Holika Dahan 2026 होलिका की अग्नि में क्यों अर्पित की जाती हैं गेहूं, चना और जौ की हरी बालियां? जानें इस पवित्र परंपरा का कृषि, आस्था और स्वास्थ्य से गहरा संबंध

नई फसल की हरी बालियां अग्नि में भूनकर अर्पित करने की प्राचीन परंपरा, कृषि, आस्था, स्वास्थ्य और अन्न सम्मान से गहरा संबंध

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Holika Dahan Tradition: होली का पर्व पूरे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है और इसकी तैयारियां जोरों पर हैं। रंगों की होली से एक दिन पहले फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन का पावन पर्व मनाया जाता है। इस साल होलिका दहन 3 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। होलिका दहन के दौरान पूजा सामग्री के साथ-साथ गेहूं, चना और जौ की हरी बालियां अग्नि में अर्पित करने की एक प्राचीन परंपरा है जिसे होरहा कहते हैं। यह परंपरा केवल एक धार्मिक रिवाज नहीं है, बल्कि इसके पीछे कृषि, आस्था, संस्कृति और स्वास्थ्य से जुड़ी गहरी मान्यताएं और तर्क हैं। आइए जानते हैं इस पुरातन परंपरा के बारे में विस्तार से।

Holika Dahan Tradition: होलिका दहन 2026 का शुभ मुहूर्त

इस साल फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च की शाम 5 बजकर 55 मिनट से आरंभ होकर 3 मार्च की शाम 5 बजकर 7 मिनट तक रहेगी। 3 मार्च को दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से शाम 6 बजकर 47 मिनट तक चंद्र ग्रहण रहेगा। ग्रहण और सूतक काल की समाप्ति के बाद यानी शाम 6 बजकर 22 मिनट से रात 8 बजकर 50 मिनट के बीच होलिका दहन करना शुभ माना गया है। इस शुभ मुहूर्त में ही होली जलाना उत्तम रहेगा।

Holika Dahan Tradition: क्या है नवान्न की परंपरा

होलिका दहन को कई स्थानों पर नवान्नेष्टि यज्ञ भी कहा जाता है। नवान्न का अर्थ है नया अनाज। फाल्गुन मास वह समय होता है जब रबी की फसल यानी गेहूं, जौ और चना पककर तैयार हो रही होती है। इस नई फसल का पहला और सबसे पवित्र हिस्सा किसान अग्नि को समर्पित करते हैं। यह परंपरा ईश्वर के प्रति गहरी कृतज्ञता और आभार व्यक्त करने का एक पावन तरीका है। इस परंपरा के पीछे यह विश्वास है कि जब किसान अपनी मेहनत से उगाई हुई फसल का पहला अंश भगवान को अर्पित करता है, तो ईश्वर प्रसन्न होते हैं और घर में अन्न की कभी कमी नहीं होती।

Holika Dahan Tradition: मेहनत और कृषि के प्रति सम्मान का भाव

होलिका की अग्नि में गेहूं और चने की हरी बालियां अर्पित करना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह किसान की महीनों की कड़ी मेहनत के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक अनूठा तरीका है। खेत में बीज बोने से लेकर फसल के पकने तक किसान अनगिनत कठिनाइयों से गुजरता है। ऐसे में जब फसल पककर तैयार हो जाती है तो उसका पहला अंश भगवान को अर्पित करना उस ईश्वरीय कृपा के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है जिसके बिना फसल संभव नहीं होती। यह परंपरा समृद्धि, सुख और अच्छी फसल की कामना के साथ-साथ यह भी संदेश देती है कि प्रकृति की देन का सम्मान करना भारतीय जीवन दर्शन का एक अभिन्न अंग है।

Holika Dahan Tradition: होला यानी अग्नि में भुना अनाज

होलिका की अग्नि में भुनी हुई गेहूं की बालियों को अनेक स्थानों पर होला कहा जाता है। यह शब्द स्वयं होली के नाम का एक कारण भी माना जाता है। इन भुनी हुई बालियों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है और लोग इसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करते हैं। लोक मान्यता है कि होलिका की पवित्र अग्नि में भुना हुआ यह अनाज शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। यह परंपरा बताती है कि हमारे पूर्वज प्राकृतिक चिकित्सा के गहरे जानकार थे। मौसम परिवर्तन के समय भुना हुआ अनाज खाना वास्तव में शरीर के लिए हितकारी होता है।

Holika Dahan Tradition: ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य का संबंध

फाल्गुन मास के बाद चैत्र का महीना आता है और धीरे-धीरे गर्मी की शुरुआत होने लगती है। सर्दी से गर्मी की ओर होने वाला यह मौसम परिवर्तन शरीर के लिए काफी संवेदनशील समय होता है। इस दौरान कई प्रकार के मौसमी रोग और संक्रमण होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में होलिका दहन के समय गेहूं और चने की हरी बालियां अग्नि में भूनकर खाना एक प्राकृतिक और वैज्ञानिक उपाय है। भुना हुआ चना और गेहूं अत्यंत हल्का और पौष्टिक आहार माना जाता है। इसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर, प्रोटीन और ऊर्जा तत्व होते हैं जो शरीर को ताकत देते हैं और पाचन तंत्र को मजबूत रखते हैं।

Holika Dahan Tradition: सात बालियों का विशेष महत्व और शुभता

भारतीय संस्कृति में संख्या सात को अत्यंत शुभ माना गया है। सात वचन, सात फेरे, सप्तर्षि, सात रंग और सात स्वर सभी में सात का विशेष महत्व है। होलिका दहन के संदर्भ में भी कई क्षेत्रों में सात गेहूं की बालियां अग्नि में अर्पित करने की परंपरा है। यह सात बालियां उन्नति, आरोग्य, समृद्धि और दीर्घायु की कामना का प्रतीक मानी जाती हैं। कुछ स्थानों पर इन भुनी हुई बालियों को घर वापस लाकर सुरक्षित रखा जाता है। मान्यता है कि होलिका की पवित्र अग्नि से भुनी बालियां घर में सुख और समृद्धि लाती हैं और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती हैं।

Holika Dahan Tradition: मां अन्नपूर्णा की कृपा और अन्न का सम्मान

भारतीय संस्कृति में अन्न को देवता का दर्जा दिया गया है। कहा जाता है कि अन्नं ब्रह्म यानी अन्न ही ब्रह्म है। होलिका दहन के दिन नई फसल की बालियां अग्नि में अर्पित करने से अन्न की देवी माता अन्नपूर्णा प्रसन्न होती हैं और घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती। यह परंपरा यह भी सिखाती है कि अनाज का कभी अपमान न करें और भोजन को बर्बाद न होने दें। यह मान्यता भारतीय कृषि सभ्यता की उस गहरी सोच को दर्शाती है जहां प्रकृति की हर देन को पवित्र माना गया है और उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा रहा है।

Holika Dahan Tradition: होलिका दहन की परंपरा का संदेश

होलिका की अग्नि में गेहूं, चने और जौ की हरी बालियां अर्पित करने की यह परंपरा केवल एक धार्मिक रिवाज नहीं बल्कि यह कृषि प्रधान भारतीय समाज की आत्मा है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि ईश्वर की कृपा के प्रति कृतज्ञ रहें, प्रकृति का सम्मान करें, किसान की मेहनत का आदर करें और मौसम के अनुसार अपना आहार चुनें।

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