पैटरनिटी लीव पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी, कहा—बच्चे की परवरिश में पिता की भूमिका भी उतनी ही अहम; केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा के रूप में मान्यता देने वाला कानून बनाने का आग्रह, गोद लेने वाली माताओं को 12 सप्ताह अवकाश अनिवार्य
पिता की भूमिका अहम, केंद्र से कानून बनाने की मांग; गोद लेने वाली मां को राहत
Paternity leave India: एक नवजात शिशु को जब पहली बार उसके पिता की बाहें थामती हैं तो उस क्षण का महत्व किसी कानूनी दस्तावेज से नहीं मापा जा सकता। लेकिन इसी भावनात्मक सच्चाई को अब भारत की शीर्ष अदालत ने कानूनी जामा पहनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने पैटरनिटी लीव को लेकर एक ऐसी टिप्पणी की है जो भारतीय कार्यस्थल संस्कृति और पारिवारिक कानून दोनों को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है।
Paternity leave India सुप्रीम कोर्ट ने पैटरनिटी लीव पर क्या कहा?
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पैटरनिटी लीव का प्रावधान लैंगिक भूमिकाओं को तोड़ने में सहायक होता है और पिताओं को बच्चे की देखभाल में सक्रिय भागीदार बनाता है। पीठ ने कहा कि यह अवकाश परवरिश की संतुलित समझ को बढ़ावा देता है।
अदालत ने आगे कहा कि किसी बच्चे के भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक विकास में मां की भूमिका निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन पिता की समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका की अनदेखी करना अधूरा और अन्यायपूर्ण होगा। यह टिप्पणी भारतीय न्यायिक इतिहास में पितृत्व अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जा रही है।
Paternity leave India: यह टिप्पणी किस मामले की सुनवाई के दौरान आई?
यह टिप्पणी गोद लेने से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आई। अदालत उस प्रावधान की समीक्षा कर रही थी जिसके तहत केवल तब मातृत्व अवकाश मिलता था जब गोद लिया गया बच्चा तीन महीने से कम उम्र का हो।
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को असंगत और भेदभावपूर्ण मानते हुए इसे निरस्त कर दिया। अदालत ने फैसला दिया कि गोद लेने वाली मां को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए, चाहे गोद लिए गए बच्चे की उम्र कुछ भी हो। इसी संदर्भ में पितृत्व अवकाश पर भी अदालत ने व्यापक टिप्पणी की।
Paternity leave India: केंद्र सरकार से क्या मांग की गई है?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार से अनुरोध करते हुए कहा, “पैटरनिटी लीव यानी पितृत्व अवकाश की आवश्यकता पर उपरोक्त चर्चा के संदर्भ में, हम केंद्र सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह पैटरनिटी लीव को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने का प्रावधान लाए।”
पीठ ने यह भी कहा, “हम यह जोर देते हैं कि ऐसे अवकाश की अवधि इस तरह निर्धारित की जानी चाहिए कि यह माता-पिता और बच्चे दोनों की आवश्यकताओं के अनुकूल हो।” यह सुझाव अनिवार्य आदेश नहीं है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा आग्रह नीति निर्माताओं पर नैतिक और कानूनी दबाव बनाता है।
Paternity leave India: भारत में अभी पैटरनिटी लीव की क्या स्थिति है?
भारत में फिलहाल पैटरनिटी लीव को लेकर कोई व्यापक केंद्रीय कानून नहीं है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 15 दिनों की पितृत्व छुट्टी का प्रावधान है, लेकिन निजी क्षेत्र में यह कंपनी की नीति पर निर्भर करता है।
अनेक बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों को अलग-अलग अवधि की पितृत्व छुट्टी देती हैं, लेकिन छोटे और मध्यम उद्योगों में यह सुविधा बहुत कम मिलती है। श्रम कानून विशेषज्ञों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक व्यापक और समान पैटरनिटी लीव कानून की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
Paternity leave India: बच्चे के विकास में पिता की भूमिका पर कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक टिप्पणी करते हुए कहा कि समाज अक्सर मां की भूमिका को बच्चे के जीवन में सबसे आवश्यक और अपरिवर्तनीय मानता है, जबकि पिता की भूमिका को उतनी अंतरंग या अनिवार्य नहीं माना जाता।
अदालत ने कहा कि यह सोच न केवल अधूरी है बल्कि बच्चे के समग्र विकास के दृष्टिकोण से भी हानिकारक है। परवरिश एकल जिम्मेदारी नहीं बल्कि एक साझा प्रक्रिया है जिसमें माता और पिता दोनों की भागीदारी बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए अनिवार्य है।
Paternity leave India: दुनिया के अन्य देशों में पैटरनिटी लीव की क्या व्यवस्था है?
अनेक विकसित देशों में पैटरनिटी लीव एक स्थापित कानूनी अधिकार है। स्वीडन जैसे देशों में माता और पिता दोनों को समान रूप से लंबी पैरेंटल लीव मिलती है जिसे वे अपनी सुविधा से साझा कर सकते हैं। जापान में भी पितृत्व अवकाश का कानूनी प्रावधान है।
श्रम अर्थशास्त्रियों के अनुसार जिन देशों में पैटरनिटी लीव का मजबूत कानूनी प्रावधान है वहां कार्यस्थल पर लैंगिक समानता अधिक है और महिला कर्मचारियों की कार्यस्थल वापसी की दर भी बेहतर होती है। भारत के लिए यह एक प्रेरणादायक उदाहरण हो सकता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारतीय समाज में पितृत्व की अवधारणा को एक नई दिशा देने वाली है। यह केवल कानूनी अवकाश का प्रश्न नहीं है बल्कि यह उस सामाजिक बदलाव की शुरुआत है जिसमें बच्चे की परवरिश को माँ की अकेली जिम्मेदारी नहीं बल्कि माता-पिता की साझी और समान जवाबदेही माना जाए। केंद्र सरकार अब इस दिशा में क्या कदम उठाती है यह देखना महत्वपूर्ण होगा। यदि पैटरनिटी लीव को कानूनी मान्यता मिलती है तो यह कार्यस्थल पर लैंगिक समानता और परिवार में बच्चे के स्वस्थ विकास दोनों के लिए एक क्रांतिकारी परिवर्तन साबित होगा।
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