Holashtak 2026: सिर्फ होलाष्टक ही नहीं, इन 5 अवसरों पर भी मांगलिक कार्य होते हैं पूरी तरह वर्जित, जानें कब-कब नहीं होती शुभ कार्यों की अनुमति

होलाष्टक के साथ ये 5 काल भी मांगलिक कार्यों से पूरी तरह वर्जित: पंचक, खरमास, पितृपक्ष, ग्रहण काल और चातुर्मास; जानें कब-कब नहीं होते विवाह-गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य

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Holashtak 2026: हिंदू धर्म में शुभ और मांगलिक कार्यों के लिए मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण और गृह प्रवेश जैसे संस्कार हमेशा शुभ मुहूर्त में ही संपन्न किए जाते हैं। इस समय होलाष्टक का काल चल रहा है जो 24 फरवरी से शुरू होकर 3 मार्च होलिका दहन तक रहेगा। होलाष्टक को हिंदू धर्म में अशुभ काल माना जाता है और इस दौरान किसी भी मांगलिक कार्य को करना वर्जित है। लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि होलाष्टक के अलावा भी हिंदू पंचांग में 5 और ऐसे महत्वपूर्ण अवसर आते हैं जब मांगलिक कार्य पूरी तरह बंद हो जाते हैं और इन दिनों किए गए शुभ कार्यों का फल नहीं मिलता। आइए विस्तार से जानते हैं वे कौन से 5 काल हैं जब मांगलिक कार्यों की मनाही होती है।

1. पंचक – पांच दिनों का अशुभ काल (Holashtak 2026)

पंचक हिंदू पंचांग में एक महत्वपूर्ण अशुभ काल है जो हर महीने आता है और पांच दिनों तक रहता है। इस दौरान कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य करना वर्जित माना जाता है। पंचक में सबसे खास बात यह है कि इस काल में लकड़ी से संबंधित कोई भी कार्य करना पूरी तरह मना है। पंचक में घर की छत नहीं बनवाई जाती और लकड़ी इकट्ठा करना भी शुभ नहीं माना जाता। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पंचक पांच प्रकार के होते हैं। ये हैं मृत्यु पंचक, अग्नि पंचक, रोग पंचक, चोर पंचक और नृप पंचक। इन पांचों प्रकार के पंचकों में अलग-अलग कार्यों को वर्जित माना गया है।

2. खरमास – सूर्य के राशि परिवर्तन का काल (Holashtak 2026)

खरमास तब लगता है जब सूर्य देव धनु राशि या मीन राशि में गोचर करते हैं। इस दौरान विवाह, सगाई और अन्य सभी मांगलिक कार्य पूरी तरह बंद हो जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि खरमास के दौरान किए गए मांगलिक कार्यों का शुभ फल नहीं मिलता। यह काल आमतौर पर एक महीने तक चलता है। ज्योतिष शास्त्र में इस काल को देवताओं की शक्ति के क्षीण होने का समय माना जाता है इसलिए इस दौरान नए और शुभ कार्यों की शुरुआत नहीं करनी चाहिए।

3. पितृपक्ष – पितरों को समर्पित 16 दिन (Holashtak 2026)

पितृपक्ष के 16 दिन पूरी तरह पितरों यानी पूर्वजों को समर्पित होते हैं। यह काल हर साल भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन माह की अमावस्या यानी पितृ अमावस्या तक चलता है। इस दौरान पितरों का श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किया जाता है। पितृपक्ष में कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य करना वर्जित है। इसके अलावा इस काल में नए गहने और नए कपड़े खरीदना भी अशुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता यह है कि इन 16 दिनों में पूर्वजों की आत्माएं पृथ्वी पर आती हैं और उनका सम्मान करने के लिए उत्सव और मांगलिक कार्यों से दूर रहना उचित है।

4. ग्रहण काल – सूतक से समापन तक (Holashtak 2026)

हिंदू धर्म में ग्रहण काल को अत्यंत अशुभ माना गया है। सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण से पहले सूतक काल शुरू हो जाता है। सूतक काल की शुरुआत से लेकर ग्रहण के पूरी तरह समाप्त होने तक किसी भी शुभ कार्य को करने की मनाही होती है। इस काल में देवी-देवताओं की मूर्तियों को स्पर्श करना भी वर्जित माना जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि सूर्य ग्रहण का सूतक काल ग्रहण से 12 घंटे पहले शुरू हो जाता है जबकि चंद्र ग्रहण का सूतक काल ग्रहण से 9 घंटे पहले प्रारंभ होता है। ग्रहण के दौरान मंदिरों के कपाट भी बंद रखे जाते हैं।

5. चातुर्मास – भगवान विष्णु की योग निद्रा का काल (Holashtak 2026)

चातुर्मास हिंदू धर्म का सबसे लंबा अशुभ काल है जो पूरे चार महीने तक चलता है। यह काल आषाढ़ शुक्ल की देवशयनी एकादशी से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी तक चलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन चार महीनों के दौरान भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं। इसीलिए इस पूरे काल में विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण और गृह प्रवेश सहित सभी मांगलिक कार्य पूरी तरह बंद रहते हैं। देवउठनी एकादशी को जब भगवान विष्णु जागते हैं तब से फिर मांगलिक कार्य शुरू होते हैं।

इन सभी पांच काल के साथ होलाष्टक को मिलाकर हिंदू पंचांग में कुल छह ऐसे महत्वपूर्ण अवसर हैं जब मांगलिक कार्यों से परहेज करने की धार्मिक परंपरा है। इन कालों का पालन करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है ऐसी मान्यता है।

Disclaimer: यह लेख पूरी तरह धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसे केवल धार्मिक जानकारी के रूप में लें।

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