मध्य-पूर्व युद्ध से आपकी जेब पर क्या पड़ेगा असर, जानें सूखे मेवे से लेकर तेल तक क्या क्या खरीदता है ईरान से भारत
सूखे मेवे, केसर, सेब, रसायन और होर्मुज से तेल सप्लाई, मिडल-ईस्ट जंग से पेट्रोल-डीजल महंगा, मेवे-केसर की कीमतें बढ़ेंगी, आम आदमी पर महंगाई का बोझ
Israel Iran War: पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच छिड़ी जंग केवल उन देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है। इस युद्ध की आंच हजारों किलोमीटर दूर बैठे भारत के आम आदमी की रसोई और जेब तक पहुंच सकती है। भारत और ईरान के बीच दशकों पुराने व्यापारिक संबंध हैं और ईरान की भौगोलिक स्थिति दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग यानी होर्मुज जलडमरूमध्य के पास है। ऐसे में वहां बढ़ते तनाव का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधे और परोक्ष दोनों तरीकों से पड़ सकता है। आइए समझते हैं कि भारत ईरान से क्या-क्या खरीदता है और इस जंग से आम आदमी की जिंदगी पर क्या फर्क पड़ सकता है।
भारत ईरान से क्या-क्या मंगाता है?
भारत और ईरान के बीच व्यापार कई दशकों से चला आ रहा है। ईरान से भारत में आने वाली चीजों की सूची काफी लंबी है और इनमें से कई चीजें आम भारतीयों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी हैं।
सूखे मेवे और मेवाजात: बादाम, पिस्ता, खजूर, किशमिश और अखरोट बड़ी मात्रा में ईरान से भारत आते हैं। त्योहारों और शादी-ब्याह के सीजन में इनकी मांग और भी ज्यादा होती है। भारत के बाजारों में बिकने वाले पिस्ते और किशमिश का एक बड़ा हिस्सा ईरान से ही आता है। जंग के माहौल में इनकी सप्लाई बाधित होने से दाम बढ़ सकते हैं।
केसर: दुनिया का सबसे बेहतरीन केसर ईरान में उगाया जाता है और भारत इसके सबसे बड़े खरीदारों में से एक है। भारतीय रसोई में बिरयानी से लेकर मिठाइयों तक में इस्तेमाल होने वाला केसर अगर ईरान से आना बंद हुआ तो इसकी कीमत आसमान छू सकती है।
ताजे फल: सेब, कीवी और आलूबुखारा जैसे फल भी ईरान से भारतीय बाजारों में पहुंचते हैं। खासतौर पर उत्तर भारत के बाजारों में ईरानी सेब काफी लोकप्रिय है।
रसायन और उर्वरक: खेती के लिए जरूरी कुछ उर्वरक और रसायन भी ईरान से आयात किए जाते हैं। इनकी सप्लाई बाधित होने से खेती की लागत बढ़ सकती है।
बिटुमेन और खनिज पदार्थ: सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाला डामर यानी बिटुमेन, सल्फर और कुछ अन्य खनिज उत्पाद भी ईरान से मंगाए जाते हैं। इनके महंगे होने से बुनियादी ढांचे के निर्माण की लागत बढ़ सकती है।
Israel Iran War: होर्मुज जलडमरूमध्य और तेल की सप्लाई
भारत के लिए ईरान से प्रत्यक्ष आयात से भी बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा है। यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के कुल कच्चे तेल का करीब 20 प्रतिशत यानी हर रोज 17 से 20 लाख बैरल तेल की आवाजाही के लिए इस्तेमाल होता है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और ईरान का तेल इसी रास्ते से दुनियाभर के देशों तक पहुंचता है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। मध्य-पूर्व के देश यानी इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भारत के सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ता हैं और उनका तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर ही भारत आता है। अगर यह रास्ता किसी कारण से बाधित हुआ तो भारत के लिए तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। रूस से मिलने वाला रियायती तेल एक विकल्प है लेकिन वह भी पूरी जरूरत पूरी करने में सक्षम नहीं होगा।
आम आदमी की जेब पर क्या पड़ेगा असर
इस पूरे संकट का सबसे ज्यादा बोझ आखिर में आम आदमी की जेब पर ही पड़ता है। अगर तेल और अन्य आयात बाधित हुए तो इसके कई तरह के असर दिखेंगे।
पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ना सबसे पहला और सबसे बड़ा असर होगा। जैसे ही कच्चा तेल महंगा होता है उसका सीधा असर ईंधन की कीमतों पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ता है और यह लागत सब्जियों से लेकर रोजमर्रा की हर चीज की कीमत में जुड़ जाती है। यानी खाने-पीने की चीजें, कपड़े, दवाइयां सब कुछ महंगा हो सकता है।
बाजार में पिस्ता, बादाम, केसर और खजूर जैसी चीजें महंगी हो सकती हैं। त्योहारों के सीजन में मिठाइयां और उपहार महंगे हो सकते हैं। खेती में इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों और रसायनों की कीमतें बढ़ने से खेती की लागत बढ़ेगी जिसका असर अनाज और सब्जियों के दाम पर पड़ेगा। कुल मिलाकर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है जो पहले से ही आम आदमी के बजट पर भारी पड़ रहा है।
Israel Iran War: भारत के पास क्या हैं विकल्प?
भारत सरकार इस संकट पर पूरी नजर रखे हुए है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी की आपातकालीन बैठक बुलाई और मध्य-पूर्व के कई देशों के नेताओं से बात की। भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार है जो कुछ दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है। इसके अलावा रूस से रियायती दर पर तेल खरीदने का विकल्प भी है। लेकिन दीर्घकाल में अगर होर्मुज मार्ग बाधित रहा तो इन सभी उपायों की सीमाएं हैं।
फिलहाल सबसे अच्छा परिदृश्य यही है कि मध्य-पूर्व में जल्द से जल्द शांति स्थापित हो और व्यापार सामान्य हो। तब तक भारत के आम आदमी को सावधानी बरतने और अनावश्यक खर्च से बचने की जरूरत होगी।
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