीठ ने कहा कि अभी दोनों पक्षों की दलीलें पूरी नहीं हुई हैं और इस मामले से जुड़े कुछ आरोपियों का निधन भी हो चुका है। यह फैसला बिहार की राजनीति और लालू यादव के भविष्य के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि अगर सुप्रीम कोर्ट जमानत रद्द करता है तो उन्हें फिर से जेल जाना पड़ सकता है।

Lalu Prasad Yadav: कोर्ट में क्या-क्या हुआ, दोनों पक्षों ने क्या कहा?

मंगलवार की सुनवाई में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं। सीबीआई की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने जोरदार दलील देते हुए कहा कि झारखंड हाईकोर्ट ने एक पूरी तरह गैरकानूनी आदेश पारित किया है। उन्होंने तर्क दिया कि कानून के प्रावधानों का सही तरीके से पालन किए बिना सजा को निलंबित कर दिया गया, जो न्यायिक प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लंघन है। सीबीआई का मुख्य तर्क यह है कि लालू यादव जैसे गंभीर आर्थिक अपराध में दोषसिद्ध व्यक्ति को इतनी आसानी से जमानत नहीं मिलनी चाहिए थी।

दूसरी ओर लालू प्रसाद यादव की तरफ से देश के जाने-माने वकील कपिल सिब्बल पेश हुए। सिब्बल ने कहा कि इस मामले में कुछ आरोपियों को अब तक नोटिस ही नहीं दिया गया है, इसलिए सुनवाई आगे बढ़ाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद एक बेहद अहम टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि हम दोनों ही जानते हैं कि यह कैसी विशेष अनुमति याचिका है और इसका परिणाम क्या होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले से जुड़े लोग अब 60, 70 और 80 वर्ष की उम्र के हैं। इस टिप्पणी को कानूनी विशेषज्ञ लालू यादव के पक्ष में एक संकेत मान रहे हैं।

देवघर कोषागार घोटाला क्या है, पूरी कहानी समझिए

इस मामले की जड़ें 1990 के दशक में हैं जब बिहार और झारखंड एक ही राज्य हुआ करते थे। जनवरी 1996 में चारा घोटाले का पर्दाफाश हुआ जब बिहार सरकार के पशुपालन विभाग में करोड़ों रुपये की भारी हेराफेरी सामने आई। उस दौरान लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे और पशुपालन विभाग का कामकाज भी देख रहे थे। देवघर जिला कोषागार से करीब 89 लाख रुपये की अवैध निकासी का यह मामला उनके खिलाफ दर्ज कई मामलों में से एक है।

जांच में पाया गया कि ट्रेजरी से फर्जी बिलों के जरिए पैसा निकाला गया और लालू यादव को इस गबन की पूरी जानकारी थी। चार्जशीट में नाम आने के बाद लालू यादव ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और उनकी पत्नी राबड़ी देवी जुलाई 1997 में बिहार की मुख्यमंत्री बनीं। साल 2000 में बिहार और झारखंड अलग राज्य बने और यह मामला झारखंड हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में चला गया।

Lalu Prasad Yadav: कितने मामलों में दोषी हैं लालू?

लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले के एक नहीं बल्कि कुल पांच मामलों में दोषसिद्ध हैं। देवघर कोषागार मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए साढ़े तीन साल जेल की सजा सुनाई। चाईबासा ट्रेजरी से अवैध निकासी के दो अलग-अलग मामलों में भी उन्हें सजा मिली। दुमका ट्रेजरी से गबन के मामले में भी अदालत ने उन्हें दोषी पाया।

इसके अलावा डोरंडा कोषागार से 139 करोड़ रुपये से अधिक के गबन के मामले में रांची की विशेष सीबीआई अदालत ने पांच साल की कड़ी सजा और 60 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। सीबीआई का तर्क है कि देवघर मामले में अधिकतम सात साल तक की सजा का प्रावधान था लेकिन निचली अदालत ने केवल साढ़े तीन साल की सजा दी, इसलिए सजा बढ़ाई जानी चाहिए। इसी के चलते सीबीआई ने झारखंड हाईकोर्ट में सजा बढ़ाने की अपील दायर की थी जिसे पिछले साल जुलाई में स्वीकार कर लिया गया।

झारखंड सरकार ने भी किया लालू की जमानत का विरोध

इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सीबीआई के साथ-साथ झारखंड सरकार ने भी लालू यादव की जमानत का विरोध किया है और इसे रद्द करने की मांग की है। झारखंड हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद को उनकी बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य के आधार पर जमानत दी थी। लालू यादव ने किडनी ट्रांसप्लांट सहित कई गंभीर बीमारियों का हवाला देते हुए जमानत हासिल की थी।

हालांकि सीबीआई का कहना है कि किडनी ट्रांसप्लांट के बाद लालू यादव राजनीतिक रूप से फिर से पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं और जमानत की शर्तों का उल्लंघन हो रहा है। लालू यादव की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया है कि हाईकोर्ट का आदेश सामान्य सिद्धांतों और समान नियमों पर आधारित है और सिर्फ इसलिए कि सीबीआई असंतुष्ट है, उनकी जमानत रद्द नहीं की जा सकती। उनका तर्क है कि बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य समस्याओं को देखते हुए उन्हें जेल में रखने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

Lalu Prasad Yadav: आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई 22 अप्रैल तय की है। तब तक जिन मामलों में आरोपियों का निधन हो चुका है उन्हें बंद किया जाएगा और शेष आरोपियों को नोटिस दिया जाएगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी जिसमें आरोपियों की बढ़ती उम्र का जिक्र किया गया है, यह संकेत देती है कि कोर्ट मानवीय पहलू को भी ध्यान में रख रहा है। 77 वर्षीय लालू प्रसाद यादव राजद के सर्वोच्च नेता हैं और बिहार तथा झारखंड की राजनीति में अभी भी उनका गहरा प्रभाव है। अगर जमानत रद्द होती है तो इसका सीधा असर विपक्षी गठबंधन की रणनीति पर पड़ेगा। वहीं लैंड फॉर जॉब घोटाले में भी लालू और राबड़ी देवी पर दिल्ली कोर्ट में ट्रायल चल रहा है जहां दोनों ने खुद को बेगुनाह बताते हुए ट्रायल का सामना करने की बात कही है। कुल मिलाकर आने वाले कुछ महीने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के लिए कानूनी रूप से बेहद कठिन साबित हो सकते हैं।

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