Indian Air Force Modernisation: एपी सिंह बोले- दिशा सही, रफ्तार बढ़ाना जरूरी

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने तेजस एमके-1ए में देरी और कम लड़ाकू स्क्वाड्रन पर जताई चिंता

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Indian Air Force Modernisation: भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने बल के आधुनिकीकरण और भविष्य की युद्धक तैयारियों को लेकर एक स्पष्ट और रणनीतिक संदेश दिया है। वायुसेना की 94वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर उन्होंने कहा कि यद्यपि भारतीय वायुसेना सही दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य और तेजी से बदलती सैन्य तकनीक को देखते हुए क्षमता निर्माण और नए उपकरणों को शामिल करने की गति को काफी तेज करने की आवश्यकता है। नई दिल्ली के सुब्रतो पार्क स्थित वायुसेना सभागार में वायु योद्धाओं और पूर्व कर्मियों को संबोधित करते हुए उन्होंने रक्षा उत्पादन में देरी, लड़ाकू स्क्वाड्रन की घटती संख्या और तकनीकी आत्मनिर्भरता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात की।

Indian Air Force Modernisation: तेजी से बदलती तकनीक और क्षमता विस्तार की अनिवार्यता

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने अपने संबोधन में रेखांकित किया कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि नवाचार और त्वरित अनुकूलन क्षमता पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि हालांकि वायुसेना की समग्र रणनीति सकारात्मक दिशा में है, फिर भी बदलते वैश्विक सुरक्षा समीकरणों के अनुरूप उत्पादन और आपूर्ति की गति में बड़ा सुधार होना चाहिए।
विशेष रूप से महत्वपूर्ण यह है कि एयर चीफ मार्शल एपी सिंह इसी महीने अपनी सेवा से सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं और उनके बाद एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित अगले वायुसेना प्रमुख की कमान संभालेंगे। इस नेतृत्व परिवर्तन के मुहाने पर दिया गया उनका यह भाषण वायुसेना की मौजूदा चुनौतियों और भावी रणनीतिक प्राथमिकताओं का वास्तविक दर्पण माना जा रहा है।

तेजस एमके-1ए की डिलीवरी में देरी पर गहरी चिंता

वायुसेना प्रमुख ने स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान एलसीए तेजस एमके-1ए की आपूर्ति में लगातार हो रहे विलंब को एक प्रमुख चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि वायुसेना इन विमानों के जल्द से जल्द बेड़े में शामिल होने की प्रतीक्षा कर रही है और इस सिलसिले में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ सतत समन्वय बना हुआ है।
वर्ष 2021 में रक्षा मंत्रालय और एचएएल के बीच 83 तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए लगभग 48,000 करोड़ रुपये का ऐतिहासिक सौदा हुआ था। निर्धारित अनुबंध के अनुसार पहला विमान मार्च 2024 तक भारतीय वायुसेना को मिल जाना चाहिए था, लेकिन उत्पादन संबंधी अड़चनों और इंजनों की उपलब्धता में बाधाओं के चलते आपूर्ति में देरी हुई है। एयर चीफ मार्शल ने उम्मीद जताई कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में इस गतिरोध को दूर कर विमानों की उचित संख्या बल को सौंपी जा सकेगी।

42 के मुकाबले 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन: घटती संख्या की भरपाई का रोडमैप

भारतीय वायुसेना के समक्ष सबसे गंभीर संगठनात्मक चुनौती लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या में आ रही कमी है। दो मोर्चों पर संभावित खतरों से निपटने के लिए वायुसेना की आधिकारिक स्वीकृत क्षमता 42 स्क्वाड्रन की है, जबकि वर्तमान में यह घटकर लगभग 29 स्क्वाड्रन के आसपास पहुंच चुकी है। पुराने पड़ चुके मिग-21 और अन्य विमानों के चरणबद्ध रिटायरमेंट के बाद इस अंतर को पाटना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य हो गया है।
इस खाई को पाटने के लिए वायुसेना एलसीए एमके-2 जैसे उन्नत स्वदेशी कार्यक्रमों पर दांव लगा रही है। इसके साथ ही 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) परियोजना, जिसमें अतिरिक्त राफेल या समकक्ष विमानों की खरीद शामिल है, को गति देने की आवश्यकता जताई गई है। इसके अलावा मध्यम परिवहन विमानों, रणनीतिक हेलीकॉप्टरों और अन्य युद्धक उपकरणों के सौदों को भी मौजूदा या अगले वित्तीय वर्ष में अंतिम रूप देने का प्रयास चल रहा है।

सी-295 परियोजना और भारत में विमान निर्माण का नया अध्याय

परिवहन बेड़े के कायाकल्प के मामले में सी-295 विमान कार्यक्रम को वायुसेना की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इसका पहला विमान सितंबर 2023 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था। इस परियोजना के तहत शुरुआती विमान सीधे तौर पर स्पेन से उड़ान भरने की स्थिति में आ रहे हैं, जबकि शेष विमानों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा।
यह परियोजना एयरबस डिफेंस एंड स्पेस और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के संयुक्त औद्योगिक सहयोग से संचालित हो रही है। इससे देश के निजी क्षेत्र में सैन्य परिवहन विमानों के निर्माण की एक मजबूत नींव पड़ी है, जो भविष्य के सैन्य लॉजिस्टिक्स को नई ताकत प्रदान करेगी।

Indian Air Force Modernisation: मल्टी-डोमेन वारफेयर पर जोर

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने स्पष्ट किया कि आधुनिक युद्धनीति अब केवल लड़ाकू जहाजों या एकल प्लेटफॉर्मों तक सीमित नहीं रह गई है। वायुसेना का ध्यान अब समग्र क्षमता, सेंसर-टू-शूटर लूप को छोटा करने और विभिन्न प्रणालियों के सहज एकीकरण पर केंद्रित है।
भविष्य के संघर्षों में बढ़त बनाए रखने के लिए सशस्त्र ड्रोन, काउंटर-ड्रोन तकनीक, मानवरहित लड़ाकू प्रणालियों (UAVs), अंतरिक्ष सुरक्षा और साइबर युद्ध क्षमताओं को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। वायुसेना प्रमुख का यह स्पष्ट आकलन संकेत देता है कि देश की वायु शक्ति को न केवल पारंपरिक हथियारों में आत्मनिर्भर होना होगा, बल्कि तकनीकी आधुनिकीकरण की रफ्तार को भी कई गुना बढ़ाना होगा।

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