ईरान-अमेरिका जंग में नया मोड़, खाड़ी देश अमेरिका से नाराज, हमले की सूचना नहीं दी गई, इजरायल के साथ मिलकर किए गए ऑपरेशन से गल्फ देशों में असंतोष, जानें पूरा मामला
ईरान पर हमले से पहले खाड़ी देशों को सूचना नहीं दी गई, जवाबी हमलों में UAE, सऊदी, बहरीन, कुवैत को नुकसान। अमेरिका-इजरायल ऑपरेशन से गल्फ में असंतोष, सुरक्षा में अकेला छोड़ा गया
Iran-US Conflict: मध्य पूर्व में जारी ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच तनाव में एक नया और अप्रत्याशित मोड़ आया है। गल्फ यानी खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कुछ सहयोगी देश इस बात से बेहद नाखुश और नाराज हो गए हैं क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप की नेतृत्व वाली अमेरिकी प्रशासन ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने से पहले उन्हें कोई सूचना नहीं दी। यह मामला अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगी खाड़ी देशों के बीच विश्वास की कमी को दर्शाता है। इसके साथ ही खाड़ी देशों की शिकायत है कि उन्हें ईरान की जवाबी कार्रवाई का मुकाबला करने के लिए न तो पर्याप्त समय दिया गया और न ही अमेरिका की तरफ से उचित सैन्य सहायता प्रदान की गई। अमेरिका-इजरायल की तरफ से किए गए हमले के बाद ईरान ने कई खाड़ी देशों में मिसाइल और ड्रोन से जवाबी हमले किए हैं।
इन हमलों से संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत जैसे देशों में तेल प्रतिष्ठानों, सैन्य अड्डों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है। इससे कई खाड़ी देश गहरे असंतोष में हैं। वे महसूस कर रहे हैं कि अमेरिका ने अपने हितों की रक्षा तो की लेकिन अपने पारंपरिक सहयोगियों को खतरे में छोड़ दिया। यह स्थिति मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दे सकती है। खाड़ी देश दशकों से अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगी रहे हैं। वे अमेरिका से हथियार खरीदते हैं। अमेरिकी सेना के अड्डे उनकी भूमि पर स्थित हैं। लेकिन इस बार की घटना ने उनके विश्वास को गहरा झटका दिया है।
ईरान पर शुरुआती हमले से खाड़ी देश नाराज
इस मामले को लेकर दो खाड़ी देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने गोपनीय रूप से जानकारी साझा की है। इन अधिकारियों ने कहा कि उनकी सरकारें इस जंग को लेकर अमेरिका के रवैये और व्यवहार से पूरी तरह निराश हो गई हैं। खासकर ईरान पर किए गए शुरुआती हमले के तरीके और समय को लेकर वे बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हैं। अधिकारियों ने बताया कि उनके देशों को अमेरिका-इजरायल के संयुक्त सैन्य अभियान की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। यह एक गंभीर राजनयिक और सैन्य चूक है। जब दो देश किसी तीसरे देश पर हमला करने की योजना बनाते हैं तो उन्हें अपने सहयोगियों को पहले से सूचित करना चाहिए। खासकर उन सहयोगियों को जो उसी क्षेत्र में स्थित हैं और जिन्हें जवाबी हमले का खतरा हो सकता है। अमेरिका ने यह मूलभूत राजनयिक शिष्टाचार भी नहीं निभाया। खाड़ी देशों का कहना है कि अगर उन्हें पहले से बता दिया जाता तो वे अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत कर सकते थे। अपने महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा बढ़ा सकते थे। नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर भेज सकते थे। वायु रक्षा प्रणालियों को सक्रिय कर सकते थे। लेकिन अचानक हमले के कारण वे पूरी तरह असुरक्षित और अप्रस्तुत रह गए।
Iran-US Conflict: अमेरिका ने खाड़ी देशों की चेतावनी को किया नजरअंदाज
खाड़ी देशों के अधिकारियों ने एक और गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने शिकायत करते हुए कहा कि अमेरिका ने उनकी स्पष्ट चेतावनी को पूरी तरह नजरअंदाज किया। खाड़ी देशों ने अमेरिका को बार-बार चेताया था कि ईरान के खिलाफ कोई भी सैन्य कार्रवाई के परिणाम पूरे खाड़ी क्षेत्र के लिए अत्यंत विनाशकारी और भयावह साबित होंगे। खाड़ी देश ईरान के बहुत करीब हैं। ईरान के पास शक्तिशाली मिसाइल और ड्रोन क्षमता है। अगर ईरान पर हमला किया जाता है तो वह निश्चित रूप से जवाबी कार्रवाई करेगा। और उसका पहला निशाना खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगी देश और अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान होंगे। यह बात बिल्कुल स्पष्ट थी। खाड़ी देशों ने यह बात अमेरिका को समझाने की कोशिश की। उन्होंने राजनयिक चैनलों के माध्यम से अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इन सभी चेतावनियों को अनसुना कर दिया। अमेरिका ने अपनी योजना को आगे बढ़ाया। इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर व्यापक हमले किए। परिणाम वही हुआ जो खाड़ी देशों ने आशंका जताई थी। ईरान ने भारी जवाबी हमले किए और खाड़ी देश उसकी चपेट में आ गए।
खाड़ी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई
एक वरिष्ठ खाड़ी अधिकारी ने बहुत स्पष्ट शब्दों में अपना असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि खाड़ी के देश इस बात से बेहद नाखुश और यहां तक कि गहराई से नाराज भी हैं कि अमेरिकी सशस्त्र बलों ने उनकी पर्याप्त रक्षा नहीं की है। यह एक गंभीर आरोप है। अमेरिका दशकों से खाड़ी देशों को सुरक्षा गारंटी देता आया है। खाड़ी देश अमेरिका से अरबों डॉलर के हथियार खरीदते हैं इसी विश्वास पर कि अमेरिका किसी भी खतरे से उनकी रक्षा करेगा। लेकिन इस बार अमेरिका उस जिम्मेदारी में विफल रहा। अधिकारी ने आगे कहा कि खाड़ी में यह धारणा बन गई है कि पूरा ऑपरेशन केवल इजरायल और अमेरिकी सैन्य अड्डों की रक्षा को ध्यान में रखकर डिजाइन और संचालित किया गया था। अमेरिकी वायु रक्षा प्रणालियों को इजरायल और खाड़ी में स्थित अमेरिकी ठिकानों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया। जबकि खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह अकेला और असहाय छोड़ दिया गया। उन्हें खुद अपने साधनों से ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों का सामना करना पड़ा। यह उनके लिए अपमानजनक और खतरनाक दोनों था। इससे उनके मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या वास्तव में अमेरिका उनकी सुरक्षा की गारंटी दे सकता है या अमेरिका केवल अपने हितों की परवाह करता है।
Iran-US Conflict: ईरान के मिसाइल हमले 90 प्रतिशत कम हुए
इन सभी आरोपों के बीच व्हाइट हाउस की प्रवक्ता एना केली ने अमेरिकी कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने दावा किया कि ईरान के जवाबी बैलिस्टिक मिसाइल हमले 90 प्रतिशत तक कम हो गए हैं। यह कमी इसलिए आई है क्योंकि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नामक अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियान ने ईरान के मिसाइल-ड्रोन लॉन्चरों और अधिक हथियार बनाने की क्षमता को बड़े पैमाने पर नष्ट कर दिया है। केली ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप सभी क्षेत्रीय साझेदारों के निरंतर संपर्क में हैं। ईरानी शासन के अपने पड़ोसी देशों पर हमले साफ तौर पर साबित कर रहे हैं कि इस खतरे को समाप्त करना कितना आवश्यक और जरूरी था। व्हाइट हाउस का तर्क है कि अगर अब ईरान को नहीं रोका गया तो भविष्य में खतरा और भी बड़ा हो जाएगा। इसलिए यह सैन्य कार्रवाई अनिवार्य थी। हालांकि खाड़ी देश इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि भले ही कार्रवाई जरूरी थी लेकिन इसे इस तरह से नहीं किया जाना चाहिए था कि सहयोगी देश खतरे में पड़ जाएं।
खाड़ी देशों की पहचान गोपनीय रखी गई
यह ध्यान देने योग्य है कि खाड़ी देशों के जिन अधिकारियों ने यह जानकारी दी है उन्होंने अपनी और अपने देशों की पहचान गुप्त रखने की शर्त पर यह बातें साझा की हैं। यह इस बात का संकेत है कि खाड़ी देश सार्वजनिक रूप से अमेरिका की खुलेआम आलोचना करने से बच रहे हैं। वे अभी भी राजनयिक शालीनता बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन पर्दे के पीछे उनका असंतोष गहरा है। कुवैत, बहरीन और सऊदी अरब की सरकारों से जब इस मामले पर टिप्पणी मांगी गई तो उन्होंने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी। यह चुप्पी भी बहुत कुछ कहती है। सामान्यतः खाड़ी देश अमेरिका का खुलकर समर्थन करते हैं। लेकिन इस बार उनका मौन उनकी नाराजगी को दर्शाता है।
Iran-US Conflict: मध्य पूर्व की भू-राजनीति में बदलाव की संभावना
यह घटना मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। खाड़ी देश अब यह सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि क्या उन्हें अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहना चाहिए। क्या उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक रणनीतियां विकसित करनी चाहिए। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना खाड़ी देशों को चीन और रूस के करीब ला सकती है।
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