होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ तो भारत में 40-45 दिन का ही तेल भंडार, पेट्रोल-डीजल संकट कितना गहरा होगा? जानें सबसे खराब स्थिति में क्या होगा
ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध से होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा, भारत के पास 40-45 दिन का वाणिज्यिक तेल भंडार। कीमतें 100 डॉलर पार, महंगाई-आयात बिल बढ़ेगा।
Israel US Strikes in Iran: मध्य पूर्व में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी जंग ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे अहम ऊर्जा मार्ग है और भारत इस पर बहुत अधिक निर्भर है। अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन से जवाबी कार्रवाई की है जिससे इस मार्ग पर तेल टैंकरों की आवाजाही बाधित हुई है। एनर्जी एनालिटिक्स फर्म Kpler के अनुसार भारत के पास इस वक्त वाणिज्यिक कच्चे तेल का लगभग 10 करोड़ बैरल का भंडार है। अगर होर्मुज से आपूर्ति पूरी तरह बंद हो जाए तो यह भंडार केवल 40 से 45 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है।
Israel US Strikes in Iran: भारत की होर्मुज पर कितनी निर्भरता?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 88 प्रतिशत आयात करता है। इसमें से 50 प्रतिशत से अधिक यानी कुछ अनुमानों के मुताबिक 55 प्रतिशत तक तेल मध्य पूर्वी देशों खासकर इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आता है जो होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। Kpler के आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुल कच्चे तेल आयात का औसतन 25 से 27 लाख बैरल प्रतिदिन इसी संकरे मार्ग से आता है। यह मार्ग वैश्विक समुद्री कच्चे तेल निर्यात का लगभग 20 से 21 प्रतिशत और एलएनजी शिपमेंट का 20 प्रतिशत वहन करता है। भारत के लिए यह सिर्फ तेल नहीं बल्कि कतर से आने वाली एलएनजी गैस के लिए भी उतना ही जरूरी है।
रणनीतिक भंडार कहां और कितना
भारत के सामरिक पेट्रोलियम भंडार मुख्य रूप से तीन जगह हैं जिनमें विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश), मैंगलोर और पाडुर (दोनों कर्नाटक) शामिल हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार रिफाइनरी स्टॉक और अन्य भंडार मिलाकर यह 74 दिनों तक की कवरेज दे सकते हैं। लेकिन Kpler जैसी एनालिटिक्स फर्में होर्मुज-विशेष परिदृश्य में केवल 40 से 45 दिनों का अनुमान लगाती हैं क्योंकि वे सिर्फ वाणिज्यिक स्टॉक पर ध्यान देती हैं। इन भंडारों को अस्थायी झटकों के लिए बनाया गया है न कि लंबे समय की पूर्ण बंदी के लिए।
Israel US Strikes in Iran: कीमतों पर क्या असर पड़ रहा है?
ईरान संकट के बाद वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है जो हाल के दिनों में 10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी है। भारत के लिए इसका सीधा असर आयात बिल पर पड़ता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने कच्चे तेल के आयात पर 137 अरब डॉलर खर्च किए थे। चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से जनवरी के बीच ही 100.4 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। कीमतों में और उछाल आया तो आयात बिल और महंगाई दोनों बढ़ेंगे।
भारत के पास क्या विकल्प हैं?
अगर होर्मुज मार्ग बाधित होता है तो भारत कई वैकल्पिक रास्ते अपना सकता है। अरब सागर और एशियाई क्षेत्र में उपलब्ध रूसी कार्गो को तत्काल खरीदा जा सकता है। पश्चिम अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अमेरिका से आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है। घरेलू स्तर पर रिफाइनरियों से पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात को सीमित कर घरेलू बाजार को प्राथमिकता दी जा सकती है। गौरतलब है कि 2024-25 में भारत ने 2 करोड़ 37 लाख टन पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात किए थे जो कुल खपत का करीब 10 प्रतिशत है। हालांकि लंबे मार्गों से आने वाले जहाजों पर माल भाड़ा, बीमा और भू-राजनीतिक प्रीमियम बढ़ेगा जिससे लागत बढ़ेगी।
Israel US Strikes in Iran: सबसे खराब स्थिति में क्या होगा?
अगर होर्मुज लंबे समय तक बंद रहा तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। माल भाड़ा बाजार पर भारी दबाव आएगा। रिफाइनरियों को उत्पादन घटाना पड़ सकता है। महंगाई बढ़ेगी, आयात बिल फूलेगा और रुपया और कमजोर हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कम संभावना लेकिन बहुत ऊंचे प्रभाव वाला जोखिम है। फिलहाल असली खतरा भौतिक कमी से कम और कीमतों की अस्थिरता से ज्यादा है। सरकार और रिफाइनरियां वैकल्पिक आपूर्ति और स्टॉक प्रबंधन पर कड़ी नजर रखे हुए हैं ताकि हालात को काबू में रखा जा सके।
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